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अपने को लेकर बदलते विचार
थापर तीन शताब्दियों से गुज़रते हुए इस ‘अपने’ को लेकर लगातार बदलते विचारों पर से पर्दा उठाती हैं। जैसा कि उस परंपरा के बाहर के मूल आकृतियों और तौर-तरीक़ों में नज़र आता है,जिसे लेकर अपना होने का दावा किया जाता है,हालांकि ‘पराया’ भी इस ‘अपने’ होने का हिस्सा हो सकता है।
रोमिला थापर
29 Oct 2020
RT

रोमिला थापर का यह विस्तृत निबंध सांस्कृतिक पहचान के सरल विचार के तौर पर अखंडित और स्थायी  विचारों से असहमत है।

थापर तीन शताब्दियों से गुज़रते हुए इस ‘अपने’ को लेकर लगातार बदलते विचारों पर से पर्दा उठाती हैं। जैसा कि उस परंपरा के बाहर के मूल आकृतियों और तौर-तरीक़ों में नज़र आता है,जिसे लेकर अपना होने का दावा किया जाता है,हालांकि पराया भी इस अपने होने का हिस्सा हो सकता है। बहस में जो कुछ कभी-कभी सदियों तक बना रह सकता है, उससे अलग कुछ दूसरी बातें अपने को पारिभाषित करने और फिर से उसकी खोज करने के लिए प्रेरणा के रूप में कार्य करती हैं। बार-बार तो नहीं, लेकिन पहचान के निशानदेही करने वाले पुराने तत्व हर तरफ़ से बाहर कर दिये जाते हैं,ऐसा इसलिए, क्योंकि नये मूल्य, व्यवहार और तर्क उसकी जगह ले लेते हैं। किसी पदानुक्रम में ‘अपने’ का मतलब सिर्फ़ ‘पराये’ समूहों की मौजूदगी को छुपा लेने के ज़रिये सामने आता है। ग़ैर-बराबरी का विरोध इस ‘अपने’ की किसी नयी अवधारणा की पेशकश,नैतिकता को लेकर किसी अलग नज़रिया,प्राकृतिक व्यवस्था,और उस परंपरा पर आधारित होता है, जो ‘पराये’ को भी एक नयी रोशनी में ढालती है।

नीचे के उद्धरण से हम भक्ति और सूफ़ी संप्रदायों के गतिशील और बहुपक्षीय मेल-मिलाप नज़र आते हैं। इनमें से हर संप्रदाय किसी न किसी परंपरावादी मूल निकाय की शाखा है, लेकिन उनके बीच दिखता विभाजन असल में किसी टकराहट के किसी क्षेत्र से कहीं ज़्यादा एक दूसरे को जोड़ने वाला, समानता और व्यक्तिगत नज़रिये की अभिव्यक्ति है।

सवर्ण समुदायों और अवर्ण समुदायों के बीच की सामाजिक भिन्नता अपरिवर्तनीय थी और उन लोगों के बीच भी यह जारी रही, जो इस्लाम में धर्मांतरित हो गये थे या फिर जो सिख बन गये थे। ठीक है कि सैद्धांतिक तौर पर इन धर्मों ने जातिगत भेदों का अनुसरण तो नहीं किया, लेकिन वास्तव में तत्कालीन ऊपरी और निचली जातियों के बीच एक अंतर तो बना रहा। दलितों का बहिष्कार जारी रहा, क्योंकि धर्मांतरण ने भी उन्हें जाति से मुक्तित नहीं दिलायी। निम्नतम जातियां अल्लाह की नज़र में सवर्णों के बराबर हो सकती हैं, लेकिन इस समय के सवर्णों की नज़र में तो बिल्कुल नहीं, चाहे वे जिस किसी भी धर्म के हों। निम्न जातियों और अवर्णों से आने वाले संतों या भक्तों की शिक्षाओं में औपचारिक सामाजिक संहिताओं को लेकर असंतोष का एक ऐसा सामाजिक संदेश मौजूद है, जिसे हमें सुनना चाहिए।

मुस्लिम घर में पैदा हुए कृष्ण भक्तों को “अपने” होने की दो वर्गों की तरफ़ पराये के रूप में देखा गया था। रूढ़िवादी इस्लाम के क़ाज़ी और मुल्लाओं ने रूढ़िवादी ब्राह्मणों की तरह ही उनकी बहुत निंदा की थी। मौक़े-बेमौक़े क़ाज़ी ने बातचीत का सहारा लेकर उन भक्तों को वापस लाने की कोशिश ज़रुर की, लेकिन उनकी वह कोशिश शायद ही कभी सफल हो पायी। यह सब तब तक जारी रहा जब तक कि ये कुछ शिक्षाओं को शामिल करने वाले औपचारिक धर्मों के लिए सहायक नहीं बन गये। इसलिए,हर पराये और अपने को हर बार ध्यान से परिभाषित करना पड़ता है, दोनों को अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में संदर्भित किया जाता है। यह पहचान को स्पष्ट करने में एक ज़रूरी क़वायद हो सकती है, और वहां तो यह क़वायद और भी बढ़ जाती है,जहां ये एक दूसरे के साथ रच-बच गये हों।

इस स्थिति पर एक दिलचस्प टिप्पणी सोलहवीं शताब्दी के बेहद सम्मानित दार्शनिक,मधुसूदन सरस्वती के संस्कृत ग्रंथ, प्रस्थानभेद से मिलती है। यह ग्रंथ उस समय के दार्शनिक विद्यापीठों का विवरण देता है। यहां तक कि यह धर्म पर भी नुक़्ताचीनी करता है, इससे साफ़ हो जाता है कि उस समय के सभी संप्रदाय किसी अखंड हिंदू धर्म के अनुरूप नहीं थे। असल में मधुसूदन सरस्वती उन लोगों का एक पराये के तौर पर ज़िक़्र करते हैं, जो किसी अखंड हिंदू धर्म के अनुरूप नहीं है,जैसे कि बौद्ध, जैन, चार्वाक, और उसमें वह तुर्कों को भी जोड़ देते हैं। क्या वह जो कुछ कह रहे हैं,उससे यह बात साफ़ नहीं हो जाती है कि वह ख़ुद को एक हिंदू के रूप में नहीं,बल्कि एक ब्राह्मण के रूप में परिभाषित कर रहे हैं ? उनके लिए दार्शनिक और धार्मिक विचारों में एक बड़ा विभाजन वैदिक और ग़ैर-वैदिक मतभेदों पर आधारित है। वह आस्तिक-नास्तिक प्रकार की शुरुआती परिभाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। वह बौद्ध, जैन और चार्वाक संप्रदायों को ग़ैर-वैदिक बताते हैं और इस सिलसिले में वह यह भी बताते हैं कि वे तुर्कों (आज के लिहाज़ से हम उन्हें मुसलमान कहेंगे) की शिक्षाओं के समान हैं। सवाल है कि वह ऐसा क्यों कहते हैं, ?  ऐसा इसलिए,क्योंकि वे सबके सब नास्तिक /अनास्थावान थे।

चार्वाक, जैन और बौद्धों के लिए जो बातें यहां कही गयी हैं,असल में ये ही बातें सदियों पहले से ब्राह्मण लेखकों द्वारा कही जाती रही हैं। श्रमण बौद्ध और जैन थे और उच्च-जाति के लेखकों की कुछ संस्कृत रचनाओं में ये शत्रुतापूर्ण तरीक़े से दर्शाये गये है। कुछ संस्कृत नाटकों में तो किसी जैन भिक्षु के प्रवेश को एक अपशगुन माना जाता है। इन तीनों के साथ मधुसूदन सरस्वती चौथे,यानी तुर्कों को भी जोड़ देते हैं। हालांकि पहले के तीन भी किसी देवता में विश्वास नहीं करते थे, और इसलिए उन्हें अनास्थावान कहा गया, तुर्कों का कम से कम एक ईश्वर पर तो विश्वास था,क्योंकि वे अल्लाह में यक़ीन करते थे। लेकिन, चूंकि अल्लाह वैदिक या पुराण में उद्धृत देवता तो था नहीं, इसलिए वह अस्वीकार्य था, लिहाज़ा तुर्क भी नस्तिका थे। दिलचस्प बात यह है कि लेखक इन चारों को एक ही श्रेणी,म्लेच्छ के रूप में प्रस्तुत करता है। संभवतः उन भक्तों को कम से कम पराया नहीं बताया गया है, जो पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, हालांकि वे वैदिक देवताओं के बारे में बहुत कम या कुछ भी नहीं कहते हैं।

हालांकि लंबे समय से जिस बात की दरकार थी,वह भक्ति और सूफी संतों के बीच की बातचीत थी,इसी दौरान इस सिलसिले में कुछ ग़ौरतलब शुरुआत हो रही थी। अराधना के रूप में भक्ति पर इन दोनों तरह के संतो के ज़ोर ने उन्हें एक साथ ले आया था,उसी तरह ये दोनों अमूर्त देवता के प्रति प्रेम पर भी ज़ोर दे रहे थे। लेकिन,कोई शक नहीं कि साधनों को अपनाये जाने को लेकर इन दोनों के बीच मतभेद ज़रूर थे। उनमें से कुछ में असहमति का संदेश था; तो दूसरों ने कुछ हद तक ही ऐसा किया या फिर नहीं किया। कुछ ने आश्रम व्यवस्थाओं या संगठनों के समानांतर मठों की व्यवस्थाओं को स्थापित करने का प्रयास किया, क्योंकि ये मठ एक संस्थागत आधार प्रदान करने में उपयोगी थे, जो व्यक्तिगत अनुयायियों के मुक़ाबले ज़्यादा जोरदार तरीक़े से सत्ता के सामने अपनी बात रख सकते थे। जहां संपत्ति शामिल हो जाती है, वहां विरासत का सवाल प्राथमिक हो जाता है। प्रत्येक के समर्थकों ने बाक़ी अनुयायियों को बाहर निकाल दिया और इसके बाद संप्रदायों की बाढ़ आ गयी, कुछ यथोचित रूप से एक  दूसरे के विचारों और व्यवहार के निकट थे,जबकि कुछ के बीच इन्हें लेकर पर्याप्त दूरियां थीं।

आम तौर पर मौजूदा मान्यताओं और प्रथाओं के सिलसिले में धर्मों का उभार होता  है और उनका विकास होता है। इन्हें एक तरह के अनुशासन में बांधा जा सकता है या फिर ये स्वतंत्र विचारों के रूप में भी रह सकते हैं। ऐसी स्थितियों में नये धार्मिक विचार विभिन्न संप्रदायों से अलग-अलग तत्व को ग्रहण करते हैं।ऐसा होता हुआ दूसरी सहस्राब्दी ईस्वी के संप्रदायों में देखा जा सकता है। किसी को भी 'प्रभाव' शब्द का इस्तेमाल करते हुए हिचकिचाहट होती है,ऐसा इसलिए,क्योंकि इसे एक के ऊपर दूसरे के वर्चस्व के तौर पर अक्सर ग़लत समझ लिया जाता है और वहीं “समन्वय” शब्द दो धर्मों के साथ-साथ चलने का संकेत देता है। लेकिन,चुनने की आज़ादी भक्ति संतों की ख़ासियत थी, क्योंकि वे मूल तत्व को लेकर बहुत उदार थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि अलग-अलग मान्यताओं की नज़दीक लाने वाले ऐतिहासिक संदर्भों पर भी विचार करना चाहिए। इस उदार होने की गतिविधि में यह बात समाहित है कि विशिष्ट, चिह्नित किये जाने वाले विभिन्न धर्मों से लिये गये ऐसे तत्व थे,जिन्हें नये धार्मिक अभिव्यक्ति को परिभाषित करने और पहचानने के लिए जानबूझकर चुना गया था। इस बात पर बहस हो सकती है कि किसी औपचारिक धर्म से सम्बन्धित कोई संप्रदाय विशेष के लिए ज़रूरी नहीं कि वह उस धर्म के शिक्षण या उपदेश के बोध के सिलसिले में ही व्याख्या करे या नहीं, और न ही हमेशा इसकी मांग की जाती है। शायद ज़्यादा समझने वाली बात यह है कि इन नये संप्रदाय के संतों ने पहले से मौजूद धर्मों से चुने गये तत्वों से ही अपने संप्रदाय बनाये थे, और उन्होंने इसमें कुछ नया जोड़ भी दिया था।

इन समय के ज़्यादा उदबोधक संवादों में से कुछ संवाद सूफ़ियों और योगियों / जोगियों के कुछ संप्रदायों के बीच के हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस्लाम और हिंदू,दोनों ही औपचारिक धर्मों के लिए पराये थे। कोई यह सवाल कर सकता है कि मध्य एशिया से आने वाले सूफ़ी संप्रदायों के विभिन्न दर्शनों से ग्रहण किये गये सार-तत्व पहले के समय से चले आ रहे उन प्रासंगिक विचारों की निरंतरता थी या नहीं, जब मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में विभिन्न बौद्ध संप्रदायों की स्थापना हुई थी और ख़ास तौर पर बौद्ध विचारों के परिवेश से पैदा होने वाले संप्रदायों के ये नये-नये संस्करण सामने आ रहे थे। ऐसा इस्लाम के दूसरे सहस्राब्दी के आरंभ से फैलने से पहले हुआ होगा। यह एक दिलचस्प सोच है कि उत्तर भारत और मध्य एशिया, दोनों में ही इस्लाम के आने से ठीक पहले बौद्ध धर्म ख़त्म हो गया था। क्या इसकी कोई अनुगूंज सुनायी पड़ रही थी ?

सापेक्षिक आज़ाद सोच के व्यापक विस्तार में जायें,तो इन लोगों की यह ख़ासियत है कि ये समाज के किनारे पर रहते हैं और सामाजिक अच्छाई और व्यक्तिगत जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने के वैकल्पिक तरीक़ों के बारे में सोचने को लेकर स्वतंत्रता का अनुसरण किये जाने का दावा करते हैं, ये वे लोग थे,जो किसी संप्रदाय से तो सम्बन्धित थे, लेकिन इन समस्याओं पर विचारों के आदान-प्रदान के ज़रिये दूसरों के साथ बातचीत भी कर रहे थे। जिनके बीच कुछ संवाद चल रहा था,उसमें से कुछ की जड़ें भारत स्थित संप्रदायों के बीच थी और कुछ की जड़ें तो भारत की सीमाओं के बाहर भी थीं। मसलन, नाथ योगियों को विभिन्न सूफ़ी संप्रदायों के साथ संवाद करने के लिए जाना जाता है। इसका एक दिलचस्प उदाहरण सोलहवीं शताब्दी के ग्वालियर में जन्मे मुहम्मद गावत थे, जो नाथ योगियों के शिक्षण में प्रशिक्षित शत्तारी संप्रदाय के सूफ़ी थे। उन्होंने अपने संस्कृत ग्रंथ, अमृतकुंड का फ़ारसी में अनुवाद किया था। क्या नाथ योगियों के किसी ग्रंथ में इस रुचि का कारण महज़ बौद्धिक जिज्ञासा थी या फिर यह उस ग्रंथ के अनुवाद किये जाने की प्रक्रिया का वह एक प्रयास था – जिस ग्रंथ को रचने वालों की सोच-विचार ने असहमति के कुछ तत्वों का पोषण किया था ?

यह आलेख रोमिला थापर द्वारा लिखित और सीगल बुक्स द्वारा प्रकाशित ”वॉयस ऑफ़ डिसेंट: एन एसे” का एक अंश है। प्रकाशक की अनुमति से इसे यहां पुनर्प्रकाशित किया गया है।

रोमिला थापर एक मशहूर भारतीय इतिहासकार हैं, जिनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र प्राचीन भारत है। वह लोकप्रिय खंड,ए हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, वॉल्यूम-01 सहित कई पुस्तकों की लेखक हैं। वह इस समय नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं।

सौजन्य: इंडियन कल्चरल फ़ोरम

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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