NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
‘आप’ का संकट
महेश कुमार
27 Apr 2015

कम्युनिस्ट पार्टी के आलोचक हमेशा कम्युनिस्ट पार्टी की यह कहकर आलोचना करते हैं कि ये लोग तानाशाही के पक्षधर हैं।  इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी में जनवादी प्रक्रिया का अभाव है। जबकि कम्युनिस्ट पार्टियां हमेशा से ही अंदरूनी लोकतंत्र के आधार पर राजनैतिक लाइन और न्रेतत्व तय करती आई हैं।  भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की हाल में हुयी 21वीं कांग्रेस से यह बात और ज्यादा मज़बूत हो गयी है कि देश में अगर जनतंत्र की प्रक्रिया से कोई पार्टी चलती है तो वह कम्युनिस्ट पार्टियां ही हैं।  न्रेतत्व परिवर्तन से लेकर अगले तीन साल के लिए पार्टी की राजनैतिक लाइन पूरी बहस के बाद तय की गयी और सभी प्रस्ताव सर्वसम्मति से तय किये गए।  पूंजीवादी मीडिया भी इस प्रक्रिया से हक्का-बक्का रह गया।

आम आदमी पार्टी जोकि दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरी और देश की जनता को यह सन्देश देने की कोशिश की अब विचाधाराओं से ऊपर उठकर राजनीति होगी और वह भी आम आदमी की राजनीति, उनकी इस मुहीम पर हाल ही में आम आदमी पार्टी में उठे विवादों से धुल चढ़नी शुरू हो गयी है।  आप भी अन्य किसी बुर्जुआ पार्टी की तरह ही व्यवहार कर रही है।  वामपंथ और जनवादी ताकतों से जुड़े लोगो ने आप को चुनावों में इसलिए भारी समर्थन दिया क्योंकि वह कांग्रेस और भाजपा के विरुद्ध के एक विकल्प के रूप में उभरी।  दिल्ली की गरीब और मेहनतकश जनता ने दिल खोलकर समर्थन दिया, इस उम्मीद में कि शायद यह पार्टी उनके आसुओं को पोंछने में कुछ हद तक कामयाब रहेगी।  बावजूद इसके की ‘आप’ में घमाशान जारी है और जनहित में अभी तक कुछ ख़ास करने में कामयाब नहीं हुए हैं, आज भी व्यापक जनता के हिस्से में ‘आप’ से कुछ हद तक उम्मीद कायम है।

                                                                                                                                  

‘आप’ का यह संकट कोई व्यक्तियों का संकट नहीं है बल्कि यह संकट विचारधारा का संकट है जिससे आम आदमी पार्टी का न्रेतत्व अभी तक बचता रहा था।  जब भी कोई पार्टी अपने आपको गरीब के पक्ष की पार्टी बताती है तो उसका कार्यक्रम और नीतियां उससे मेल खानी चाहिए।  आप का कार्यक्रम केवल गुड गवर्नेंस देने का है।  लेकिन इस गुड गवर्नेंस को देने के लिए न तो उनके पास कोई नीति है और न ही कोई कार्यक्रम।  यही नतीजा है कि ‘आप’ भी उसी तरह का व्यवहार कर रही है जैसे अन्य बुर्जुआ पार्टियाँ कर रही है।  दिल्ली की समस्याएं, चाहे वह परिवहन की समस्या हो या बिजली-पानी की, ज्यूँ की त्यूं खडी हुयी है।  डी.टी.सी की हालत इतनी खस्ता है कि बजाय उसमें सुधार लाने के अरविन्द केजरीवाल ने डी.टी.सी. के निजीकरण की ही घोषणा कर दी है।  दिल्ली शहर ने परिवहन व्यवस्था के निजीकरण की झेला है।  न जाने कितने लोग इस व्यवस्था की सूली चढ़े हैं।  अगर अरविन्द केजरीवाल भी निजीकरण का डंडा चलाना चाहता है तो उसमें और भाजपा में क्या फर्क है।  मोदी आज मेक इन इंडिया के नाम पर बड़े-बड़े पूंजीपतियों को देश के सार्वजनिक संसाधनों को लूटने की छूट दे रहा है।

चुनावों से पहले तो वायदा किया गया कि सभी ठेके पर काम कर रहे डी.टी.सी. के कर्मचारियों को स्थायी कर दिया जाएगा और अब सत्ता में आने के बाद वे निजीकरण करने की सोच रहे हैं।  केजरीवाल दिल्ली की जनता को फिर परिवहन माफिया के हवाले करना चाहते हैं और रोज़गार के अवसरों को ख़त्म करना चाहते हैं।  अगर परिवहन व्यवस्था में यह कदम उठाया जाता है तो अन्य महकमें भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। यह बात तय है कि जहाँ-जहाँ निजीकरण ने पैर पसारे हैं वहां न तो रोज़गार बचा है और नहीं व्यवस्था ठीक हुयी है।  निजीकरण मुनाफे पर आधारित व्यवस्था होती है जो शोषण और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।  दिल्ली में चिकित्सा व्यवस्था के निजीकरण के चलते आज आम आदमी बिना इलाज़ के मर रहा है और निजी अस्पताल करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं।  दिल्ली सरकार के अस्पतालों में इतनी भीड़ है कि आम आदमी को तय सुविधाएं भी नहीं मिल पाती है।  गरीब लोग बसों घंटो इंतज़ार करते हैं और जानवरों की तरह ठूस कर सफ़र करते हैं।  प्रदुषण के नाम पर साल-साल भर से लोगों की दुकाने सील पड़ी हैं लेकिन केजरीवाल सरकार ने उन्हें खुलवाने के लिए कोई कार्य नहीं किया है।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि ‘आप’ अपनी भीतरी कलह को ख़त्म करे और जनता के मुद्दों पर काम करे।  दिल्ली शहर को ए क्लास सिटी न बनाकर इसे गरीब, मेहनतकश और मध्यम वर्ग के रहने लायक शहर बनाए।  यह तभी बन पायेगा जब अरविन्द केजरीवाल या ‘आप’ अपनी विचाधारा को निजीकरण के पक्ष में न रखकर गरीबों के पक्ष में करे।  अगर ‘आप’ दिल्ली के महकमों का निजीकरण करती हैं तो ‘आप’ का हश्र बहुत बुरा होगा।  इसके बाद जो कलह आज है वह कलह इतनी बढ़ेगी कि आम आदमी पार्टी के भी इतने धड़े बनेंगे कि हम गिन नहीं पायेंगे।  वही हश्र होगा जो जनता दल का हुआ।  फिर यही गाना ‘आप’ पर ठीक बैठेगा कि “दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा”।  

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

 

आम आदमी पार्टी
वामदल
अरविन्द केजरीवाल
योगेन्द्र यादव
प्रशांत भूषण

Related Stories

'भाजपा भगाओ-लोकतंत्र बचाओ' रैली के जरिये निर्णायक जनांदोलन खड़ा करने का ऐलान

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की माँग पर जनता की राय

जनतंत्र का एक और सबक

जज लोया केस में प्रशांत भूषण और दुष्यंत दवे ने कोर्ट में अपनी बात रखी

आप , भाजपा और भजन मंडली

भारत के मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों की आंतरिक जाँच होनी चाहिए : प्रशांत भूषण

मेट्रो का बढ़ा किराया लोगों का फूटा गुस्सा

मैनुअल स्केवेंजिंग से हुई मौत – कहाँ है इंसाफ?

दिल्ली पहुंचा नर्मदा बचाओ आन्दोलन


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License