NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अपनी मूल प्रकृति से ही दुष्ट होते हैं दक्षिणपंथी
10 सितंबर के भारत बंद ने भारत को जन-कल्याणकारी शासन के पथ पर फिर से लाने के लिये एक अहम संघर्ष का बिगुल बजाया है।
अरुण माहेश्वरी
13 Sep 2018
right wing

दक्षिणपंथी तत्व अपनी मूल प्रकृति से ही दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं। इनके कारण ही आम लोगों में राजनीति के बारे में एक आम धारणा बन गई है कि यह सिर्फ खाने-कमाने का धंधा है ; इसका कोई आदर्श या विचारधारात्मक पहलू नहीं होता है। राजनीति या जीवन के किसी भी पहलू के प्रति इस प्रकार के आदर्शशून्य नकारात्मक नजरिये की जमीन पर ही सब जगह दक्षिणपंथ और फासीवाद की फसल लहलहाती है। मुनाफे मात्र से संचालित होने वाली पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था इसकी सामाजिक भीत तैयार करती है।

यही वजह है कि आम लोगों का एक बड़ा हिस्सा जीवन में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्शों के प्रति काफी उदासीन रहता है। वह मानव कल्याण के उस शिव तत्व को गंवा देता है, जो आदमी को स्वतंत्रता और न्याय से बांधे रखता है। उल्टे, शिव साधना भी उसके लिये कांवड़ियों की लंपटगिरी का पर्याय बन जाती है।

ऐसे आदर्श-शून्य, अपनी परिस्थितियों से आबद्ध पशुवत जीवन के लिये अभिशप्त लोग ही मोदी के स्तर के एक निरंकुश और भ्रष्ट तानाशाह के विरुद्ध संघर्ष को सारहीन और निरर्थक मानते हुए नकारवाद का शिकार बन जाते हैं। सिर्फ वे ही आज भारतीय राजनीति में शुरू हो चुके एक नये आलोड़न को देखने में असमर्थ है।

10 सितंबर के भारत बंद ने भारत को जन-कल्याणकारी शासन के पथ पर फिर से लाने के लिये एक अहम संघर्ष का बिगुल बजाया है। इसकी गूंज-अनुगूंज ही आने वाले पूरे साल तक भारत के राजनीतिक आकाश में छाई रहेगी। आज इसके सारे संकेत साफ हैं।

हम साफ देख पा रहे हैं कि आगे अब देश के हर गांव, गली, चौराहों, कस्बों, शहरों और महानगरों में भी रफाल विमानों की शोभायात्राओं के साथ मोदी जी से इनकी खरीद के जरिये अंबानी की जेब में पहुंचाये गए हजारों करोड़ रुपये का हिसाब मांगा जायेगा। पूछा जायेगा कि नोटबंदी के तुगलकीपन से भी किन बड़े पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों के काले धन को सफेद किया गया ? उस समय जिन डेढ़ सौ आम लोगों की जानें बैंकों की कतारों में गई उनकी हत्या का अपराधी कौन है, ये सवाल भी उठेंगे। लोग यह भी जानना चाहेंगे कि पेट्रोल-डीजल के जरिये मोदी सरकार ने जनता की जेबों को काट कर जो अतिरिक्त बारह लाख करोड़ रुपये कमाए, उन रुपयों को कहां खर्च किया गया ? क्यों उन रुपयों के जरिये बैंकों के एनपीए की भरपाई करके बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बचाया गया ? क्यों नहीं इनसे पूरे देश के कर्ज में डूबे हमारे किसानों के ऋण माफ किये गये ? लोग यह भी जानना चाहेंगे कि क्यों सब कुछ जानते हुए भी प्रधानमंत्री के कार्यालय ने मेहुल चोकसी और नीरव मोदी जैसे अपराधियों के लिये देश से भाग जाने की व्यवस्था की। क्यों प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं और अपने खुद के चेहरे के प्रचार के लिये हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाते हैं, लेकिन मनरेगा से लेकर मिड डे मील, खाद्य सुरक्षा का अधिकार और रोजगार के अधिकार, चिकित्सा के अधिकार के लिये उनके पास हमेशा रुपयों की कमी रहती है। इनसे जुड़ी स्कीमों पर क्यों सिर्फ कोरा प्रचार ज्यादा होता है, काम नहीं।

ऐसे तमाम सवाल आज जन समाज को मथने लगे हैं। मोदी-शाह इन सब सवालों को विपक्ष के विरुद्ध प्रतिशोधमूलक झूठी कार्रवाइयों के जरिये और दलाल मीडिया और अपनी ट्रौल वाहिनी के झूठे प्रचार के जरिये दबाने में लगी हुई है। राजनीति का अर्थ ही इनके लिये बेइमानियों, धोखा और आतंक के सिवाय कुछ नहीं है।

आने वाले दिन भारत की राजनीति को जन-कल्याण के आदर्शों पर फिर से स्थापित करने की लड़ाई के दिन होंगे। इसे आज कोई भी अपने विवेक और मानव बोध के जरिये देख और समझ सकता है।

Courtesy: हस्तक्षेप ,
Original published date:
12 Sep 2018
Dakshinpanth
Right-wing ideology
Arun Maheshwari
10th september bharat band

Related Stories


बाकी खबरें

  • राज वाल्मीकि
    अब साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है: जयप्रकाश कर्दम
    13 Feb 2022
    इतवार विशेष: दलित साहित्य और दलित लेखकों के साथ भेदभाव हो रहा है जैसे गांव में होता है न, दलित बस्ती दक्षिण टोला। दलित साहित्य को भी यह मान लीजिए कि यह एक दक्षिण टोला है। इस तरह वे लोग दलित साहित्य…
  • Saharanpur
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी चुनाव 2022: शांति का प्रहरी बनता रहा है सहारनपुर
    13 Feb 2022
    बीजेपी की असली परीक्षा दूसरे चरण में हैं, जहां सोमवार, 14 फरवरी को वोट पड़ेंगे। दूसरे चरण में वोटिंग सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ, शाहजहांपुर ज़िलों की विधानसभा…
  • Uttarakhand
    कृष्ण सिंह
    चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?
    13 Feb 2022
    अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी दलित समाज के अस्तित्व से जुड़े सवाल कभी भी मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न नहीं रहे हैं। पहाड़ी जिलों में तो दलितों की स्थिति और भी…
  • Modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: अगर आरएसएस न होता...अगर बीजेपी नहीं होती
    13 Feb 2022
    "...ये तो अंग्रेजों की चापलूसी में लगे थे। कह रहे थे, अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं"
  • election
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: चुनाव आयोग की साख पर इतना गंभीर सवाल!
    13 Feb 2022
    हर हफ़्ते की कुछ खबरें और उनकी बारिकियाँ बड़ी खबरों के पीछे छूट जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार जैन हफ़्ते की इन्हीं कुछ खबरों के बारे में बता रहे हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License