NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
अनिल अंबानी मोदी के राफेल "सौदे" की परछाई से प्रकट हुए
इस विशेष सौदे से इतना गोपनीयता क्यों है, जबकि हम जानते हैं कि बड़े हथियारों के सौदे में भ्रष्टाचार गोपनीयता और तदर्थ निर्णय लेने से होता है?
प्रबीर पुरुकायास्थ
02 Dec 2017
rafale deal

मोदी के राफेल "सौदे" ने कई सवाल उठाए हैं। किस प्रकार तीन वर्षों में भारतीय वायुसेना के लिए 126 मध्यम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) की आवश्यकता अचानक घटकर 26 हो गई? किस प्रकार 2015 में प्रति विमान 81 मिलियन डॉलर से बढ़कर 243 मिलियन डॉलर हो गया? या प्रति विमान तीन गुना बढ़ गया? इन दो सौदों यानि 2012 में यूपीए और 2015 में मोदी के मध्यवर्ती तीन वर्षों में आख़िर क्या बदलाव आया? और इससे भी ज्यादा अजीब कि किसने और कैसे ये निर्णय लिया? इस विशेष सौदे में इतनी गोपनीयता क्यों हुई, जबकि हम जानते हैं कि बहुत बड़े हथियारों के सौदे में भ्रष्टाचार गोपनीयता और तदर्थ निर्णय लेने से होता है?

हालांकि ये सब विवाद का मामला है, लेकिन इस "बहस" में जो ग़ायब किया जा रहा है उसका सवाल यह है कि लाभार्थी कौन है? और अचानक हम पाते हैं कि यह अनिल अंबानी है जो 2 जी लाइसेंस घोटाले के प्रमुख लाभार्थियों में से एक है, वे राफेल डील के भी लाभार्थी हैं। 126 विमानों वाले मूल अनुबंध को ख़त्म करते हुएप्रौद्योगिकी को साझा करने तथा राफेल विमान का उत्पादन करने के लिए एचएएल समझौता भी रद्द कर दिया गया है। इसके बजाए अनिल अंबानी की रिलायंस, जिसके बैंकों केकई "लाल निशान" वाले ऋण है, नए मोदी राफेल "सौदे" में डसॉल्ट का नया सहभागी के रूप में उभरा है।

सभी रक्षा सौदों के अंतिम बिक्री मूल्य का 50% भारत में खर्च करना होगा। नए मोदी राफेल "सौदे" के एक हिस्से के रूप में, 2 जी घोटाले के दाग़ी अनिल अंबानी का रिलायंस 21,000 करोड़ रुपए का लाभ लेने को तैयार है जो कुल 30,000 करोड़ रूपए ऑफसेट का 70% है। बाकी 30% भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, भारत डायनामिक्स और अन्य रक्षा ठेकेदारों द्वारा साझा किया जा रहा है।

अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस एरोस्टक्चर किस प्रकार डसॉल्ट और रिलायंस ग्रुप (अनिल अंबानी का रिलायंस ग्रुप) के बीच एक संयुक्त उद्यम के रूप में बनाई गई, जिसे राफेल ऑफसेट का बड़ा हिस्सा मिला? हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का क्या हुआ जो मूल सौदे का साझेदार था? पेरिस में मोदी द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के दो दिन पहले, विदेश सचिव जयशंकर ने खारिज किया था कि एचएएल को राफेल सौदे में डसॉल्ट के साझेदार के रूप में हटाया जा रहा था। स्पष्ट रूप से, यहां तक कि भारत की नौकरशाही का शीर्ष स्तर भी अनजान था कि भारत की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी एचएएल को अनिल अंबानी की रिलायंस के पक्ष में अलग कियाजा रहा था? यदि यह स्वतंत्र रूप से सरकारी उदारता का उपहार नहीं है, तो यह क्या है? और शायद हम भूल जाते हैं कि इसमें शामिल राशि 21,000 करोड़ रूपए कीधोखाधड़ी की सीमा के रूप में गणना की गई। ये राशि 2 जी मामले के सीबीआई की चार्जशीट का दो-तिहाई है। और ये सीएजी के "अनुमानित हानि" के आंकड़े नहीं हैं, जिन पर सवाल उठाया जा सकता है। ये वास्तविक आंकड़े हैं जिसे रिलायंस को डसॉल्ट की ओर से ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट्स और उसके अन्य साझेदारों के रूप में हासिल करना है।

हालांकि 2 जी मामले में सीबीआई के आरोपपत्र में अनिल अंबानी को आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया गया है। अनिल अंबानी के रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (आरडीएजी) के तीन शीर्ष अधिकारियों गौतम दोशी, सुरेंद्र पिपारा तथा हरि नायर और रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड, जो अनिल अंबानी के रिलायंस का एक हिस्सा है, पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था। जैसा कि सीएजी ने पहचान किया था और सीबीआई के चार्जशीट ने वृहत ब्योरा दिया है, अनिल अंबानी की रिलायंस ने स्वान टेलीकॉम को 2 जी स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाने के लिए एक अग्रणी कंपनी के रूप में इस्तेमाल किया था। रिलायंस टेलीकॉम ख़ुद बोली लगाने काहकदार नहीं था क्योंकि इसने पहले ही एक टेलकम लाइसेंस ले रखा था। ज़़ेबरा, पैरोट, चीता जैसे कई अन्य कंपनियों के नाम का इस्तेमाल करते हुए स्वान टेलीकॉम को संपूर्णपूंजी रिलायंस से मिली, कंपनियों का ये नाम शायद निकटतम चिड़ियाघर का दौरा करके रखा गया था। इस तरह से हस्तांतरित की गई राशि क़रीब 1,000 करोड़ रूपए से ज्यादा थी। जब सीबीआई अदालत में पूछा गया कि बिना उनकी भागीदारी के कैसे इतनी बड़ी राशि उनकी कंपनी से स्वान टेलीकॉम को हस्तांतरित की गई तो उन्होंने कहा था कि उन्हें इन लेन-देन की कोई याद नहीं है! एक हज़ार करोड़ के बारे में याद नहीं!

लिहाजा 2 जी घोटाला क्या था और राफेल क्यों समानांतर है? अनिल अंबानी से पृथक दोनों मामलों में एक सामान्य कारक के रूप में?

2 जी स्पेक्ट्रम को इसके बाजार मूल्य के दसवें हिस्से पर बेचा जा रहा था। स्पेक्ट्रम की सभी सेलुलर ऑपरेटरों को ज़रूरत थी। हालांकि दूरसंचार कंपनियों को काफी सस्ते क़ीमत पर ये स्पेक्ट्रम मिली, राजा और उनके "मित्र" और "परिवार" को "बचत" से कटौती मिली जो कि दूरसंचार कंपनियां बना रही थी। 2 जी घोटाले का मूल दूरसंचार कंपनियां थीं जो एकदम सस्ते कीमतों पर स्पेक्ट्रम हासिल कर रही थीं।

शायद हम पर आंकड़े गढ़ने का आरोप लगाया जाता है, याद रहे कि लाइसेंस प्राप्त करने के बाद दूरसंचार कंपनियों के शेयर बढ़ गए, राजा के सौजन्य से। इसी तरह हम स्पेक्ट्रम के बाजार मूल्य की गणना कर सकते हैं। वे कंपनियां जिन्होंने लाइसेंस हासिल किए थे, उनकी कोई अन्य संपत्ति नहीं थी: न कोई बुनियादी ढांचा, न हीकोई पूंजी, यहां तक कि कोई ग्राहक भी नहीं। एक बार जब उन्होंने अपने लाइसेंस हासिल कर लिए तो वे अपने शेयरों का हिस्सा बेचने में सक्षम थे, और उसका परिचालन शुरू करने से पहले पूरे लाइसेंस शुल्क का क्षतिपूर्ति कर लिया।

यह सिर्फ राजा और दूरसंचार विभाग नहीं था जो इसमें शामिल था। पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और अन्य बैंकों सहित सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों ने इन कंपनियों को क़र्ज़ दिया था। अनिल अंबानी की अग्रणी स्वान टेलीकॉम ने सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों से 3000 करोड़ रूपए लिया था। जब सुप्रीम कोर्ट ने राजा के लाइसेंस देने की तथाकथित "फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व्ड" योजना को समाप्त कर दिया तो ये सभी गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में बदल गया।

हमें जो प्रश्न पूछना है वह यह कि यदि स्पेक्ट्रम सार्वजनिक संपत्ति है तो रक्षा सौदों में ऑफसेट्स क्या हैं? मूल 2012 राफेल सौदे में इस ऑफ़सेट को सौदा के एक हिस्से के रूप में माना गया था। यही कारण है कि एचएएल को रक्षा ठेकेदार के रूप में चुना गया था जिसे राफेल विमान का उत्पादन स्वदेश में करना था। 2015में मोदी के "सौदे" में रक्षा साझीदार को "खुला" छोड़ दिया गया था, तब अचानक, अनिल अंबानी प्रकट हुए और अब सौदे के साझीदारी का बड़ा हिस्सा ले जा रहे हैं।

ऑफसेट्स को सरकारी रक्षा अनुबंधों से बनाया गया है और जो बहुत ही आर्थिक उदार है जिसे सरकार अपने पसंदीदा पक्षों को दे सकती है। मूल राफेल समझौते में एचएएल था। वहीं मोदी की व्यवस्था के तहत अनिल अंबानी हैं। जाहिर है, हम गुप्त सौदे में वापस आ गए हैं, पिछले दरवाज़े से सौदा किया जा रहा है, और रक्षा अनुबंधों के एक प्रमुख हिस्से का दावा करने में निजी पार्टियों का समर्थन किया जा रहा है।

यदि अनिल अंबानी के पास अपनी कंपनियों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए मज़बूत वित्तीय साख थी तो हम समझ सकते थे। वो आरकॉम को चलाने में कामयाब रहे और अब वह दिवालिया होने की कार्यवाही का सामना कर रही है। बैंकों के उनके ऋण को रेखांकित किया गया है जिसका मतलब है कि वे समय पर अपने ऋण का भुगतान करने में असमर्थ हैं। उन्हें अभी तक डिफॉल्टर घोषित नहीं किया गया है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों ने हमें बताया है कि वह खतरनाक स्थिति मेंइसके क़रीब हैं। कैसे इस तरह के समूह, अपनी कंपनियों को चलाने में इतने निराशाजनक रिकॉर्ड के साथ, को डसॉल्ट और इसके ऑफसेट के साझेदारी के लिएसमर्थन किया गया?

अगर हम ऐसे मुद्दों को उठाते हैं, तो हमें तुरंत राष्ट्र विरोधी तथा भारत के रक्षा प्रयासों को बाधित करने का आरोप लगा दिया जाएगा। विमान की कम संख्या और एचएएल को नुकसान पहुंचा कर राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं, मोदी भक्तों को छोड़कर ज्यादातर लोगों के लिए समझना मुश्किल हो सकता है। हम पर भी गुजरात विरोधी होने का आरोप लगाया जा सकता है, जैसा कि मोदी अपने आलोचकों के बारे में कह रहे हैं। वास्तव में ज़ाहिर तौर पर गुजरात का मतलब केवल अंबानी और अदानी होता है न कि गुजरात के लोग जो एक निराशाजनक मानव विकास रिकॉर्ड के साथ "लाभान्वित" हुए हैं। यह वास्तव में मोदी का गुजरात मॉडल है।

Rafale deal
Anil Ambani
Reliance
BJP
Narendra modi
crony capitalism

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    23 Jul 2021
    तीन सदस्यीय जांच आयोग का नेतृत्व नवी पिल्ले करेंगे जो 2008-2014 के बीच यूएनएचआरसी के प्रमुख थे।
  • 400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    पीपल्स डिस्पैच
    400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    23 Jul 2021
    400 से अधिक हस्तियों द्वारा हस्ताक्षरित एक खुला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान क्यूबा पर लगाए गए 243 एकतरफ़ा प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है जिसने इस द्वीप…
  • अध्ययन के मुताबिक भारत में कोरोनावायरस की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद की सबसे भयावह त्रासदी’, सरकार ने किया आंकड़े से इंकार
    दित्सा भट्टाचार्य
    अध्ययन के मुताबिक भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद सबसे बड़ी त्रासदी’, सरकार का आंकड़े से इंकार
    23 Jul 2021
    रिपोर्ट में कहा गया है, “वास्तविक मौतों का आंकड़ा कई लाखों में होने का अनुमान है, न कि कुछ लाख में, जो इसे यकीनन विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से भारत की सबसे भयावह मानवीय त्रासदी बना देता है।” 
  • अयोध्या में बीएसपी के कार्यक्रम का पोस्टर। बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा के ट्विटर हैंडल से साभार
    असद रिज़वी
    दलित+ब्राह्मण: क्या 2007 दोहरा पाएगी बीएसपी?
    23 Jul 2021
    पार्टी अपने 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग को दोहराने की कोशिश कर रही है, लेकिन ये इस बार इतना आसान नहीं होगा। एक विश्लेषण...
  • ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    दमयन्ती धर
    ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    23 Jul 2021
    वलसाड में उमरागाम तालुक के स्थानीय लोग प्रस्तावित बंदरगाह के निर्माण का विरोध 1997 से ही करते आ रहे हैं, जब पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License