NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
अंध-राष्ट्रवादी मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र परिसंपत्तियों को बेचने में चैंपियन
केंद्र की बीजेपी सरकार अपने खातों को बेहतर स्थिति में दिखाने के लिए अब तक 2 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की पीएसयू की परिसंपत्तियाँ बेच चुकी है, यह विनिवेश 1991 से शुरु हुए तमाम विनिवेशों का 58 प्रतिशत हिस्सा है।
सुबोध वर्मा
19 Nov 2018
Translated by महेश कुमार
disinvestment in Modi government

मोदी सरकार बहुमूल्य सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को बेचने के लिए नये-नये तरीके इजात कर रही हैI निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआईपीएएम) द्वारा हाल में जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार सरकार ने इसी वर्ष 15,247 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए हैं, इसे मिलाकर कुल सार्वजनिक क्षेत्र की बिक्री लगभग पांच साल की अवधि में बढ़कर 2.09 लाख करोड़ रुपये हो गई है। जब से 1991 में नवउदारवादी नीतियाँ अपनाते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को विनियमित कर दिया गया, तब से अब तक इतनी तेज़ी से किसी सरकार ने सार्वजानिक परिसंपत्तियों का विनिवेश नहीं किया जितना मोदी सरकार ने कियाI (यह नीचे दिए चार्ट में स्पष्ट देखा जा सकता है)

disinvestment by Modi government 1.jpg

यदि आप अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्त्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) -1 सरकार द्वारा किए गए विनिवेश को इसमें जोड़ते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय संपत्तियों को बेचने के मामले में चैंपियन बन कर सामने आती है I वो भगवा पार्टी जो सबसे ज़्यादा राष्ट्रवादी होने का दावा करती है, वो ही देश की परिसंपत्तियों को बेचने में सबसे अव्वल हो तो बड़ा अजीब लगता हैI  

मौजूदा वित्तीय वर्ष में, हालांकि, विनिवेश को लेकर भाजपा के प्रयास बहुत अच्छे नहीं जा रहे हैं। इसने 80,000 करोड़ रुपये के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) की संपत्तियों को बेचने का लक्ष्य स्थापित किया था, लेकिन ढाई महीने बीत चुके हैं और यह अभी तक केवल 15,000 करोड़ रुपये की ही संपत्ति बेच पाए हैं।

ऐसा क्यों हुआ: पीएसयू निजीकरण की राजनीतिक लागत भारी पड़ेगी क्योंकि आम चुनावों कुछ महीनों बाद ही हैं, और वैसे भी वर्तमान समय में मौजूद औद्योगिक संकट में पीएसयू खरीदने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पिछले चार वर्षों में, ट्रेड यूनियनों ने पीएसयू के निजीकरण के खिलाफ एक निरंतर लडाई लड़ी है क्योंकि निजीकरण का स्पष्ट मतलब है नौकरियों में कमी, साथ ही साथ संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को नुकसान, ये सब ऐसे मुद्दे हैं जो श्रमिकों की ज़िंदगियों नज़दीक हैं, भगवा रंग में रंगे उद्योगपतियों या राजनीतिक नेताओं के नहीं। ज़ाहिर है, यह भाजपा रणनीतिकारों के दिमाग पर असर कर रहा है। एयर इंडिया का निजीकरण करने के प्रयासों की विफलता से मौजूदा माहौल को ही दिखता क्योंकि इस सौदे को बार-बार आकर्षक बनाने की कोशिश करने के बावजूद कोई खरीददार नहीं मिलाI

इस बीच, सरकार को राजकोषीय घाटे के संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। यह ‘संकट’ निश्चित रूप से नव-उदारवाद के प्रति मोदी की प्रतिबद्धता के कारण ही हुआ है, लेकिन फिर भी, उनके लिए तो यह एक संकट ही है। इसलिए, सार्वजनिक क्षेत्र के शेयरों को टुकड़े-टुकड़े में बेचना वित्त मंत्री अरुण जेटली एंड कंपनी द्वारा अपने बही-खातों पर रंगीन ज़िल्द चढ़ाने का 'नवीनतम' तरीका है। उदाहरण के लिए, चालू वर्ष में, सरकार ने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) मंच पर भेल के शेयर बेचकर 8,325 करोड़ रुपये कमाए, और बिक्री के लिए ऑफर के माध्यम से नेवेली कोयला लिमिटेड (कोयला इंडिया लिमिटेड का भाग) के 3.19 प्रतिशत बेचे इसके ज़रिये 5,218 करोड़ रुपये कमाए। ये छोटे विनिवेश हैं, लेकिन श्री जेटली को अगले फरवरी में अपने अंतिम बजट में दिखाने के लिए कुछ तो चाहिए जो उन्हें बही तैयार करने में मदद करेंगे।

इन विकास विद्या के बावजूद, भारत का वित्त और अर्थव्यवस्था गड़बड़ी का शिकार है क्योंकि - निर्यात कम है, उधार की वृद्धि सुस्त है, औद्योगिक उत्पादन स्थिर है, क्षमता का उपयोग मंद है। सबसे बुरी बात और राजनीतिक रूप से सबसे ज्वलंत, रोज़ गार की स्थिति है नए रोजगार नहीं पैदा हो रहे है। स्थिति इतनी खराब है कि निराशाजनक मोदी सरकार नौकरियों के मामले में अपनी विशाल विफलता को छिपाने के लिए नक्ली डेटा को प्रचारित कर रही है।

ऐसी परिस्थितियों में, इन विनिवेश उपकरणों द्वारा खातों/पुस्तकों को संतुलित करने से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक को खुश किया जा सकता है, लेकिन यह शायद ही लोगों को संतुष्ट कर पाएगा।

disinvestment
neo liberalism
Modi government
PSUs

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन संकट, भारतीय छात्र और मानवीय सहायता
    01 Mar 2022
    यूक्रेन में संकट बढ़ता जा रहा है। यूक्रेन में भारतीय दूतावास ने मंगलवार को छात्रों सहित सभी भारतीयों को उपलब्ध ट्रेन या किसी अन्य माध्यम से आज तत्काल कीव छोड़ने का सुझाव दिया है।
  • Satellites
    संदीपन तालुकदार
    चीन के री-डिज़ाइंड Long March-8 ने एक बार में 22 सेटेलाइट को ऑर्बिट में भेजा
    01 Mar 2022
    Long March-8 रॉकेट चीन की लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी की अकादमी में बना दूसरा रॉकेट है।
  • Earth's climate system
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: अब न चेते तो कोई मोहलत नहीं मिलेगी
    01 Mar 2022
    आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा है कि जलवायु परिवर्तन से आर्थिक दरार गहरी होगी, असमानता में इजाफ़ा होगा और ग़रीबी बढ़ेगी। खाने-पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ेंगे और श्रम व व्यापार का बाजार…
  • nehru modi
    डॉ. राजू पाण्डेय
    प्रधानमंत्रियों के चुनावी भाषण: नेहरू से लेकर मोदी तक, किस स्तर पर आई भारतीय राजनीति 
    01 Mar 2022
    चुनाव प्रचार के 'न्यू लो' को पाताल की गहराइयों तक पहुंचता देखकर व्यथित था। अचानक जिज्ञासा हुई कि जाना जाए स्वतंत्रता बाद के हमारे पहले आम चुनावों में प्रचार का स्तर कैसा था और तबके प्रधानमंत्री अपनी…
  • रवि शंकर दुबे
    पूर्वांचल की जंग: यहां बाहुबलियों के इर्द-गिर्द ही घूमती है सत्ता!
    01 Mar 2022
    यूपी में सत्ता किसी के पास भी हो लेकिन तूती तो बाहुबलियों की ही बोलती है, और पूर्वांचल के ज्यादातर क्षेत्रों में उनका और उनके रिश्तेदारों का ही दबदबा रहता है। फिर चाहे वो जेल में हों या फिर जेल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License