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इंग्लैंड और रूस के बीच समुद्री घमासान
सबसे बड़ा सवाल कि जिनेवा शिखर सम्मेलन से पुतिन को क्या हासिल हुआ?
एम. के. भद्रकुमार
05 Jul 2021
इंग्लैंड और रूस के बीच समुद्री घमासान
14 जून 2021 को बोस्फोरस से गुजरता एचएमएस डिफेंडर, जो काला सागर तक जाने के लिए एक घटनापूर्ण मार्ग बन गया। 

रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने टीवी पर दिए अपने इंटरव्यू के दौरान बताया कि हफ्ते भर पहले क्रीमिया से दूर काला सागर में ब्रिटिश निर्देंशित प्रक्षेपास्त्र विध्वंसक एचएमएस डिफेंडर की रहस्यमयी संलग्नता एक ‘उकसावे’ की कारर्वाई थी। पुतिन ने इसे एंग्लो-अमेरिकन मुहिम बताया। उनके इस इंटरव्यू का राष्ट्रव्यापी प्रसारण किया गया था।

पुतिन के ही शब्दों में “यह निश्चित रूप से एक उकसावा था, जो बिल्कुल स्पष्ट है। उकसानेवाला क्या दिखाना चाहते थे और इससे उनको क्या मकसद हासिल हुआ? इस संदर्भ सबसे पहली बात कि यह (उकसावा) व्यापक था, और  इसे केवल ब्रिटिश ने ही अंजाम नहीं दिया था, बल्कि अमेरिका भी इसमें संलिप्त था क्योंकि ब्रिटेन का युद्धपोत दोपहर बाद हमारे समुद्री क्षेत्र में दाखिल हुआ था। इसके पहले, सुबह में 7.30 बजे, अमेरिका के एक टोही युद्धक विमान ने, मेरा विश्वास है कि, क्रेते (ग्रीस) के नाटो हवाई अड्डे से उड़ान भरी थी। बाद में, इस घटना के बारे में मुझे रिपोर्ट भी मिल गई। हमने इसे देखा और इस पर स्पष्ट आकलन किया है।” 

राष्ट्रपति पुतिन ने उसी प्रसारण में आगे कहा, “यह बिल्कुल साफ है कि वह विध्वंसक सैन्य लक्ष्यों की खोज में हमारे जलक्षेत्र में घुसा था, वहीं सामरिक टोही विमान की मदद से यह थाहा जा रहा था कि उनके इस उकसावे पर हमारी सेना क्या जवाबी कार्रवाई कर सकती है; यह देखने के लिए कि किन सुविधाओं पर अमल किया जा रहा है, उनकी तैनाती की पोजिशनिंग क्या है और वे कैसे काम करती हैं। हमने यह देखा-भाला था और इसे अच्छी तरह से जानते थे कि इसलिए हमने केवल उसी सूचना का खुलासा किया कि, जिसे हमने इसके उपयुक्त पाया। फिर भी शायद मैंने एक राज जाहिर कर दिया है, इसके लिए अपनी सेना से खेद व्यक्त करता हूं।” 

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस परिघटना के पूरे हफ्ते भर बाद 23 जून 2021 को इस बारे में तफसील से अपनी बात रखी। वे शायद इस पर बात न भी करते अगर ब्रिटेन और अमेरिका में डीप स्टेट ने उन्हें पिन नहीं चुभोया होता और उन्हें लाचार नहीं माना होता। इसी डीप स्टेट ने पुतिन को बलात बोलने पर मजबूर किया। 

ब्रिटेन के एक महत्वपूर्ण अखबार टेलीग्राफ के मुताबिक, क्रीमिया के करीब हो कर एचएमएस डिफेंडर को गुजारने का फैसला ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा सरकार की एक उच्चस्तरीय बैठक में लिया गया था। यह नामुमकिन है कि इस घटनाक्रम से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को अंधेरे में रखा गया होगा, खास कर यह देखते हुए कि रूस को उकसाने की यह ताजा कार्रवाई अमेरिका की अगुवाई में काला सागर में नाटो के कई देशों के साथ जारी व्यापक सैन्य अभ्यास की पृष्ठभूमि में रची गई थी। 

पुतिन के टीवी पर अपनी बात रखने के तीन दिन पहले, लंदन ने ‘वर्गीकृत’ ब्रिटिश रक्षा दस्तावेजों को लेकर एक अतिनाटकीयता रची, जिसमें एचएमएस डिफेंडर के बारे में ब्योरा दिया गया था। इसमें कहा गया कि ये दस्तावेज दक्षिणी इंग्लैंड के केंट में बने ‘बस स्टाप के पीछे एक दलदली ढेर’ में ‘पाए’ गए थे, बाद में इनकी घोषणा की गई। लेकिन बीबीसी जिसका भ्रामक सूचना फैलाने का खास अधिकार मिला हुआ है, उसके मुताबिक ‘क्रीमिया के दक्षिणी-पश्चिमी सिरे के करीब’ युद्धपोत का संचालन, सच में, एक दुस्साहिक कार्य था, जिसे इस ‘उम्मीद में अंजाम दिया गया था कि क्रेमलिन इस पर आक्रामक रवैया अपना सकता है।’ 

सचमुच, ब्रिटेन ने क्रेमलिन का मजाक उड़ाया। यह धारावाहिक पहले से तय था। दूसरे शब्दों में, यह खुलासा करना था कि क्रेमलिन केवल भौंकता है, काटता नहीं है। यह जाहिर करना था कि मास्को में नाटो की सैन्य ताकत का मुकाबला करने का माद्दा नहीं है। 

इसके विपरीत, पुतिन उस राय से इत्तेफाक नहीं रखते। वह इस पूरे प्रसंग में एक ‘राजनीतिक तत्व’ देखते हैं, जिसने वास्तव में ‘दुनिया को एक विश्व युद्ध के कगार पर’ नहीं ला दिया है। उन्होंने इसी तुर्शी दर तुर्शी जबाव दिया, यह दावा करते हुए कि अगर रूस ने ब्रिटिश युद्ध जलपोत को डुबा दिया होता, ‘जिन्होंने यह किया था’, वे युद्ध में नहीं उतर सकते थे क्योंकि वे जानते हैं कि ‘रूस के खिलाफ वे ऐसी जंग नहीं जीत सकते।’

पुतिन मानते हैं कि उकसावे का मकसद इस बात पर ‘बल देता है कि ये लोग क्रीमियाइयों’ के रूसी गणराज्य में शामिल होने की उनकी पसंद की इज्जत ही नहीं करते। यह मास्को की अंतररारष्ट्रीय कानून के संदर्भ में दुविधा में है-कुछ वैसा ही जैसे चीन को दक्षिण चीन सागर में सामना करना पड़ता है। 

वास्तविकता है कि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय समुदाय रूस का रूस पर दखल की मान्यता नहीं देता है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून का केंद्रीय अभिमत है कि देशों के बीच भूभाग की मिल्कियत में बदलाव रजामंदी से ही हो सकता है। बेशक, रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी वीटो शक्तिसंपन्न देश है और क्रीमिया पर रूस के कब्जे को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मौन प्रतिक्रिया रही है। 

अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई पुलिसवाला तो होता नहीं है। बहरहाल, अगर वाकई रूस ने ब्रिटिश युद्धपोत को डुबो दिया होता या उस पर चढ़ जाता तो यह जंग की कार्रवाई मानी जाती, जिसके व्यापक परिणाम होते। पुतिन को यह पता ही होगा।

यह मामला यहीं पर खत्म नहीं हो जाता। क्रेमलिन को यह मालूम है कि वाशिंगटन एवं लंदन ने रूस का जवाब जानने के लिए पहले फायर कर दिया है। यह भालू को उसकी मांद में जा कर भोंकना है। बिल्कुल स्पष्ट है कि चीजों को अभी आकार लेने की संभावना है, पुतिन ने रूस की सेना को संरक्षित सुविधाओं के इर्द-गिर्द वाले क्षेत्र एवं जल क्षेत्र को अवरुद्ध कर देने तथा उस तरफ होने वाली किसी अवैध घुसपैठों को रोक देने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति का यह फरमान पहली जुलाई को क्रेमलिन की आधिकारिक वेबसाइट पर रूसी भाषा में प्रकाशित किया गया है। 

दिलचस्प बात यह है कि, दस्तावेज में दी गई एक कैफियत नोट में कहा गया है कि रूसी नेशनल गार्ड केर्च जलडमरूमध्य के जल की रक्षा करते हैं, इस पर पुल बनाते हैं और क्रीमिया से जुड़ने वाले रूस के पॉवर ग्रिड के आसपास के जल क्षेत्र की निगरानी करते हैं।  

आजोव सागर, केर्च जलडमरूमध्य और क्रीमियन प्रायद्वीप का नक्शा

इसके अलावा, राष्ट्रपति का फरमान, इन संरक्षित सुविधाओं के आसपास के जलक्षेत्र में होने वाली ‘अवैध आवाजाही एवं घुसपैठ के दौरान’ इन क्षेत्रों को घेरने के लिए रूस की सेना को कानूनी अधिकार भी प्रदान करता है। यह ब्रिटिश सेना विध्वंसक एचएमएस डिफेंडर के कथित रूप से काला सागर में ‘रूसी जलक्षेत्र में घुसपैठ’ करने के ठीक एक हफ्ते बाद जारी हुआ है। ब्रिटेन की स्थिति यह है कि उसके विध्वंसक ने अंतरराष्ट्रीय कानून पर चलते हुए यूक्रेन के जलक्षेत्र हो कर शांतिपूर्ण तरीके से गुजरा है और वहां चेतावनी देने के लिए कोई गोली नहीं दागी गई थी।

इस प्रकार, रूस ने वास्तव में अपने घरेलू कानूनों के जरिए केर्च जलडमरूमध्य को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हालांकि रूस और यूक्रेन 2003 में हुई परस्पर संधि के बाद केर्च जलडमरूमध्य पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखते हैं। राष्ट्रपति पुतिन के फरमान के साथ, मास्को का समूचे आजोव सागर पर नियंत्रण हो जाएगा, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक अंतर्देशीय सागर है, जो काला सागर, मरमारा सागर, ईजियन सागर एवं भूमध्य सागर हो कर अंटलांटिक महासागर तक जाने का मार्ग है। 

सचमुच ही, मास्को की बढ़त से विवाद का एक नया बिंदु बन गया है, क्योंकि यूक्रेन के औद्योगिक बंदरगाह शहर मारिपोल की लगभग 500,000 लाख आबादी आजोव सागर के तटवर्ती इलाके में बसती है, वह अवरुद्ध हो गया है।  यूक्रेन से अनाज एवं इस्पात के होने वाले निर्यात का मार्ग होने की वजह से केर्च जलडमरूमध्य बहुत अहम है। 

पुतिन ने साफ कर दिया है कि किसी भी रूप में 23 जून की आवृत्ति हुई तो उसका माकूल जवाब दिया जाएगा किंतु रूस की प्रतिक्रिया ‘विषम’ होगी। यह नई सोच का एक अर्थपूर्ण उदाहरण हो सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात को नहीं मानेगा कि यूक्रेन मिसिल में एक अन्य कार्य संपन्न कर लिए हैं। 

यह पूरी तरह समझ में आने लायक है कि भालू को उसकी मांद में भोंकने का प्लॉट ब्रिटेन ने चतुराई से रचा था, जिसका मकसद यूक्रेन के प्रति रूसी रवैये के खिलाफ यूरोपीयन यूनियन की तरफ से  2014 में लगाए गए प्रतिबंधों को क्रीमिया मसले का हल होने तक जारी रखना था। ब्रेक्जिट के बाद भी ईयू का एजेंडा तय करना जारी रखने के लिए ब्रिटेन पर भरोसा करें। 

सबसे बड़ा सवाल है, जिनेवा शिखर सम्मेलन से पुतिन को क्या हासिल हुआ? उनके अनुचर उनके ‘जीतने’ का दावा करते हैं। लेकिन ऐसा मालूम होता है कि शिखर-वार्ता से बाइडेन हंसते हुए निकले हैं। वाशिंगटन और लंदन में क्रेमलिन को अंकुश लगाने का उच्चस्तरीय निर्णय या तो शिखर सम्मेलन के दौरान लिया जा सकता था या उसके तत्काल बाद। किसी भी तरह, यह शिखर सम्मेलन को परिभाषित करता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

Anglo-American Tripwire Traps Russian Bear

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