NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
समाज
भारत
राजनीति
ज़रूरी बात: जो आंदोलनजीवी है असल मायने में वही सच्चा देशभक्त है!
इस देश को आंदोलन जीवियों से ख़तरा नहीं है, बल्कि ऐसे राजनेताओं से ख़तरा है जो आंदोलनों को ख़ारिज करते हैं। आंदोलन समाज के संतुलन को बिगाड़ने के लिए नहीं होते बल्कि समाज के बिगड़े हुए संतुलन को सही करने के लिए किए जाते हैं।
अजय कुमार
10 Feb 2021
modi

आज़ाद भारत का निर्माण ही आंदोलन की बुनियाद पर हुआ है। भारत की कल्पना बिना आंदोलनों के नहीं की जा सकती। भारत में आंदोलन बदलाव के जरिए हैं। आंदोलनों के बिना भारतीय लोकतंत्र कुछ लोगों की हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएगा। इसलिए अगर यह कहा जाए कि जो लोग आंदोलनों को भारत के ख़िलाफ़ बता रहे हैं, आंदोलनों से भारत को बचाने की सलाह दे रहे हैं, वे दरअसल भारत के ही ख़िलाफ़ हैं। वे या तो भारत की आत्मा को जानते नहीं है या भारत की आत्मा को मार देना चाहते हैं।

अगर ऐसी बातें आम लोगों के बीच होतीं तो नज़रअंदाज़ किया जा सकता था, लेकिन अफ़सोस ऐसी बातें भारतीय संसद में  प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति के भाषण से निकल रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद अपने धन्यवाद भाषण में कहा कि इस देश में आंदोलन-जीवी की एक नई जमात पैदा हो गई है। हमें ऐसे लोगों की पहचान करनी होगी। उनसे राष्ट्र की रक्षा करनी होगी। वे परजीवी हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य पर जवाब देते हुए लिखा कि वे अतीतजीवी हैं, घृणाजीवी हैं, भाषणजीवी हैं, चुनावजीवी हैं, अफ़वाहजीवी हैं, लेकिन उन्हें आंदोलनजीवी पसंद नहीं। वे झूठतंत्र‌, छलतंत्र और और लाठी तंत्र से लोकतंत्र को हांकना चाहते हैं। वे तर्क को अर्द्धसत्य से पराजित करना चाहते हैं और  विवेक और संवेदना को  देशनिकाला देना चाहते हैं।

अब चलिए थोड़ा बुनियाद पर बात करते हैं आंदोलन क्यों होते हैं? कोई कह सकता है कि अंग्रेज तो चले गए। अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़ी गई। भारत एक आज़ाद मुल्क है। लोगों द्वारा चुने हुए लोग ही शासन व्यवस्था में जाते हैं। तो इनके ख़िलाफ़ आंदोलन करने की क्या जरूरत है?

जो ऐसे सवाल करते हैं उनसे पूछना चाहिए कि क्या भारत की सारी परेशानियां खत्म हो गई? क्या भारत में सभी लोगों की आजादी समानता न्याय तक पहुंच हो गई? अगर अब भी भारत की 85  फ़ीसदी से अधिक आबादी दस हजार रुपए से काम की महीने की मेहनताना पर जीती है तो कैसे कहा जाता है कि लोकतंत्र में शासनव्यवस्था अपना काम सही तरीके से कर रही है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि असल में स्वराज तब नहीं आएगा जब अंग्रेज चले जाएंगे और कुछ मुट्ठी भर हिंदुस्तानी शासन करने की गद्दी पर बैठेंगे। असल में स्वराज तब आएगा जब सबके अंदर यह क्षमता पैदा हो जाएगी कि अगर शासन व्यवस्था के पद पर बैठे हुए लोग शासन व्यवस्था का उल्लंघन करने लगें तो सभी लोग मिलकर उसका विरोध कर सकें। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो स्वराज तभी आएगा जब सभी लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जाएगा, उनके अंदर यह भावना पैदा हो जाए कि वह इकट्ठा होकर शासन व्यवस्था को नियंत्रण और नियमन करने की काबिलियत रखने लगे। इसलिए नागरिकता और जनवाद के मूल में है कि वह अथॉरिटी के अपने शक्तियों का गलत तरीके से इस्तेमाल करने पर उसका विरोध करे।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद द हिन्दू अख़बार के अपने एक लेख में लिखते हैं  कि जब आप बोलते हैं तो आप उम्मीद करते हैं कि कोई सुनेगा। इसलिए विरोध प्रदर्शन और आंदोलन तब होते हैं जब लोगों को लगता है कि वह अपनी परेशानी बता रहे हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। वह एक ऐसी स्थिति में चले गए हैं जो गैर बराबरी वाली है। अपनी गैर बराबरी को दूर कर बराबरी पर आने के लिए लोगों के जरिए विरोध प्रदर्शन और आंदोलन किए जाते हैं।

इसका मतलब यह है कि आंदोलनों की वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा नहीं है। बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा तब है जब लोगों को शांतिपूर्ण आंदोलन से रोका जाए। आंदोलन के जरिए राष्ट्रीय संकट पैदा नहीं होता है। बल्कि राष्ट्रीय संकट सरकारों के काम से पैदा होता है। तब यह संकट पैदा होता है जब सरकार के द्वारा नागरिकता संशोधन कानून जैसे भेदभाव कारी कानून बनाए जाते हैं। राष्ट्रीय संकट पैदा होता है जब सालों साल किसानों को अपनी उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती है। कहने का मतलब यह है कि इस देश को आंदोलन जीवियों से ख़तरा नहीं है बल्कि ऐसे राजनेताओं से ख़तरा है जो आंदोलनों को ख़ारिज करते हैं। आंदोलन समाज के संतुलन को बिगाड़ने के लिए नहीं होते बल्कि समाज के बिगड़े हुए संतुलन को सही करने के लिए किए जाते हैं।

अब किसान आंदोलन को ही देख लीजिए। आखिरकार यह क्यों किया जा रहा है? इसलिए किया जा रहा है क्योंकि सरकार और सरकार समर्थक यह कह रहे हैं कि नए कृषि कानून किसानों की भलाई के लिए हैं लेकिन किसानों की आवाज को नहीं सुन रहे हैं। किसानों की आवाज को अनसुना कर दे रहे हैं। जब सत्ता और आम लोगों के बीच इस तरह की खाई होती है तब आंदोलन ही वह रास्ता बचता है कि सत्ता तक अपनी बात पहुंचाई जाए। किसान आंदोलन यही कर रहा है। प्रधानमंत्री इस आंदोलन की आवाज को सुनने की बजाय इसे ख़ारिज करने में लगे हुए हैं। 

प्रधानमंत्री अपने वक्तव्य में एक और बात करते हैं। वह कहते हैं कि एक टोली है जो हर तरह के आंदोलनों में शामिल हो जाती है। वह किसानों के आंदोलन में भी शामिल होती है, वकीलों के आंदोलन में भी शामिल होती है, छात्रों के आंदोलन में भी शामिल होती है। प्रधानमंत्री कहना चाह रहे हैं कि छात्रों के आंदोलन में उनका क्या काम जो छात्र नहीं है। किसानों के आंदोलन में उनका क्या काम जो किसान नहीं है। वकीलों के आंदोलन में उनका क्या काम जो वकील नहीं है। प्रधानमंत्री के इसी तर्क पर प्रधानमंत्री से पूछना चाहिए कि ना ही प्रधानमंत्री डॉक्टर हैं, ना ही वकील है, ना ही प्रोफेसर हैं, ना ही छात्र हैं, ना ही किसान हैं तो वह इतने बड़े समाज के प्रधानमंत्री के पद पर क्यों बैठे हैं? जहां पर तमाम तरह के पेशे से जुड़े हुए लोग हैं। तमाम तरह की परेशानियां हैं। जिन परेशानियों और पेशों से उनके निजी जीवन का कोई लेना देना नहीं। अगर प्रधानमंत्री पत्रकारों के सवालों का सीधे तौर पर जवाब देते तो एक पत्रकार होने के नाते उनसे मैं यह सवाल ज़रूर पूछता। लेकिन शायद वह दिन कभी आए ही ना। क्योंकि प्रधानमंत्री आपसी संवाद में नहीं केवल थोथी भाषणबाजी में यकीन करते हैं।

आंदोलन की असल अगुवाई उसकी मांग करती है। मांग जायज होती है तो कई तरह के, कई क्षेत्रों से जुड़े लोग, कई पेशों  से जुड़े लोग आंदोलन से जुड़ते चले जाते हैं। भारत की आजादी की लड़ाई में यह नहीं देखा गया कि कौन डॉक्टर है, इंजीनियर है, किसान है। सबने एक मकसद के लिए लड़ाई लड़ी। ठीक इसी तरह कृषि क़ानून के विरोध और एमएसपी की मांग से जुड़े आंदोलन में आंदोलन को यह कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि आंदोलन से जुड़े हुए लोगों में किसानों के अलावा दूसरे पेशों से भी जुड़े लोग हैं। अगर सरकार के किसी अहम पद पर बैठे व्यक्ति की तरफ से ऐसी राय रखी जाती है तो इसका मतलब है कि आंदोलन की जायज मांगों से भटकाने के लिए ऐसी राय रख रहा है जिसका मकसद केवल मीडिया मैनेजमेंट से है। भोली भाली जनता को भटकाने से है।

मौजूदा समय में पूरे शासन व्यवस्था पर पैसा इतना अधिक हावी है कि लोकतंत्र पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। जिसके पास पैसा है वही नेता है उसी की नीति है उसी का मीडिया है उसी का प्रशासन है। इसलिए ऐसे दौर में आम जनता के लिए आंदोलन ही एक हथियार है। बहुत सारे गंभीर राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक यह मानने लगे हैं कि भारत का भविष्य आंदोलनों के जरिए ही सुधर सकता है। बिना जनता के आंदोलन एक बार सरकार के बारे में सोच कर देखिए। भारतीय समाज लोकतंत्र की बजाए चंद लोगों की मुट्ठी में  कैद होता हुआ नजर आएगा। इसलिए मौजूदा भारत में अगर कोई आंदोलन जीवी है तो उसे गर्व करना चाहिए। सही मायने में वही असल देशभक्त है।

andolanjeevi
naredra modi
mahtama gandhi
kisan movement
prime minister speech

Related Stories

साम्राज्यवाद पर किसानों की जीत

आंदोलन की क़ीमत: अभी तक अवमानना का सामना कर रहे हैं सीएए विरोधी आंदोलनकारी


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License