NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अपराध दर्ज कराने के लिए 'पुलिस' के पास जाने से लोग डरते क्यों हैं ?
टीआइएसएस की रिपोर्ट में पुलिस द्वारा की गई उपेक्षित वर्गों तथा पक्षपात की कुछ समस्याओं को उजागर किया गया है, लेकिन समाधान के रूप में 'निजीकरण' की सिफ़ारिश भी की गई है
पी.जी आंबेडकर
16 Nov 2017
police

मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) ने अपराध की शिकायत दर्ज कराने को लेकर पुलिस तथा समाज के बीच संबंधों पर सर्वे किया है। इस सर्वे में पाया गया है कि 75% शिकायतकर्ता, ख़ासकर महिलाएं या उपेक्षित वर्गों से, पुलिस से शिकायत दर्ज कराने में अनिच्छुक होते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि पर्याप्त मानव शक्ति, संसाधन में कमी तथा निम्न अपराध दरों के साथ निष्पादन मूल्यांकन को जोड़ना, शिकायतकर्ताओं को दूर रहने के पीछे के कारक हैं। हालांकि यह मानव शक्ति बढ़ाने के लिए पुलिस बल के निचले स्तरों के 'निजीकरण' की सिफारिश करता है, यह एक ऐसी नीति जो भविष्य में मानकों में गिरावट का कारण बन सकता है।

ये अध्ययन पुलिस द्वारा अपराधों का पंजीकरण न करने को जानने के लिए किया गया था। इसे गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो(बीपीआर एंड डी) द्वारा अधिकृत किया गया था। ये सर्वे छह राज्यों - उत्तर प्रदेश, असम, ओडिशा, दिल्ली, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में किया गया था - जो देश के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए। सर्वेक्षण में 506 व्यक्तियों के विचार शामिल किए गए जिनमें 207 शिकायतकर्ता थें और बाकी पुलिस कार्मिक तथा ग़ैर-सरकारी संगठन के कार्यकर्ता थें।

अध्ययनों में मामलों के ग़ैर-पंजीकरण के लिए निम्नलिखित कारणों की पहचान की गई:मानव शक्ति की कमी और अधिक कार्यभार: ये अध्ययन विभिन्न राज्यों में पुलिस विभागों में ख़ाली पदों को भरने के महत्व पर बल देता है। पुलिस विभाग में रिक्तियों की संख्या पर संसद में गृह मंत्रालय ने 21 मार्च, 2017 को सवाल के जवाब में कहा था कि देश में 5,49,025 पुलिस पद रिक्त हैं। सबसे ज्यादा रिक्तियां उत्तर प्रदेश में 50%, कर्नाटक में 36%, पश्चिम बंगाल में 33%, गुजरात में 32%, हरियाणा में 31% थीं। बेहतर वेतनमानों और अन्य भर्तियों का सुझाव देने के बजाय यह रिपोर्ट पुलिस सेवा के निचले स्तर के निजीकरण के नव-उदारवादी मंत्र को अपनाने की बात करती है, ठीक उसी तरह जैसा कि विविध समस्याओं केसमाधान के लिए वर्तमान सरकार की विभिन्न समितियों द्वारा की गई सिफारिशों में कहा गया है। इस सिफारिश पर नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्यूमन राइट्स(एनसीडीएचआर) के अभय एक्सक्सा कहते हैं, "यह राज्य की बुनियादी ज़िम्मेदारी के ख़िलाफ है। इसे निजी निकाय को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। हमारी संस्था, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ती है और हम उम्मीद करते हैं कि सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करेगी, हमेशा अत्याचार रोकथाम अधिनियम आदि जैसे क़ानूनों को मज़बूत करने की मांग की है।"

पुलिस के लिए अपर्याप्त संसाधन: रिपोर्ट में कहा गया है कि फंड आवंटित करते समय पुलिस के लिए वित्त पोषण हमेशा सरकार द्वारा उपेक्षित रहा है। "पुलिस विभागों को सरकार के फंडिंग की प्राथमिकता में कम स्थान दिया गया है क्योंकि इसे ग़ैर-उत्पादक इकाइयों के रूप में और राज्य के ख़जाने को ख़ाली करने वालामाना जाता है।" ये मानव शक्ति और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण है जो पुलिस तंत्र के कार्यविधियों को प्रभावित करते हैं।

निष्पादन मूल्यांकन बनाम अपराध दर: रिपोर्ट में पाया गया कि पुलिस कर्मियों के निष्पादन मूल्यांकन के साथ अपराध दरों को जोड़ना मामलों (घटनाओं) के पंजीकरण न होने के महत्वपूर्ण कारणों में से एक था। यह पुलिस कर्मियों का मूल्यांकन करने के लिए "मॉडल पुलिस अधिनियम" - संचालन दक्षता, जनता की संतुष्टि, पुलिस की जांच और प्रतिक्रिया के संबंध में पीड़ितों की संतुष्टि, उत्तरदायित्व, संसाधनों का अधिकतम उपयोग, और मानवाधिकार अभिलेख- के कार्यान्वयन की सिफारिश करता है।

शिकायतकर्ताओं के साथ पुलिस का व्यवहार: रिपोर्ट में कहा गया है कि 75% से अधिक लोग, विशेष रूप से महिलाएं और हाशिए पर मौजूद, महसूस करते हैं कि उनके प्रति पुलिस व्यवहार अच्छा नहीं था और इसलिए वे पुलिस के पास जाने से बचते हैं जब तक कोई गंभीर अपराध न हो। इस रिपोर्ट में सामाजिक पक्षपात को समाहित किया गया है जो समाज में मौजूद हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई ड्यूटी अधिकारियों का मानना है कि "भारत में आम तौर पर लोग जाति के आधार पर उसकीसामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार दूसरे व्यक्ति से व्यवहार करते हैं। उच्च जाति और/या समृद्ध तथा राजनीतिक या अन्य रूप से प्रभावशाली व्यक्ति के साथहर जगह हमेशा अच्छा बर्ताव होता है। पुलिस अधिकारी भी उसी सामाजिक परिवेश से आते हैं। तो आप सभी नागरिकों को समान रूप से बर्ताव करने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं, एक सम्मानजनक तरीके से, जबकि उन्हें स्वयं अपने उच्च अधिकारियों और जनता से सम्मानजनक बर्ताव नहीं किया जा रहा है।

उदाहरण स्वरूप दिल्ली में रहने वाले पूर्वोत्तर भारतीय लोगों द्वारा सामना किए गए समस्याओं पर पुलिस के इस दृष्टिकोण को इस अध्ययन में उजागर किया गया है। अध्ययन के 'नॉर्थ ईस्ट माइग्रेशन एंड चैलेंजेज इन नेशनल कैपिटलः सिटीज साइलेंट रेशियल अटैक ऑन इट्स ओन कंट्रीमेन' भाग में उजागर किया गया है कि इन क्षेत्रों के लोगों ने महसूस किया है कि पुलिस द्वारा उनके खिलाफ भेदभाव किया गया। पूर्वोत्तर के लोगों द्वारा सामना किए जा रहे नस्लीय भेदभाव की समस्या का समाधान करने के लिए बेज़बरूआ कमेटी ने सिफारिश की कि पूर्वोत्तर के सदस्यों को दिल्ली पुलिस में भर्ती किया जाए। इस पहल के परिणाम स्वरूप दिल्ली पुलिस ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के 435 पुरुषों और महिलाओं की भर्ती की।

वास्तव में हाशिए पर मौजूद समुदायों के लोगों द्वारा महसूस किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त करने का इरादा यदि नीति निर्माताओं को है तो इन समुदायों से पुलिस कर्मियों की भर्ती करने के प्रयास किए जाने चाहिए ताकि पुलिस के बीच एक स्वस्थ अंतर-कार्मिक संबंध कायम हो सके। इस तरह अंतर्निहित पक्षपात को समाप्त किया जा सकता है

अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर टीआइएसएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि "मुस्लिम शिकायतकर्ताओं के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई या उनके रिपोर्ट किए गए32% मामलों में ही कार्रवाई की गई। यह आंकड़ा बताता है कि पुलिस समान परिवेश का हिस्सा होते हुए ऐसा लगता है कि मामला (घटना) तथा धर्म के आधार पर समान भेदभाव बनाए रखती है, हालांकि क़ानून लागू करने वालों को न्याय के हित में अधिक निष्पक्ष होने की उम्मीद की जाती है।"

तीन राज्यों के डीजीपी और आईबी के एक अधिकारी ने "अल्पसंख्यकों और पुलिस" के मुद्दे पर एक अन्य रिपोर्ट तैयार की थी। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार समिति ने "पुलिस-समुदाय" अंतर को पाटने तथा "सांप्रदायिक दंगों को रोकने हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी)" विकसित करने के लिए उपाय सुझाए।

"अगर हम 'ग़ैर-पंजीकरण के साथ-साथ ग़ैर-रिपोर्टिंग' अपराध की गणना करते हैं तो यह आशंका है कि समाज में होने वाले अपराध का मात्र 10% से कम ही पंजीकृत हो रहा है।"

टीआइएसएस रिपोर्ट ने एक पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) रैंक के एक अधिकारी का उदाहरण दिया। अधिकारी को उनके आरंभिक दिनों में ही चेतावनी दी गई थी,जब वे किसी ज़िले के पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात किए गए थें, उन्होंने अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पुलिस स्टेशनों को सभी संज्ञेय अपराधों को पंजीकृत करने के निर्देश दिए थे। कुछ महीनों के भीतर ही अपराध का आंकड़ा चार गुना तक बढ़ गया। अधिकारियों को उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने फटकार लगाई थी और स्पष्टीकरण देने को कहा गया था।

रिपोर्ट के अनुसार "उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों ने भी चेतावनी दी थी कि अगर वे सुस्थिर करियर चाहते हैं तो इसे भविष्य में नहीं दोहराया जाना चाहिए।"


 

Image removed.

police
TISS
report
privatization
NGO
Discrimination

Related Stories

बच्चों की गुमशुदगी के मामले बढ़े, गैर-सरकारी संगठनों ने सतर्कता बढ़ाने की मांग की

कैसे जहांगीरपुरी हिंसा ने मुस्लिम रेहड़ी वालों को प्रभावित किया

कश्मीर में एक आर्मी-संचालित स्कूल की ओर से कर्मचारियों को हिजाब न पहनने के निर्देश

ज़मानत मिलने के बाद विधायक जिग्नेश मेवानी एक अन्य मामले में फिर गिरफ़्तार

प्रत्यक्षदर्शियों की ज़ुबानी कैसे जहांगीरपुरी हनुमान जयंती जुलूस ने सांप्रदायिक रंग लिया

जय भीम: माई जजमेंट इन द लाइट ऑफ़ अंबेडकर

कमज़ोर वर्गों के लिए बनाई गईं योजनाएं क्यों भारी कटौती की शिकार हो जाती हैं

इस साल यूपी को ज़्यादा बिजली की ज़रूरत

शिक्षित मुस्लिम महिलाओं ने हिजाब फ़ैसले को “न्यायिक अतिक्रमण’ क़रार दिया है 

रेलवे में 3 लाख हैं रिक्तियां और भर्तियों पर लगा है ब्रेक


बाकी खबरें

  • सत्येन्द्र सार्थक
    आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?
    25 Apr 2022
    सरकार द्वारा बर्खास्त कर दी गईं 991 आंगनवाड़ी कर्मियों में शामिल मीनू ने अपने आंदोलन के बारे में बताते हुए कहा- “हम ‘नाक में दम करो’ आंदोलन के तहत आप और भाजपा का घेराव कर रहे हैं और तब तक करेंगे जब…
  • वर्षा सिंह
    इको-एन्ज़ाइटी: व्यासी बांध की झील में डूबे लोहारी गांव के लोगों की निराशा और तनाव कौन दूर करेगा
    25 Apr 2022
    “बांध-बिजली के लिए बनाई गई झील में अपने घरों-खेतों को डूबते देख कर लोग बिल्कुल ही टूट गए। उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा। सब परेशान हैं कि अब तक खेत से निकला अनाज खा रहे हैं लेकिन कल कहां से खाएंगे। कुछ…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,541 नए मामले, 30 मरीज़ों की मौत
    25 Apr 2022
    दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच, ओमिक्रॉन के BA.2 वेरिएंट का मामला सामने आने से चिंता और ज़्यादा बढ़ गयी है |
  • सुबोध वर्मा
    गहराते आर्थिक संकट के बीच बढ़ती नफ़रत और हिंसा  
    25 Apr 2022
    बढ़ती धार्मिक कट्टरता और हिंसा लोगों को बढ़ती भयंकर बेरोज़गारी, आसमान छूती क़ीमतों और लड़खड़ाती आय पर सवाल उठाने से गुमराह कर रही है।
  • सुभाष गाताडे
    बुलडोजर पर जनाब बोरिस जॉनसन
    25 Apr 2022
    बुलडोजर दुनिया के इस सबसे बड़े जनतंत्र में सरकार की मनमानी, दादागिरी एवं संविधान द्वारा प्रदत्त तमाम अधिकारों को निष्प्रभावी करके जनता के व्यापक हिस्से पर कहर बरपाने का प्रतीक बन गया है, उस वक्त़…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License