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राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अंतरराष्ट्रीय संबंध, संयुक्त राष्ट्र और इंटर प्रेस सर्विस
रोबेर्टो सेवियो
02 Sep 2014

रोम, अगस्त 22 2014 (आई.पी.एस.) – 1979 में मैंने संयुक राष्ट्र में स्व. स्टन स्विंटन जोकि काफी शक्तिशाली और ए.पी. प्रेस के निदेशक थे। एक बिंदु पर, मैंने निम्नलिखित आंकड़े पेश किये जोकी  मीडिया में पश्चिमी पूर्वाग्रह का एक उदाहरण के रूप में थे (जो परवर्तन के लिए काफी धीमे थे):

1964 में, चार अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियां – ए.पी,, यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (यु.पी.आई), एजेन्स फ़्रांस प्रेस (ए.ऍफ़.पी) और रियूटर – दुनिया के 92 प्रतिशत सूचना प्रवाह को संभालती थी। सोवियत समाचार एजेंसी तास(TASS) अन्य औद्योगिक देशों सहित एजेंसियां 7 प्रतिशत समाचार संभालती थी। बाकी दुनिया मात्र 1 प्रतिशत।

ऐसी दुनिया में जहां हम नए गठबंधन बनाने की जरूरत है, आईपीएस की प्रतिबद्धता शांति और सहयोग की सेवा में, बेहतर जानकारी के लिए अपने काम जारी रखने के लिए है। मैंने पूछा  कि क्यों पूरी दुनिया एपी से जानकारी प्राप्त करने के लिए बाध्य थी? जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की हमेशा इसमें दखल थी। स्विंटन का जवाब संक्षिप्त था और सीधा था: "रॉबर्टो, हमारे राजस्व का 99 प्रतिशत अमेरिकी से आता है। क्या तुम्हे लगता है वे गृह सचिव में ज्यादा रुचि रखते हैं, या एक अफ्रीकी मंत्री में हैं? "

1964 में इंटर प्रेस सेवा (आईपीएस) के निर्माण के पीछे संरचनात्मक वास्तविकता यह थी, कि एक ही वर्ष में जो विकासशील देशों के समूह 77 (G77) गठबंधन ने इसमें एक नयी रौशनी देखी। जो भी कारण के लिए, राजनीतिक या आर्थिक - मैंने इसे अस्वीकार्य पाया कि जानकारी वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं थी और किन्ही कारणों से राजनितिक या आर्थिक - यह मानव जाति के दो तिहाई हिस्से को बाहर छोड़ रही थी।

हमने पत्रकारों का एक अंतरराष्ट्रीय गैर लाभ सहकारी सेट-अप बनाया, क़ानून - से - जिसमें हर श्रमजीवी पत्रकार का एक हिस्सा था और जिसमें  मेरे जैसे लोग जो उत्तर से थे सदस्यता का 20 प्रतिशत से अधिक सदस्यता के हक़दार नहीं थे।

महत्वपूर्ण बात यह तय की गयी थी कि, हम उत्तर से कोई भी दक्षिण से रिपोर्ट नहीं कर सकता था। हमने खुद को यह चुनौती दी थी कि हम उस उत्तरी दावों की मान्यता को खंडित करें जिसमें यह कहा जाता था कि दक्षिण में पेशेवर गुणवत्ता की कमी है, और उसी का खंडन करने के लिए विकासशील देशों केपत्रकारों को अवसर उपलब्ध कराना चाहते थे।

दो अन्य महत्वपूर्ण कारक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों से आईपीएस को विभेदित करते हैं।

सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय कवरेज के लिए आईपीएस का सर्जन किया गया जबकि इसके विपरीत राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करने के मुख्य कार्य के अलावा एपी, यु.पी.आई., एएफपी और रायटर्स को ही , अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करने के लिए बनाया गया था ।

दूसरा, आईपीएस को दीर्घकालिक प्रक्रिया के लिए बनाया गया था न सिर्फ घटनाओं को कवर करने के लिए। ऐसा करके, हम उन लोगों के लिए एक आवाज देने का काम कर रहे थे जो  जानकारी के पारंपरिक प्रवाह से अनुपस्थित थे – केवल दक्षिण के देश ही नहीं, बल्कि हम इस तरह उपेक्षित अभिनेता जैसे महिलाओं, स्वदेशी लोगों, जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे लोगो, और  मानव अधिकार, पर्यावरण, बहुसंस्कृतिवाद, अंतरराष्ट्रीय सामाजिक न्याय और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे थे ।

बेशक, यह सब आसानी से न तो  समझा गया और न ही इसे स्वीकार किया गया।

हमने तय किया कि दक्षिण के देशों में राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, रेडियो और टीवी स्टेशनों के निर्माण का का समर्थन किया जाए, क्योंकि हमने इसे जानकारी के बहुलवाद की दिशा में कदम के रूप में देखा। वास्तव में, वास्तव में हमने ऐसी 22 राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के सेट-उप करने में मदद की।

इसने दोनों किनारों के आर-पार अविश्वास पैदा कर दिया। दक्षिण के कई सुचना मंत्री हमें संदिग्ध नज़रों से देखने लगे, जबकि हम उपयोगी और जायज लड़ाई में व्यस्त थे,  हमने किसी  भी राज्य के नियंत्रण को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उत्तर में, पारंपरिक और निजी मीडिया हमें तीसरी दुनिया एक "प्रवक्ता" के रूप में देखने लगा।

1973, में गुट निरपेक्ष आंदोलन की प्रेस एजेंसियों का ​​पूल आईपीएस का उपयोग करने के लिए सहमत हो गया, जोकी अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर के रूप में हर जगह बढ़ रहा था। उस ही समय में, संयुक्त राष्ट्र में, एक नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था(NIEO)  की स्थापना की कोशिश चल रही थी और इसे सुरक्षा परिषद के पूर्ण समर्थन के साथ महासभा द्वारा अनुमोदित किया गया था।

ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया वैश्विक शासन की और बढ़ रही है, और जोकि विश्व आर्थिक व्यवस्था के लिए एक आधारशिला का काम करेगी और मूल्यों के रूप में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक न्याय, भागीदारी और विकास के विचारों पर आधारित होगी। 1981 में इस सब का अंत हो गया।  संयुक्त राज्य अमेरिका में रोनाल्ड रीगन और यूनाइटेड किंगडम में मार्गरेट थैचर ने बहुपक्षवाद को और सामाजिक न्याय की अवधारणा को ही नष्ट करने का फैसला किया।।

सबसे पहला कदम लिया गया कि, सभी देशों को जो आईपीएस के साथ काम कर रहे थे को हमारे साथ संबंध तोड़ने होंगें और उन्हें अपने सुचना की राष्ट्रीय व्यवस्था को ख़त्म करना होगा। कुछ वर्षों के भीतर, राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, और रेडियो और टीवी स्टेशनों की बड़ी संख्या गायब हो गयी। अब से, जानकारी एक बाजार की वस्तु बन गयी , न कि एक नीति।

संयुक्त राज्य अमेरिका और (सिंगापुर के साथ) यूनाइटेड किंगडम ने संयुक्त राष्ट्र वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक संगठन (यूनेस्को) से कदम पीछे हटा लिए और  NIEO के लिए राष्ट्रीय प्रणाली स्थापित करने की नीति के रूप में एक नई अंतर्राष्ट्रीय सूचना ऑर्डर (NIIO) स्थापित करने के लिए नया कदम उठाया।

आईपीएस देशों द्वारा वित्त पोषित नहीं था, यह एक स्वतंत्र संगठन था, भले ही हमने जानकारी की राष्ट्रीय प्रणाली की दुनिया से हमारे सभी ग्राहकों को खो दिया है, पर हम बच गए, लेकिन हमने नए गठबंधनों को खोजने का फैसला किया, वे जो मानव अधिकार, पर्यावरण जैसे वैश्विक मुद्दों में रुचि रखते थे के साथ भागीदारी और न्याय पर आधारित वैश्विक शासन चाहते थे और  उसकी खोज जारी रखना चाहते थे।

यह ध्यान देने की बात है कि संयुक्त राष्ट्र के एक समानांतर मार्ग पर चल रहा था। 1990 के दशक में, बुट्रोस बुट्रोस-घाली, छठे संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने, वैश्विक मुद्दों पर दुनिया भर में सम्मेलनों की एक श्रृंखला शुरू की, पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) के साथ - 1992 में रियो डी जनेरियो में प्रथम – पर व्यापक 'पृथ्वी शिखर सम्मेलन' का आयोजन किया।

पहली बार न केवल आईपीएस को - एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के रूप में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक सामाजिक परिषद (ECOSOC) द्वारा मान्यता दी गयी और – बल्कि कोई भी गैर सरकारी संगठन जिसकी पर्यावरण के मुद्दों के साथ संबंध है या दिलचस्पी है भी इसमें भाग ले सकता था।

असल में, हमने वास्तव में दो सम्मेलनों का आयोजन किया, हालांकि दोनों केवल 36 किलोमीटर की दूरी के पर थे: एक, 15,000 प्रतिभागियों के साथ अंतर सरकारी सम्मेलन, और अन्य एनजीओ फोरम, 20,000 से अधिक प्रतिभागियों के साथ नागरिक समाज के सम्मेलन। और यह स्पष्ट था कि नागरिक समाज मंच कई प्रतिनिधियों की तुलना में पृथ्वी शिखर सम्मेलन की सफलता के लिए जोर दे रहा था!

दो अलग अलग समारोहों के लिए संचार स्थान को बनाने के लिए, आईपीएस ने एक दैनिक समाचार पत्र निकालने का फैसला लिया  - उस अखबार का नाम था टेरा विवा – जिसे सामुदायिक भावना पैदा करने के क्रम में व्यापक रूप से वितरित किया जाना था। हमने 1990 के दशक में संयुक्त राष्ट्र के अन्य का आयोजन वैश्विक सम्मेलनों में ऐसा करना जारी रखा(बीजिंग में महिलाओं पर 1995 में 1994 में काहिरा में जनसंख्या पर 1993 में वियना में मानवाधिकार, और 1995 में कोपेनहेगन में सामाजिक शिखर सम्मेलन पर)।

हमने इसे एक दैनिक प्रकाशन के रूप में बनाए रखने का फैसला किया, जिसे कि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के जरिए वितरित किया जाना था: यह दैनिक टेरा विवा है जो आप तक पहुँचता है, और आईपीएस और संयुक्त राष्ट्र के परिवार के सदस्यों के बीच की कड़ी है

इस पृष्ठभूमि में, दुनिया में अचानक 1980 के दशक के अंत में दुखद घटना घटी और वह थी शीत युद्ध का अंत जिससे कि दुनिया की राजनीती ने एक बदतर मोड़ ले लिया, उस वक्त वे सभी पूर्व और पश्चिम के बीच अनसुलझे सवाल खड़े हुए जो इस अवधि में कहीं न कहीं दफ़न हो गए थे।

इस साल, उदाहरण के तौर पर, संघर्ष में विस्थापित व्यक्तियों की संख्या उतनी ही पहुँच गयी जोकि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में थी।

सामाजिक अन्याय, राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, एक अभूतपूर्व गति से बढ़ रही था। दुनिया में 50 सबसे अमीर आदमियों ने (जिनमें एक भी महिला नहीं थी) 2013 में ब्राजील और कनाडा के राष्ट्रीय बजट के बराबर धन अर्जित कर लिया था।

ऑक्सफेम के अनुसार, वर्तमान गति से, वर्ष 2030 तक यूनाइटेड किंगडम में, जैसा महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में था वैसा ही सामाजिक असमानता होगी, यह वह समय था जब  कार्ल मार्क्स के नाम से एक अज्ञात दार्शनिक नई औद्योगिक क्रांति में बच्चों के शोषण की अपनी पढ़ाई पर ब्रिटिश संग्रहालय के पुस्तकालय में काम कर रहा था।

पचास साल आईपीएस के निर्माण के बाद,  मेरा पहले से भी ज्यादा विश्वास है कि दुनिया में किसी तरह के वैश्विक शासन के बिना अस्थिरता रहेगी। इतिहास ने हमें दिखा दिया है कि सैन्य श्रेष्ठता से नहीं आ सकती है। और अब ऐसी घटनायें इतिहास में तेजी से हो रही हैं।

मेरे जीवन के दौरान मैं 1956 में 600 मिलियन लोगों के एक देश को देखा है, स्कूलों, कारखानों और अस्पतालों में स्क्रैप से लोहा बनाने की कोशिश, आज वह देश 1.2 अरब की जनसँख्या का देश बन गया है, और दुनिया में अच्छी तरह से जाना जाने वाला सबसे औद्योगीकृत देश बनने की राह पर है।

दुनिया में 1964 में 3.5 अरब लोग थे, और अब 7 अरब से अधिक है और अगले 20 साल में  यह आबादी बढ़कर  9 अरब से अधिक हो जायेगी।

1954 में, उप सहारा अफ्रीका की आबादी 275 मिलियन निवासियों की थी, और अब, 800 करोड़ के आसपास है, जल्द ही अगले दशक में यह एक अरब हो जायेगी, यानी संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप की संयुक्त जनसंख्या से भी अधिक होगी।

1981 में रीगन और थैचर जो किया उसे दोहराना असंभव है – और, किसी भी तरह, हर किसी के लिए असली समस्या यह है कि किसी भी केंद्रीय मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं है, फिर चाहे वह परमाणु निरस्त्रीकरण से लेकर पर्यावरण का ही मुद्दा क्यों न हो।

वित्त ने अपना खुद का जीवन ले लिया है, आर्थिक उत्पादन और सरकारों की पहुंच से परे हो गया है। भूमंडलीकरण के दो इंजन, वित्त और व्यापार, संयुक्त राष्ट्र के दायरे का हिस्सा नहीं हैं। भूमंडलीकरण का मतलब 'अधिक खर्च करना', जबकि विकास का मतलब 'अधिक उत्पादन' है दोनों  का बहुत ही अलग मानदंड है।

सिर्फ 50 साल में,  जानकारी की दुनिया में कल्पना से भी परे बदलाव आया है। इंटरनेट ने  सामाजिक मीडिया को आवाज दी है और परंपरागत मीडिया गिरावट की ओर है। हम इतिहास में पहली बार सूचना की दुनिया से संचार की दुनिया में चले गए। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों अब, अंतर सरकारी संबंधों से परे चले गए हैं, और ‘इन्टरनेट’ ने  जवाबदेही और पारदर्शिता की नई मांग खड़ी कर दी है जिस पर आज लोकतंत्र आधारित है।

और, 50 साल पहले के विपरीत, नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों के बीच एक बढ़ती खाई है। 50 साल पहले एक भ्रष्टाचार के मुद्दे को रफा-दफा कर दिया जाता था, अब वह राजनीति के नवीकरण मुद्दा बन गया है। और यह सब, पसंद करें या नहीं, मूल रूप से मूल्यों आधारित मुद्दा है।

आईपीएस मूल्यों आधारित एक एक मंच था, जानकारी को अधिक लोकतांत्रिक और सहभागितापूर्ण बनाने के लिए, और उन लोगों को आवाज देने के लिए जिनके पास आवाज़ नहीं थी। पिछले 50 वर्षों में, अपने काम और समर्थन के माध्यम से, सैकड़ों और सैकड़ों लोगों को आशा थी कि वे एक बेहतर दुनिया के लिए योगदान दे रहे है। उनकी प्रतिबद्धता की एक व्यापक टेपेस्ट्री रही, जिसके तहत ‘द जर्नलिस्ट हु टर्न्ड द वर्ल्ड उपसाइड डाउन’ जैसी पुस्तक दी जिसे 100 से ज्यादा व्यक्तितवों और कार्यरत पत्रकारों ने लिखा था।

यह स्पष्ट है कि वे मूल्य आज भी आज भी जारी है, और जानकारी, जागरूकता और लोकतंत्र बनाने के लिए एक सुचना एक अपूरणीय उपकरण है, भले ही यह अधिक और अधिक घटना उन्मुख और बाजार उन्मुख एक वस्तु बनती जा रही है।

लेकिन, मेरे विचार में इसमें कोई शक नहीं है कि सभी आंकड़ें इस ओर इशारा करते यहीं कि हमें कुछ वैश्विक शासन की खोज करनी होगी, जोकि भागीदारी, सामाजिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर होगा, वरना हम नाटकीय टकराव और सामाजिक अशांति के नए युग में  प्रवेश कर जायेंगें।

हमें नए गठबंधन बनाने की जरूरत है, जहां दुनिया में, आईपीएस की प्रतिबद्धता बेहतर जानकारी के लिए अपने काम को जारी रख सके, शांति और सहयोग की सेवा में। और उन्हें समर्थन करने के लिए जो सपना एक जैसा ही सपना देखते हैं।

रॉबर्टो सैवियो आईपीएस संस्थापक अध्यक्ष है।रोम, अगस्त 22 2014 (आई.पी.एस.) – 1979 में मैंने संयुक राष्ट्र में स्व. स्टन स्विंटन जोकि काफी शक्तिशाली और ए.पी. प्रेस के निदेशक थे। एक बिंदु पर, मैंने निम्नलिखित आंकड़े पेश किये जोकी  मीडिया में पश्चिमी पूर्वाग्रह का एक उदाहरण के रूप में थे (जो परवर्तन के लिए काफी धीमे थे):

1964 में, चार अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियां – ए.पी,, यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (यु.पी.आई), एजेन्स फ़्रांस प्रेस (ए.ऍफ़.पी) और रियूटर – दुनिया के 92 प्रतिशत सूचना प्रवाह को संभालती थी। सोवियत समाचार एजेंसी तास(TASS) अन्य औद्योगिक देशों सहित एजेंसियां 7 प्रतिशत समाचार संभालती थी। बाकी दुनिया मात्र 1 प्रतिशत।

ऐसी दुनिया में जहां हम नए गठबंधन बनाने की जरूरत है, आईपीएस की प्रतिबद्धता शांति और सहयोग की सेवा में, बेहतर जानकारी के लिए अपने काम जारी रखने के लिए है। मैंने पूछा  कि क्यों पूरी दुनिया एपी से जानकारी प्राप्त करने के लिए बाध्य थी? जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की हमेशा इसमें दखल थी। स्विंटन का जवाब संक्षिप्त था और सीधा था: "रॉबर्टो, हमारे राजस्व का 99 प्रतिशत अमेरिकी से आता है। क्या तुम्हे लगता है वे गृह सचिव में ज्यादा रुचि रखते हैं, या एक अफ्रीकी मंत्री में हैं? "

1964 में इंटर प्रेस सेवा (आईपीएस) के निर्माण के पीछे संरचनात्मक वास्तविकता यह थी, कि एक ही वर्ष में जो विकासशील देशों के समूह 77 (G77) गठबंधन ने इसमें एक नयी रौशनी देखी। जो भी कारण के लिए, राजनीतिक या आर्थिक - मैंने इसे अस्वीकार्य पाया कि जानकारी वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं थी और किन्ही कारणों से राजनितिक या आर्थिक - यह मानव जाति के दो तिहाई हिस्से को बाहर छोड़ रही थी।

हमने पत्रकारों का एक अंतरराष्ट्रीय गैर लाभ सहकारी सेट-अप बनाया, क़ानून - से - जिसमें हर श्रमजीवी पत्रकार का एक हिस्सा था और जिसमें  मेरे जैसे लोग जो उत्तर से थे सदस्यता का 20 प्रतिशत से अधिक सदस्यता के हक़दार नहीं थे।

महत्वपूर्ण बात यह तय की गयी थी कि, हम उत्तर से कोई भी दक्षिण से रिपोर्ट नहीं कर सकता था। हमने खुद को यह चुनौती दी थी कि हम उस उत्तरी दावों की मान्यता को खंडित करें जिसमें यह कहा जाता था कि दक्षिण में पेशेवर गुणवत्ता की कमी है, और उसी का खंडन करने के लिए विकासशील देशों केपत्रकारों को अवसर उपलब्ध कराना चाहते थे।

दो अन्य महत्वपूर्ण कारकों अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों से आईपीएस विभेदित किया।

सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय कवरेज के लिए आईपीएस का सर्जन किया गया जबकि इसके विपरीत राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करने के मुख्य कार्य के अलावा एपी, यु.पी.आई., एएफपी और रायटर्स को ही , अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करने के लिए बनाया गया था ।

दूसरा, आईपीएस को दीर्घकालिक प्रक्रिया के लिए बनाया गया था न सिर्फ घटनाओं को कवर करने के लिए। ऐसा करके, हम उन लोगों के लिए एक आवाज देने का काम कर रहे थे जो  जानकारी के पारंपरिक प्रवाह से अनुपस्थित थे – केवल दक्षिण के देश ही नहीं, बल्कि हम इस तरह उपेक्षित अभिनेता जैसे महिलाओं, स्वदेशी लोगों, जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे लोगो, और  मानव अधिकार, पर्यावरण, बहुसंस्कृतिवाद, अंतरराष्ट्रीय सामाजिक न्याय और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे थे ।

बेशक, यह सब आसानी से न तो  समझा गया और न ही इसे स्वीकार किया गया।

हमने तय किया कि दक्षिण के देशों में राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, रेडियो और टीवी स्टेशनों के निर्माण का का समर्थन किया जाए, क्योंकि हमने इसे जानकारी के बहुलवाद की दिशा में कदम के रूप में देखा। वास्तव में, वास्तव में हमने ऐसी 22 राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के सेट-उप करने में मदद की।

इसने दोनों किनारों के आर-पार अविश्वास पैदा कर दिया। दक्षिण के कई सुचना मंत्री हमें संदिग्ध नज़रों से देखने लगे, जबकि हम उपयोगी और जायज लड़ाई में व्यस्त थे,  हमने किसी  भी राज्य के नियंत्रण को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उत्तर में, पारंपरिक और निजी मीडिया हमें तीसरी दुनिया एक "प्रवक्ता" के रूप में देखने लगा।

1973, में गुट निरपेक्ष आंदोलन की प्रेस एजेंसियों का ​​पूल आईपीएस का उपयोग करने के लिए सहमत हो गया, जोकी अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर के रूप में हर जगह बढ़ रहा था। उस ही समय में, संयुक्त राष्ट्र में, एक नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था(NIEO)  की स्थापना की कोशिश चल रही थी और इसे सुरक्षा परिषद के पूर्ण समर्थन के साथ महासभा द्वारा अनुमोदित किया गया था।

ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया वैश्विक शासन की और बढ़ रही है, और जोकि विश्व आर्थिक व्यवस्था के लिए एक आधारशिला का काम करेगी और मूल्यों के रूप में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक न्याय, भागीदारी और विकास के विचारों पर आधारित होगी। 1981 में इस सब का अंत हो गया।  संयुक्त राज्य अमेरिका में रोनाल्ड रीगन और यूनाइटेड किंगडम में मार्गरेट थैचर ने बहुपक्षवाद को और सामाजिक न्याय की अवधारणा को ही नष्ट करने का फैसला किया।।

सबसे पहला कदम लिया गया कि, सभी देशों को जो आईपीएस के साथ काम कर रहे थे को हमारे साथ संबंध तोड़ने होंगें और उन्हें अपने सुचना की राष्ट्रीय व्यवस्था को ख़त्म करना होगा। कुछ वर्षों के भीतर, राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, और रेडियो और टीवी स्टेशनों की बड़ी संख्या गायब हो गयी। अब से, जानकारी एक बाजार की वस्तु बन गयी , न कि एक नीति।

संयुक्त राज्य अमेरिका और (सिंगापुर के साथ) यूनाइटेड किंगडम ने संयुक्त राष्ट्र वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक संगठन (यूनेस्को) से कदम पीछे हटा लिए और  NIEO के लिए राष्ट्रीय प्रणाली स्थापित करने की नीति के रूप में एक नई अंतर्राष्ट्रीय सूचना ऑर्डर (NIIO) स्थापित करने के लिए नया कदम उठाया।

आईपीएस देशों द्वारा वित्त पोषित नहीं था, यह एक स्वतंत्र संगठन था, भले ही हमने जानकारी की राष्ट्रीय प्रणाली की दुनिया से हमारे सभी ग्राहकों को खो दिया है, पर हम बच गए, लेकिन हमने नए गठबंधनों को खोजने का फैसला किया, वे जो मानव अधिकार, पर्यावरण जैसे वैश्विक मुद्दों में रुचि रखते थे के साथ भागीदारी और न्याय पर आधारित वैश्विक शासन चाहते थे और  उसकी खोज जारी रखना चाहते थे।

यह ध्यान देने की बात है कि संयुक्त राष्ट्र के एक समानांतर मार्ग पर चल रहा था। 1990 के दशक में, बुट्रोस बुट्रोस-घाली, छठे संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने, वैश्विक मुद्दों पर दुनिया भर में सम्मेलनों की एक श्रृंखला शुरू की, पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) के साथ - 1992 में रियो डी जनेरियो में प्रथम – पर व्यापक 'पृथ्वी शिखर सम्मेलन' का आयोजन किया।

पहली बार न केवल आईपीएस को - एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के रूप में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक सामाजिक परिषद (ECOSOC) द्वारा मान्यता दी गयी और – बल्कि कोई भी गैर सरकारी संगठन जिसकी पर्यावरण के मुद्दों के साथ संबंध है या दिलचस्पी है भी इसमें भाग ले सकता था।

असल में, हमने वास्तव में दो सम्मेलनों का आयोजन किया, हालांकि दोनों केवल 36 किलोमीटर की दूरी के पर थे: एक, 15,000 प्रतिभागियों के साथ अंतर सरकारी सम्मेलन, और अन्य एनजीओ फोरम, 20,000 से अधिक प्रतिभागियों के साथ नागरिक समाज के सम्मेलन। और यह स्पष्ट था कि नागरिक समाज मंच कई प्रतिनिधियों की तुलना में पृथ्वी शिखर सम्मेलन की सफलता के लिए जोर दे रहा था!

दो अलग अलग समारोहों के लिए संचार स्थान को बनाने के लिए, आईपीएस ने एक दैनिक समाचार पत्र निकालने का फैसला लिया  - उस अखबार का नाम था टेरा विवा – जिसे सामुदायिक भावना पैदा करने के क्रम में व्यापक रूप से वितरित किया जाना था। हमने 1990 के दशक में संयुक्त राष्ट्र के अन्य का आयोजन वैश्विक सम्मेलनों में ऐसा करना जारी रखा(बीजिंग में महिलाओं पर 1995 में 1994 में काहिरा में जनसंख्या पर 1993 में वियना में मानवाधिकार, और 1995 में कोपेनहेगन में सामाजिक शिखर सम्मेलन पर)।

हमने इसे एक दैनिक प्रकाशन के रूप में बनाए रखने का फैसला किया, जिसे कि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के जरिए वितरित किया जाना था: यह दैनिक टेरा विवा है जो आप तक पहुँचता है, और आईपीएस और संयुक्त राष्ट्र के परिवार के सदस्यों के बीच की कड़ी है

इस पृष्ठभूमि में, दुनिया में अचानक 1980 के दशक के अंत में दुखद घटना घटी और वह थी शीत युद्ध का अंत जिससे कि दुनिया की राजनीती ने एक बदतर मोड़ ले लिया, उस वक्त वे सभी पूर्व और पश्चिम के बीच अनसुलझे सवाल खड़े हुए जो इस अवधि में कहीं न कहीं दफ़न हो गए थे।

इस साल, उदाहरण के तौर पर, संघर्ष में विस्थापित व्यक्तियों की संख्या उतनी ही पहुँच गयी जोकि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में थी।

सामाजिक अन्याय, राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, एक अभूतपूर्व गति से बढ़ रही था। दुनिया में 50 सबसे अमीर आदमियों ने (जिनमें एक भी महिला नहीं थी) 2013 में ब्राजील और कनाडा के राष्ट्रीय बजट के बराबर धन अर्जित कर लिया था।

ऑक्सफेम के अनुसार, वर्तमान गति से, वर्ष 2030 तक यूनाइटेड किंगडम में, जैसा महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में था वैसा ही सामाजिक असमानता होगी, यह वह समय था जब  कार्ल मार्क्स के नाम से एक अज्ञात दार्शनिक नई औद्योगिक क्रांति में बच्चों के शोषण की अपनी पढ़ाई पर ब्रिटिश संग्रहालय के पुस्तकालय में काम कर रहा था।

पचास साल आईपीएस के निर्माण के बाद,  मेरा पहले से भी ज्यादा विश्वास है कि दुनिया में किसी तरह के वैश्विक शासन के बिना अस्थिरता रहेगी। इतिहास ने हमें दिखा दिया है कि सैन्य श्रेष्ठता से नहीं आ सकती है। और अब ऐसी घटनायें इतिहास में तेजी से हो रही हैं।

मेरे जीवन के दौरान मैं 1956 में 600 मिलियन लोगों के एक देश को देखा है, स्कूलों, कारखानों और अस्पतालों में स्क्रैप से लोहा बनाने की कोशिश, आज वह देश 1.2 अरब की जनसँख्या का देश बन गया है, और दुनिया में अच्छी तरह से जाना जाने वाला सबसे औद्योगीकृत देश बनने की राह पर है।

दुनिया में 1964 में 3.5 अरब लोग थे, और अब 7 अरब से अधिक है और अगले 20 साल में  यह आबादी बढ़कर  9 अरब से अधिक हो जायेगी।

1954 में, उप सहारा अफ्रीका की आबादी 275 मिलियन निवासियों की थी, और अब, 800 करोड़ के आसपास है, जल्द ही अगले दशक में यह एक अरब हो जायेगी, यानी संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप की संयुक्त जनसंख्या से भी अधिक होगी।

1981 में रीगन और थैचर जो किया उसे दोहराना असंभव है – और, किसी भी तरह, हर किसी के लिए असली समस्या यह है कि किसी भी केंद्रीय मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं है, फिर चाहे वह परमाणु निरस्त्रीकरण से लेकर पर्यावरण का ही मुद्दा क्यों न हो।

वित्त ने अपना खुद का जीवन ले लिया है, आर्थिक उत्पादन और सरकारों की पहुंच से परे हो गया है। भूमंडलीकरण के दो इंजन, वित्त और व्यापार, संयुक्त राष्ट्र के दायरे का हिस्सा नहीं हैं। भूमंडलीकरण का मतलब 'अधिक खर्च करना', जबकि विकास का मतलब 'अधिक उत्पादन' है दोनों  का बहुत ही अलग मानदंड है।

सिर्फ 50 साल में,  जानकारी की दुनिया में कल्पना से भी परे बदलाव आया है। इंटरनेट ने  सामाजिक मीडिया को आवाज दी है और परंपरागत मीडिया गिरावट की ओर है। हम इतिहास में पहली बार सूचना की दुनिया से संचार की दुनिया में चले गए। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों अब, अंतर सरकारी संबंधों से परे चले गए हैं, और ‘इन्टरनेट’ ने  जवाबदेही और पारदर्शिता की नई मांग खड़ी कर दी है जिस पर आज लोकतंत्र आधारित है।

और, 50 साल पहले के विपरीत, नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों के बीच एक बढ़ती खाई है। 50 साल पहले एक भ्रष्टाचार के मुद्दे को रफा-दफा कर दिया जाता था, अब वह राजनीति के नवीकरण मुद्दा बन गया है। और यह सब, पसंद करें या नहीं, मूल रूप से मूल्यों आधारित मुद्दा है।

आईपीएस मूल्यों आधारित एक एक मंच था, जानकारी को अधिक लोकतांत्रिक और सहभागितापूर्ण बनाने के लिए, और उन लोगों को आवाज देने के लिए जिनके पास आवाज़ नहीं थी। पिछले 50 वर्षों में, अपने काम और समर्थन के माध्यम से, सैकड़ों और सैकड़ों लोगों को आशा थी कि वे एक बेहतर दुनिया के लिए योगदान दे रहे है। उनकी प्रतिबद्धता की एक व्यापक टेपेस्ट्री रही, जिसके तहत ‘द जर्नलिस्ट हु टर्न्ड द वर्ल्ड उपसाइड डाउन’ जैसी पुस्तक दी जिसे 100 से ज्यादा व्यक्तितवों और कार्यरत पत्रकारों ने लिखा था।

यह स्पष्ट है कि वे मूल्य आज भी आज भी जारी है, और जानकारी, जागरूकता और लोकतंत्र बनाने के लिए एक सुचना एक अपूरणीय उपकरण है, भले ही यह अधिक और अधिक घटना उन्मुख और बाजार उन्मुख एक वस्तु बनती जा रही है।

लेकिन, मेरे विचार में इसमें कोई शक नहीं है कि सभी आंकड़ें इस ओर इशारा करते यहीं कि हमें कुछ वैश्विक शासन की खोज करनी होगी, जोकि भागीदारी, सामाजिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर होगा, वरना हम नाटकीय टकराव और सामाजिक अशांति के नए युग में  प्रवेश कर जायेंगें।

हमें नए गठबंधन बनाने की जरूरत है, जहां दुनिया में, आईपीएस की प्रतिबद्धता बेहतर जानकारी के लिए अपने काम को जारी रख सके, शांति और सहयोग की सेवा में। और उन्हें समर्थन करने के लिए जो सपना एक जैसा ही सपना देखते हैं।

रॉबर्टो सैवियो आईपीएस संस्थापक अध्यक्ष है।

सौजन्य:  ipsnews.net

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

बौत्रोस बौत्रोस घली
आईसीओएसओसी
रोबेर्टो सावियो
यूएन
युएनसीटीएडी

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