NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बेचैन नेता, सहनशील जनता 
मोदी की अगुवाई वाली सरकार जितने अधिक सुधार करेगी उसकी लोकप्रियता उतनी ही घट सकती है और उसकी नीतियों के ख़िलाफ़ जन प्रतिरोध बढ़ेगा।
अजय गुदावर्ती
23 Sep 2020
Translated by महेश कुमार
मोदी

महामारी के पैर पसारने के बावजूद पिछले कुछ हफ्तों में हमने बड़ी घटनाएँ देखी हैं। जिसके तहत प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रमुख आर्थिक सुधार किए जिनमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति और अब कृषि विधेयक को पारित कराना शामिल है। ये नव-उदारवादी सुधारों की दिशा में प्रमुख कदम हैं जिन्हे पारित कराने का इंतजार सरकार कर रही थी, क्योंकि ऐसे सुधारों को हमेशा सार्वजनिक जन प्रतिरोध और आंदोलनों का सामना करने की संभावना बनी रहती है। 

मोदी अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता का फायदा उठा कर इन सुधारों को आगे बढ़ाना चाहते हैं और राष्ट्रवादी झांसे के तहत कॉरपोरेट्स को लाभ पहुँचाना चाहते हैं। खेल काफी ज़बरदस्त, दिलचस्प और खुला होता जा रहा है। वे संसाधनों पर अपनी पकड़ जमाने के लिए कई कॉर्पोरेट समर्थक सुधारों में तेजी लाने की कोशिश कर रहे हैं और मीडिया तो वैसे भी इन रियायतों और सुधारों पर निर्भर रहता है। मोदी के जीवन की झूठी और बड़ी-से-बड़ी छवि जो मीडिया बना रहा है, ऐसी छवी बनाना तब तक जारी रहेगा जब तक कि वह इन सुधारों को करता रहेगा। लेकिन वे जितने अधिक सुधार करेंगे उनकी लोकप्रियता में उतनी ही गिरावट आएगी और इन सुधारों और मोदी के खिलाफ जन प्रतिरोध के मजबूत होने की संभावना बढ़ती जाएगी।

पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी इसी तरह की स्थिति में फंस गई थी, लेकिन कुछ सामाजिक कल्याणकारी उपायों के माध्यम से वे इसे आगे बढ़ा पाए थे। नव-उदारवादी सुधारों के विस्तार के मनमोहन युग ने सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को भी बढ़ावा दिया था। लोकप्रिय मीडिया में इसे "नीतिगत पक्षाघात" के रूप में चित्रित किया गया था और जन रियायतों के प्रति नाखुशी जताई गई थी जिसे बाद में भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे-प्रबंधित-भाजपा-आरएसएस-समर्थित-मंच इंडिया अगेंस्ट करप्शन शो के माध्यम से आगे बढ़ाया गया था। मोदी इसके नए हेड के रूप में उभरे, जो कॉरपोरेट्स और वैश्विक पूंजी को बड़े इनाम या रियायतों का वादा कर रहे थे, और आम लोगों को "अच्छे दिन" का, जिसका मतलब केवल लुछ छोटा-मोटा लाभ नहीं था, बल्कि महान सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का वादा था जो भारत को विकसित देशों के साथ खड़ा कर देने के वादे के साथ किया गया था वह भी शानदार विकास दर और अधिक शानदार विकास के साथ।

अब, नोटबंदी से शुरू हुए गलत और अभाग्य निर्णयों की लड़ी में जीएसटी और लॉकडाउन के जुड़ जाने तथा वैश्विक आर्थिक मंदी और देश में व्याप्त भय और प्रतिशोध के माहौल ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ढहा कर रख दिया, और वादा किए गए सुधारों का कहीं अता-पता नहीं दिख रहा था। जैसे ही घरेलू अर्थव्यवस्था ढह गई, वैसे ही विदेशी प्रत्यक्ष निवेशक भी पीछे हट गया। वास्तव में, मोदी के तहत पूंजी और श्रम दोनों ही अल्प-परिवर्तित हो गए। निजी पूंजी के विस्तार की कल्पना की स्थिति से और अपने राजनीतिक शासन की वैधता को बनाए रखने के लिए,  एक अतिरंजित आत्म-चित्रण और बहुमतवादी लोक मानस की शक्ति के कारण, हमने कॉर्पोरेट क्षेत्र और नौकरियों और लाभों को व्यापक नुकसान में तब्दील कर दिया जिससे मध्यम वर्ग सहित कामकाजी लोगों को गहरा झटका लगा। अब आगे क्या?

यह तब है जब मोदी ने ऐसी नीतियों का प्रतिपादन किया जो चुने कॉर्पोरेट्स को विशेष लाभ का आश्वासन देती हैं। कोरपोरेट्स को उनका यह आश्वासन चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक धन और संसाधनों को सुनिश्चित करेगा। वह इन चुने हुए कॉर्पोरेट घरानों के माध्यम से मीडिया को नियंत्रित करना जारी रखे हुए है और उनमें अपनी कहानी को सेट और प्रबंधित करने की क्षमता है। सत्ता में दोबारा आने के लिए उन्होंने अनुच्छेद 370 और ट्रिपल तालक के बहुमतवादी सांस्कृतिक एजेंडे को समाप्त कर दिया और दूसरे कार्यकाल में इसके तुरंत बाद राम मंदिर भी उनकी झोली में गिर गया। लगता है महामारी ने एक तरह से भाजपा की योजनाओं पर ब्रेक लगा दिया है, लेकिन इसने भाजपा को अलोकप्रिय सुधारों को आगे बढ़ाने का अवसर भी प्रदान किया। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के अभी भी चार साल बाकी हैं, और वर्तमान स्थिति को देखते हुए, पिछले कुछ वर्षों की गति को बनाए रखना मुश्किल प्रतीत होता है।

प्रधानमंत्री की सबसे मजबूत ताक़त कमजोर विपक्ष का होना लगता है। ऐसा नहीं है कि देश में विपक्षी रैंकों में नेतृत्व की कमी है, लेकिन भाजपा के विरोधियों में किसी कहानी का अभाव है, जो मोदी से परे बहुत अलग कुछ करने का वादा कर सके। सही मायने में, हम देश की राजनीति पर हावी होने वाले नवउदारवाद के मृत-अंत में हैं। फिलहाल, कोई लोकप्रिय प्रतिरोध नहीं है, और यह लंबे लॉकडाउन के प्रभाव और कोविड-19 के लगातार भय के कारण भी हो सकता है। एक गैर-उत्तरदायी सरकार और एक अनुपस्थित विपक्ष के कारण असंतुष्ट लोगों को जुटाने के लिए कोई नहीं है। हम निराशा की खाई में प्रवेश कर रहे हैं। अब एक बात तो तय है कि आम लोगों के लिए "अच्छे दिन" नहीं आने वाले है, न ही कॉर्पोरेट्स और निजी पूंजी के लिए।

मोदी अपने शेष कार्यकाल में आरएसएस द्वारा संचालित अपने बहुमतवादी सांस्कृतिक एजेंडे के साथ आगे बढ़ सकते हैं। इसे ऊंचे राष्ट्रवादी एजेंडे से जोड़ें और कॉर्पोरेट सेक्टर के एक छोटे से सेगमेंट को लाभ पहुंचाने वाली नीति समझे। इसके साथ डर का माहौल पैदा करना, अतिरिक्त न्यायिक निर्णय लेना, न्यायपालिका सहित अन्य संस्थानों की गरिमा को नुकसान पहुंचाना, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी और बेहिसाब प्रबंधन और निधियों का संचय (जैसा कि पीएम-कॉर्पस के साथ देखा जाता है) करना कुछ ऐसे तरीके हैं जिनके माध्यम से वर्तमान स्थिति को नियंत्रित किया जा रहा है और भविष्य की तैयारी की जा रही है। यह साफ दिखता है कि मोदी को अपने कार्यकाल के बाकी समय का प्रबंधन कृत्रिम रूप से प्रबंधित कथाओं के माध्यम से करना होगा, जैसा कि हमने बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह की मृत्यु के आसपास देखा है, जिसे वास्तव में बिहार में चुनावों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। [सुशांत सिंह बिहार यानि अपने जन्मस्थान से मुंबई आए।]

हम जो देख रहे हैं वह आत्म-विरोधाभास का चरम अंत है जो पूंजीवाद अपने नव-उदारवादी रूप में दिखा रहा है। पूर्ण दमन उन विरोधाभासों को सामने लाता है जो न्यूनतम स्वतंत्रता की बात करते हैं जिसकी आवश्यकता पूंजीवाद को भी होती है। लेकिन नेतृत्व का पागलपन और अपराधी शासन ने मोदी की लोकप्रियता के साथ इसे अनुचित रूप से आगे बढ़ाया है। चूंकि यह लोकप्रियता मीडिया छवियों पर आधारित है, इसलिए हिंदुओं के एक बड़े हिस्से के बीच सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी विमर्श को स्वीकार करने के मामले में असुरक्षा की भावना हावी हो गई है। हालांकि मोदी अभी भी खुद की स्वीकृति के लिए सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी एजेंडे पर निर्भर है, लेकिन वे अलोकप्रिय आर्थिक फैसलों से बड़े पैमाने पर प्रतिरोध की संभावना से भी वाकिफ हैं। इसलिए, वह सांस्कृतिक बहुमतवाद से मिली लोकप्रियता, और आर्थिक संकट के कारण प्रतिरोध के डर के बीच फंसे हुए लगते है। यह एक ऐसा जुआ है जिसे वे खेलना चाहते है- और जिसके उन्हे  जाना जाता है।

इस झूले की सवारी न केवल संकट बढ़ा रही है बल्कि सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग में चिंता पैदा कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक मौड़ है। आज हमारे पास जो कुछ है वह ढहाई लोकतांत्रिक नागरिकता और एक बेचैन नेता है; जो भविष्य के लिए भी बेचैन है जिसे आज भी लोकप्रियता हासिल है। एक लोकप्रिय जनादेश के साथ किसी बेचैन नेता का होना असामान्य बात है। इस नीरस स्थिति में वह भविष्य में इस यथास्थिति को कैसे बनाए रख पाएगा और जब नागरिक, सामाजिक और आर्थिक संकट गहरा होने की संभावना है? यह वह स्थिति है जहाँ लापरवाह शासन का अपराधीकरण हो रहा है। लामबंदी की हर भावी संभावना पर कुठाराघात किया जा रहा है, जो कि अचेतन गिरफ्तारी, सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को फंसाना या बदनाम करना (उन्हें पूछताछ, गिरफ्तारी और मुकदमे के लिए अगली पंक्ति में खड़े होने के संकेत देना), बेशर्म कानून और अन्य साधनों के माध्यम से ये हमले जारी है। हम या तो लंबे समय तक सामाजिक संकट को झेलने जा रहे हैं या हम अपने बुरे सपनो को साकार करने की तरफ आगे बढ़ रहे हैं, और यह बात नेता को बेचैन कर रही है। जो स्थिति आज हैं, इसकी संभावना है हालात अभी और खराब होने जा रहे है।

लेखक सीपीएस, जेएनयू में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उनकी आगामी पुस्तक का शीर्षक है इमोटिव मेजोरिटी: एथिक्स एंड इमोशन इन न्यू इंडिया। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Anxious Leader, Passive Citizens

Narendra modi
BJP
Farm Bills
National Education Policy
Congress party
MANMOHAN SINGH
BJP-RSS
GST
Lockdown
COVID-19
PM-CARES

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है


बाकी खबरें

  • सुप्रीम कोर्ट
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    खोरी गांव विस्थापन: सुप्रीम कोर्ट ने तोड़-फोड़ पर नहीं लगाई रोक; पुनर्वास योजना में दी राहत
    24 Jul 2021
    खोरी गांव के मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। खोरी निवासियों को विस्थापन पर स्टे तो नहीं मिला किंतु मजदूर आवास संघर्ष समिति की ओर से दायर याचिका पर मिली पुनर्वास योजना में राहत दी…
  • महामारी के बीच नयी उम्मीदों के साथ टोक्यो ओलंपिक की रंगारंग शुरुआत
    भाषा
    महामारी के बीच नयी उम्मीदों के साथ टोक्यो ओलंपिक की रंगारंग शुरुआत
    24 Jul 2021
    दर्शकों के बिना आयोजित किये जा रहे ओलंपिक खेलों के उदघाटन समारोह में भी भावनाओं का ज्वार उमड़ता दिखा। लेकिन जब उदघाटन समारोह चल रहा था उस समय भी स्टेडियम के बाहर प्रदर्शनकारी ओलंपिक आयोजन के खिलाफ…
  • बधाई: मीराबाई चानू ने ओलंपिक में रजत पदक जीता
    भाषा
    बधाई: मीराबाई चानू ने ओलंपिक में रजत पदक जीता
    24 Jul 2021
    चानू ने भारत के भारोत्तोलन पदक के 21 साल के इंतजार को खत्म करते हुए महिलाओं के 49 किलोवर्ग में 202 किग्रा (87 किग्रा + 115 किग्रा) वजन उठाकर दूसरा स्थान पाया। इससे पहले कर्णम मल्लेश्वरी के 2000 सिडनी…
  • आर्थिक सुधारः स्कैम, मंदी और राष्ट्रवाद के सहारे
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    आर्थिक सुधारः स्कैम, मंदी और राष्ट्रवाद के सहारे
    24 Jul 2021
    कुल मिलाकर आर्थिक सुधार न सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर विफल रहा है बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी उसकी भयानक त्रासदी प्रकट हुई है।
  • कैसा रहा 1991 के मशहूर आर्थिक सुधार के बाद अब तक का सफ़र
    अजय कुमार
    कैसा रहा 1991 के मशहूर आर्थिक सुधार के बाद अब तक का सफ़र
    24 Jul 2021
    आकार के लिहाज से साल 1990 में दुनिया में भारत की अर्थव्यवस्था का स्थान 12वां था। साल 2020 में यह बढ़कर छठवें स्थान पर पहुंच गया। लेकिन जब प्रति व्यक्ति आय के आधार पर देखा जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License