NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
अमृता प्रीतम : जिन्हें दो मर्दों के बीच छुपा दिया गया
अमृता प्रीतम के जन्म को आज सौ साल हो गए हैं। अमृता के जीवन की आज बात की जाए तो एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अमृता को सिर्फ़ साहिर और इमरोज़ का नाम लेकर याद करता है। ऐसा क्यों होता है?
सत्यम् तिवारी
31 Aug 2019
amrita pritam
Amrita Pritam

अमृता प्रीतम 31 अगस्त 1919 को पैदा हुई थीं। आज 2019 में अगर वो ज़िंदा होतीं तो 100 साल की होतीं। सबसे पहले अमृता को उनकी सालगिरह मुबारक।

14079673_871152636318928_1559358587619117513_n.jpg

जब हम अमृता की बात करते हैं तो उनका ये परिचय हमारे ज़हन में आता है (या आना चाहिए); कि अमृता एक शानदार लेखिका थीं, पंजाबी भाषा की प्रसिद्ध लेखिका। अमृता ने पंजाबी के अलावा हिन्दी में भी कवितायें लिखीं, उपन्यास लिखे। उनकी पंजाबी नज़्म "अज्ज आखां वारिस शाह नू" ने पंजाब में तक़सीम के वक़्त महिलाओं पर हुए ज़ुल्मों की बात कही। अमृता का उपन्यास "पिंजर" महिलाओं पर हुए ज़ुल्मों की बात करता है और उसका किरदार "पूरो" तो जैसे अमर ही हो गया। अमृता, जो साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला बनीं। अमृता, जिन्होंने अपने जीवन के साथ देश की तमाम महिलाओं के जीवन को जोड़ के लिखा और तक़सीम के बाद भी हिंदुस्तान के अलावा पाकिस्तान में भी बराबर मशहूर रहीं।

लेकिन रुकिए, और आज ज़रा अपने फेसबुक टाइमलाइन, अपने इनबॉक्स पर नज़र दौड़ाइए। क्या अमृता का ये परिचय आपने विकिपीडिया के अलावा कहीं भी और पढ़ा है? मुझे यक़ीन है कि 80 प्रतिशत लोगों का जवाब "नहीं" होगा। अगर ये परिचय किसी ने पढ़ा भी हो, तो उसमें एक बात और जोड़ी गई होगी जिस पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया होगा। वो बात ये, कि अमृता प्रीतम साहिर लुधियानवी की प्रेमिका थीं, कि वे साहिर से बेहद प्यार करती थीं, कि वे उनकी छोड़ी हुई सिगरेट पीती थीं। या ये बात कि इमरोज़ अमृता से बहुत प्यार करते थे लेकिन अमृता को साहिर से ज़्यादा प्यार था।

ये कोई अच्छी बात नहीं है कि इतनी उम्दा लेखिका का जीवन सिर्फ़ दो मर्दों तक सीमित कर दिया गया है। कि एक मर्द से वो इश्क़ करती थी, और दूसरा मर्द उनसे इश्क़ करता था। दुनिया इसको लव ट्रायंगल यानी प्रेम त्रिकोण कहती है, और इस प्यार को अपनी प्रेरणा के रूप में भी देखती है। बाज़ औक़ात (कई बार) मैंने ये देखा है कि लोग अमृता को सिर्फ़ साहिर कि सिगरेट की वजह से याद रखते हैं।
इस बात को बढ़ावा दिया है बड़े-बड़े शहरों में हो रहे Poetry Open Mics ने, जिसमें Yourquote जैसी पोयट्री कंपनियाँ शामिल हैं। ऐसी जगहों पर नए लिखने वाले अपनी कविताओं (जो कविता नहीं है) में अमृता, साहिर, इमरोज़, सिगरेट का ज़िक्र करते हैं और इसे मशहूर कर के ट्रेंडिंग हो जाते हैं।

ज़ाहिर बात है कि अमृता के जीवन का एक बड़ा हिस्सा इश्क़ में बीता था, सबका बीतता है। क्या एक लेखिका को सिर्फ़ इसलिए याद किया जाना चाहिए कि वो इश्क़ करती थी, या इसलिए याद रखा जाना चाहिए कि वो किसी मर्द के इश्क़ में दीवानी हो गई थी? और वो मर्द कौन, जो बहुत बड़ा शायर था, फ़िल्मों में गाने लिखता था। उस लेखिका को उसके अपने लेखन, अपने कामों के लिए याद कभी नहीं रखा जाता।
ये बात सच है कि अमृता साहिर से इश्क़ करती थीं, और जब वो इमरोज़ की दोस्त थीं, तब उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वो कभी इमरोज़ के साथ जीवन गुज़ारेंगी। इस बात का एतराफ़ अमृता ने ख़ुद किया है। अपनी किताब "रसीदी टिकट" के एक चैप्टर "आधी रोटी पूरा चाँद" में अमृता इमरोज़ के साथ खाना खाने के बारे में लिखती हैं,

"बहुत बरसों बाद इमरोज़ ने कहीं इस घटना को लिखा था - 'आधी रोटी, पूरा चाँद' पर उस दिन हम दोनों को सपना-सा भी नहीं था कि वक़्त आएगा, जब हम दोनों जो रोटी कमाएंगे, आधी-आधी बाँट लेंगे।"

आज सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया और तमाम प्रोग्राम में इस बात पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है कि अमृता का साहिर से कैसा रिश्ता था, और इमरोज़ से कैसा रिश्ता था। लेकिन इस सब के दौरान इसकी बात नहीं होती कि साहिर ने कभी इज़हार नहीं किया और उन्हें छोड़ कर चले गए। अमृता के बारे में ये भी कहा जाता है कि जितनी भी प्रेम कवितायें अमृता ने लिखीं, वो इस दु:ख में लिखीं कि साहिर उन्हें छोड़ कर चले गए थे।

अमृता का ज़िक्र हमेशा मर्दों के साथ होने के पीछे वो पितृसत्ता है जिसका ये यक़ीन है कि महिलाओं को कुछ भी करने के लिए एक ऐसे इंसान से प्रेरणा चाहिए, जो मर्द हो।  इसको आप पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवाद भी कह सकते हैं जिसका यक़ीन ये है कि महिलाएं ख़ुद से कुछ लिख नहीं सकतीं।

बात अमृता पर ही नहीं रुकती

ये "बदतमीज़ी" अमृता प्रीतम तक ही सीमित नहीं है। आपको हर क्षेत्र की महिलाओं के बारे में ये बातें मिल जाएंगी जिसमें उनका ज़िक्र किसी मर्द से जोड़ कर किया जाता है। मसलन आप फ़िल्मों की ही बात करें!

किसी से पूछ लें कि रत्ना पाठक कौन हैं! जवाब आएगा, नसीरुद्दीन शाह की पत्नी; पुछें कि सुप्रिया पाठक कौन हैं! जवाब आएगा, पंकज कपूर की पत्नी। शबाना आज़मी का ज़िक्र आज भी जावेद अख़्तर या कैफ़ी आज़मी से जोड़ कर किया जाता है। इसी दिल्ली शहर में जब कोई मुशायरा हो, और कोई शायरा अच्छे शेर सुनाये, तो उनके उस्ताद का ज़िक्र किया जाता है।

ये महज़ कुछ ही उदाहरण हैं, ऐसे हज़ारों उदाहरण हर क्षेत्र में मौजूद हैं।

देश-दुनिया-समाज इतना आगे जा चुका है, आधुनिक हो चुका है। लेकिन एक वक़्त पर लड़कियों को पढ़ने तक की इजाज़त न देने वाले इस समाज में आज भी एक रत्ती का फ़र्क़ देखने को नहीं मिलता। आज भी ये सोच बनी हुई है कि यदि कोई महिला कुछ कर रही है, तो उसकी वजह उसके जीवन का कोई मर्द ही होगा। हम आज भी महिलाओं को उनकी आज़ाद पहचान देने में नाकाम हैं।

अमृता के जन्म को 100 साल हो गए हैं और उनकी मौत को 14 साल। आज ज़रूरी है कि अमृता को पढ़ा जाए। अमृता के अलावा भी हर महिला को पढ़ा जाए, उसके काम को देखा जाए, अच्छे कामों को सराहा जाए ताकि इस समाज को किसी महिला की बात करने के लिए किसी मर्द के सहारे की ज़रूरत न पड़े।

amrita pritam's 100th birhtday
Amrita was a wonderful writer
punjabi language writer
gender discrimination
Patriarchal Brahminism

Related Stories

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

क्या दहेज प्रथा कभी खत्म हो पाएगी?

बोलती लड़कियां, अपने अधिकारों के लिए लड़ती औरतें पितृसत्ता वाली सोच के लोगों को क्यों चुभती हैं?

क्या पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार जताना ही उनके शोषण का मूल कारण है?

एकतरफ़ा ‘प्यार’ को प्यार कहना कहां तक जायज़ है?

क्या समाज और मीडिया में स्त्री-पुरुष की उम्र को लेकर दोहरी मानसिकता न्याय संगत है?

ब्राह्मणसत्ता और पुरुषसत्ता की दोहरी मार झेलती है दलित स्त्री

हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश और...

भारत में स्त्री शिक्षा : प्रतिगामी शिथिलता

जिउतिया व्रत: बेटियों के मनुष्य होने के पक्ष में परंपरा की इस कड़ी का टूटना बहुत ज़रूरी है


बाकी खबरें

  • CARTOON
    आज का कार्टून
    प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?
    27 Apr 2022
    मुख्यमंत्रियों संग संवाद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य सरकारों से पेट्रोल-डीज़ल के दामों पर टैक्स कम करने की बात कही।
  • JAHANGEERPURI
    नाज़मा ख़ान
    जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी
    27 Apr 2022
    अकबरी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था न ही ये विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा और न ही ये कि मैं उनको मुआवज़ा दिलाने की हैसियत रखती हूं। मुझे उनकी डबडबाई आँखों से नज़र चुरा कर चले जाना था।
  • बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    27 Apr 2022
    वाहनों में महिलाओं को बेहतर सुरक्षा देने के उद्देश्य से निर्भया सेफ्टी मॉडल तैयार किया गया है। इस ख़ास मॉडल से सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी।
  • श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    प्रभात पटनायक
    श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    27 Apr 2022
    श्रीलंका के संकट की सारी की सारी व्याख्याओं की समस्या यह है कि उनमें, श्रीलंका के संकट को भड़काने में नवउदारवाद की भूमिका को पूरी तरह से अनदेखा ही कर दिया जाता है।
  • israel
    एम के भद्रकुमार
    अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात
    27 Apr 2022
    रविवार को इज़राइली प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के साथ जो बाइडेन की फोन पर हुई बातचीत के गहरे मायने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License