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भारत
राजनीति
आम चुनावों तक 'मोदी शाइनिंग' के रेडियो अभियान के लिए सज गया है मंच
स्पष्ट संकेत हैं कि मई के अंत तक के लिए एआईआर और निजी एफएम कंपनियों के बीच ‘समाचार साझा’ करने की एक पायलट परियोजना के लिए सौदा हो जाएगा।
एस.के. पांडे
11 Jan 2019
Translated by महेश कुमार
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Live Mint

क्या हम एक नई सूचना नीति के लिए तैयार हैं – जिसके तहत, एक देश-एक समाचार– के लिए प्रसार भारती और एफएम रेडियो जैसे निजी खिलाड़ियों के बीच सौदा होने की संभावना है? सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में इसका इशारा किया जिसे वह ‘नागरिकों को सूचना और शिक्षा’ के नाम पर करने जा रही है।

इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि अब से कुछ महीने बाद तक, ऐसी नीति संचालित होगी जो कम से कम मई-अंत तक चलेगी। सौदा यह है कि निजी एफएम स्टेशन अब अखिल भारतीय रेडियो (AIR) के समाचार बुलेटिन को मुफ्त में प्रसारित करेंगे। लेकिन शर्तों में यह भी स्पष्ट रूप से स्पष्ट किया गया है कि निजी एफएम स्टेशन सरकारी मुफ्त समाचार को उसकी समग्रता में प्रसारित करेंगे।

इस नीति के साथ, आकाशवाणी और निजी एफएम खिलाड़ियों के बीच चुनावी वर्ष 2019 के लिए एक हनीमून शुरू हो गया है, जिसे सार्वजनिक प्रसारक प्रसार भारती का पूरा का पूरा आशीर्वाद है। इसे एक परीक्षण के लिए "नई साझा पहल" कहा जा रहा है, जिस समझौते की यह विडंबना है कि 31 मई, 2019 (लोकसभा चुनाव के अंत के बाद) इसका फिर से जायजा लिया जाएगा।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 8 जनवरी को यह घोषणा की थी। यह अतीत की परंपरा से अलग है।

इसके साथ ही, कुछ ही दिनों पहले प्रसार भारती ने परिचालन लागतों को तर्कसंगत बनाने और कटौती करने के लिए आकाशवाणी के राष्ट्रीय चैनल को बंद करने का निर्णय लिया है। संयोग से, इस कार्यक्रम को हमारे सैनिकों, विशेष रूप से उन लोगों के बीच लोकप्रिय बताया जाता है जो कठिन इलाकों में तैनात हैं। इसके साथ ही तिरुवनंतपुरम, शिलॉन्ग, अहमदाबाद, लखनऊ और हैदराबाद में स्थित क्षेत्रीय शैक्षणिक ब्रॉडकास्टिंग और मल्टी-मीडिया (RABM) के सभी पाँच स्टेशनों को "तत्काल प्रभाव से" बंद करने का भी निर्णय लिया गया है।

यह बात और है कि आकाशवाणी समाचार को प्रसारित करने के लिए निजी एफएम स्टेशनों को लगाने के अलावा, सूचना व प्रसारण मंत्रालय सरकारी योजनाओं के विज्ञापन के लिए अपना बजट भी बढ़ा रहा है। इसका स्वाभाविक रूप से मतलब होगा कि एक बिना किसी अपवाद के निजी खिलाड़ियों को विज्ञापन का भंडार सौंपना ताकि उनका खज़ाना सरकारी पैसे से भरा जा सके। इसलिए, जैसा कि भारत 2019 के चुनावों के लिए तैयार हो रहा है, इस वर्ष समाचार विज्ञापनों के लिए मंत्रालय के विज्ञापन का बजट लगभग 20 प्रतिशत बढ़ जाएगा। क्या प्रसारण समाचार सेवाओं और अखबारों में विज्ञापनों के माध्यम से ’शाइनिंग इंडिया’ अभियान बनाने का यह दूसरा तरीका नहीं है? क्या यह तथ्य नहीं है कि वर्तमान सरकार ने नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद छोटे और मध्यम समाचार पत्रों का चयन करने के लिए विज्ञापनों में कटौती की है? कई अखबार, वास्तव में, बंद हो गए हैं। और अब नई नीति आयी है, जो मूल रूप से एक ऐसी नीति है जिसे “मैं आपकी पीठ खुजाता हूं, आप मेरी खुजाइए” कहा जा सकता है।

हालांकि प्रसार भारती की स्वायत्तता पहले से ही संगठन के भीतर काफी समय से चर्चा में है, गैर-व्यवहार्य समाचार पत्रों की भर्ती, नौकरी पर लेना और बाहर कर देना या हस्तांतरण पहले से ही अच्छी तरह से ज्ञात है। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, रफ़ाल विवाद पर विपक्षी पार्टियों के दृष्टिकोण को ब्लैक-आउट करने के प्रयासों के लिए जो दबाव डाला गया था, वह भी इसका एक तथ्य है।

मुख्यधारा के राष्ट्रीय मीडिया और समाचार वेबसाइटों पर दबाव भी पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा है जिसके बारे में चर्चा आम है। अब कोशिश इस बात की है कि आकाशवाणी से ज्यादा से ज्यादा ऐसी सरकारी खबरें प्रसारित हों और प्रिंट मीडिया के साथ-साथ मोदी सरकार के लिए इसे भी ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान चलाने के लिए सुनिश्चित किया जाए। (यह अलग बात है कि 2004 में इस तरह के अभियान के परिणामस्वरूप एनडीए सरकार की सत्ता में वापसी नहीं हुई थी)।

इसलिए, नया चरण ‘मोदी शाइनिंग’ परियोजना चुनाव 2019 के लिए निर्धारित किया गया है। इसके लिए प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) में कुछ व्यक्तियों को खास जिम्मेदारी सौंपी जा रही है और नई भूमिका दिए जाने की रिपोर्ट इसमें जोड़ें। यह ज्ञात रहना चाहिए कि आपातकाल के दिनों में PIB को 'पुलिस सूचना ब्यूरो' का उपनाम मिला था। ठहरो और देखो, अभी तो 2019 शुरू हुआ है...।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

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