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भारत
राजनीति
अपनी मूल प्रकृति से ही दुष्ट होते हैं दक्षिणपंथी
10 सितंबर के भारत बंद ने भारत को जन-कल्याणकारी शासन के पथ पर फिर से लाने के लिये एक अहम संघर्ष का बिगुल बजाया है।
अरुण माहेश्वरी
13 Sep 2018
right wing

दक्षिणपंथी तत्व अपनी मूल प्रकृति से ही दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं। इनके कारण ही आम लोगों में राजनीति के बारे में एक आम धारणा बन गई है कि यह सिर्फ खाने-कमाने का धंधा है ; इसका कोई आदर्श या विचारधारात्मक पहलू नहीं होता है। राजनीति या जीवन के किसी भी पहलू के प्रति इस प्रकार के आदर्शशून्य नकारात्मक नजरिये की जमीन पर ही सब जगह दक्षिणपंथ और फासीवाद की फसल लहलहाती है। मुनाफे मात्र से संचालित होने वाली पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था इसकी सामाजिक भीत तैयार करती है।

यही वजह है कि आम लोगों का एक बड़ा हिस्सा जीवन में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्शों के प्रति काफी उदासीन रहता है। वह मानव कल्याण के उस शिव तत्व को गंवा देता है, जो आदमी को स्वतंत्रता और न्याय से बांधे रखता है। उल्टे, शिव साधना भी उसके लिये कांवड़ियों की लंपटगिरी का पर्याय बन जाती है।

ऐसे आदर्श-शून्य, अपनी परिस्थितियों से आबद्ध पशुवत जीवन के लिये अभिशप्त लोग ही मोदी के स्तर के एक निरंकुश और भ्रष्ट तानाशाह के विरुद्ध संघर्ष को सारहीन और निरर्थक मानते हुए नकारवाद का शिकार बन जाते हैं। सिर्फ वे ही आज भारतीय राजनीति में शुरू हो चुके एक नये आलोड़न को देखने में असमर्थ है।

10 सितंबर के भारत बंद ने भारत को जन-कल्याणकारी शासन के पथ पर फिर से लाने के लिये एक अहम संघर्ष का बिगुल बजाया है। इसकी गूंज-अनुगूंज ही आने वाले पूरे साल तक भारत के राजनीतिक आकाश में छाई रहेगी। आज इसके सारे संकेत साफ हैं।

हम साफ देख पा रहे हैं कि आगे अब देश के हर गांव, गली, चौराहों, कस्बों, शहरों और महानगरों में भी रफाल विमानों की शोभायात्राओं के साथ मोदी जी से इनकी खरीद के जरिये अंबानी की जेब में पहुंचाये गए हजारों करोड़ रुपये का हिसाब मांगा जायेगा। पूछा जायेगा कि नोटबंदी के तुगलकीपन से भी किन बड़े पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों के काले धन को सफेद किया गया ? उस समय जिन डेढ़ सौ आम लोगों की जानें बैंकों की कतारों में गई उनकी हत्या का अपराधी कौन है, ये सवाल भी उठेंगे। लोग यह भी जानना चाहेंगे कि पेट्रोल-डीजल के जरिये मोदी सरकार ने जनता की जेबों को काट कर जो अतिरिक्त बारह लाख करोड़ रुपये कमाए, उन रुपयों को कहां खर्च किया गया ? क्यों उन रुपयों के जरिये बैंकों के एनपीए की भरपाई करके बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बचाया गया ? क्यों नहीं इनसे पूरे देश के कर्ज में डूबे हमारे किसानों के ऋण माफ किये गये ? लोग यह भी जानना चाहेंगे कि क्यों सब कुछ जानते हुए भी प्रधानमंत्री के कार्यालय ने मेहुल चोकसी और नीरव मोदी जैसे अपराधियों के लिये देश से भाग जाने की व्यवस्था की। क्यों प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं और अपने खुद के चेहरे के प्रचार के लिये हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाते हैं, लेकिन मनरेगा से लेकर मिड डे मील, खाद्य सुरक्षा का अधिकार और रोजगार के अधिकार, चिकित्सा के अधिकार के लिये उनके पास हमेशा रुपयों की कमी रहती है। इनसे जुड़ी स्कीमों पर क्यों सिर्फ कोरा प्रचार ज्यादा होता है, काम नहीं।

ऐसे तमाम सवाल आज जन समाज को मथने लगे हैं। मोदी-शाह इन सब सवालों को विपक्ष के विरुद्ध प्रतिशोधमूलक झूठी कार्रवाइयों के जरिये और दलाल मीडिया और अपनी ट्रौल वाहिनी के झूठे प्रचार के जरिये दबाने में लगी हुई है। राजनीति का अर्थ ही इनके लिये बेइमानियों, धोखा और आतंक के सिवाय कुछ नहीं है।

आने वाले दिन भारत की राजनीति को जन-कल्याण के आदर्शों पर फिर से स्थापित करने की लड़ाई के दिन होंगे। इसे आज कोई भी अपने विवेक और मानव बोध के जरिये देख और समझ सकता है।

Courtesy: हस्तक्षेप ,
Original published date:
12 Sep 2018
Dakshinpanth
Right-wing ideology
Arun Maheshwari
10th september bharat band

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