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अरब क्रांति और सूडान की भू-राजनीति
सीरिया में 7 साल का पुराना संघर्ष आख़िरकार एक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। ये संघर्ष अरब क्रांति के साथ शुरू हुआ था।
एम. के. भद्रकुमार
18 Apr 2019
अरब क्रांति और सूडान की भू-राजनीति

सीरिया में 7 साल का पुराना संघर्ष आख़िरकार एक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। ये संघर्ष अरब क्रांति के साथ शुरू हुआ था। इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों के लिए भू-राजनीतिक मामला निर्णायक कारक था। उदाहरण स्वरूप तेहरान ने भू-राजनीतिक संघर्ष को प्रमुखता दी क्योंकि इसका यूएस और इज़रायल के ख़िलाफ़ उसके प्रतिरोध का निहितार्थ है। असद इस प्रतिरोध में एक सहयोगी जैसे बन गए हैं। लेकिन कोई बड़ा विरोधाभास नहीं है क्योंकि असद को भी सीरिया के भीतर व्यापक तौर पर लोकप्रिया हासिल है और शायद कोई ऐसा नहीं है जो लोकतांत्रिक चुनाव में उन्हें पुरज़ोर तरीक़े से चुनौती दे सके।

चौंकाने वाली बात यह है कि सीरियाई गृहयुद्ध के 8 वर्ष की अवधि के दौरान इराक़ और लेबनान में लोकतांत्रिक सशक्तीकरण का कार्य जारी रहा। दोनों देशों ने सफ़लतापूर्वक चुनाव भी किए और नई सरकारें बनाईं। महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक बहुलवाद ने अपनी ज़मीन तैयार कर ली है और अब इसकी संभावना नहीं है कि कोई सशक्त व्यक्ति बगदाद या बेरूत में मौजूदा स्थिति में सत्ता छीन सकता है।

बेशक ईरान के अपने इस्लामिक लोकतंत्र ने 1979 की क्रांति के बाद से इन 4 दशकों के दौरान बुनियाद को प्रभावित किया है और यह राजनीतिक वैधता से अधिक कुछ भी नहीं है जिसने इस शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सभी अमेरिकी तंत्रों को हराया। इसी तरह तुर्की में भी एक ऐसी स्थिति बनी हुई है जहाँ सशक्त होने के बावजूद राष्ट्रपति तैयब एर्दोगन को भी निर्विवाद रूप से सत्ता चलाने के लिए लोकतांत्रिक जनादेश प्राप्त है।

मूल बात यह है कि मध्य पूर्व के उत्तरी क्षेत्र के देश जिसमें अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान, तुर्की, इराक़, सीरिया और लेबनान शामिल हैं वे ज़्यादातर लोकतांत्रिक परिवर्तन के रास्ते पर अपने राजनीतिक विकास में एक स्थान पर पहुँच गए हैं जो सशक्त व्यक्ति संग्रहालय की वस्तु बन गया है। (अफ़गानिस्तान और सीरिया इसकी प्रगति पर काम कर रहे हैं।)

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मध्य पूर्व तथा उत्तरी अफ़्रीका का मानचित्र

इसके विपरीत दक्षिणी क्षेत्र एक निराशाजनक तस्वीर पेश करता है। इसमें फ़ारस की खाड़ी के कुलीन वर्ग, यमन, सूडान, मिस्र, जॉर्डन, लीबिया आदि शामिल हैं। इस सच्चाई के बावजूद दक्षिणी क्षेत्र निराशाजनक तस्वीर पेश करता है कि अरब क्रांति पहली बार मध्य पूर्व के इसी हिस्से में सामने आया और इन देशों में लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए ताने बाने का निर्माण किया।

सूडान और अल्जीरिया वर्तमान युद्ध के मैदान हैं। बड़े पैमाने पर उथल-पुथल के बीच निरंकुश शासक को उखाड़ फेंका गया है। लेकिन यह क्रांतिकारी स्थिति लोकतांत्रिक परिवर्तन के रूप में कितनी दूर है यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। ज़ाहिर तौर पर ये बाधाएँ लोकतांत्रिक परिवर्तन के ख़िलाफ़ काफ़ी जटिल हैं। महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि उत्तरी क्षेत्र के विपरीत जहाँ दो प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियाँ तुर्की और ईरान ने लोकतांत्रिक परिवर्तन को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है ऐसे में दक्षिणी क्षेत्र में कोई क्षेत्रीय शक्ति नहीं है जो प्रतिनिधि संबंधी शासन में परिवर्तन को इच्छुक है।

वर्तमान में दक्षिणी क्षेत्र के तीन सबसे शक्तिशाली क्षेत्रीय राष्ट्र सऊदी अरब, यूएई और मिस्र सूडान में किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक परिवर्तन के विरोध में हैं। (इस बीच लीबिया में भी एक सशक्त व्यक्ति मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के समर्थन के साथ अपने प्रगति पथ पर है।) विडंबना यह है कि तुर्की और ईरान अस्पष्ट हैं।

इसके विपरीत सऊदी अरब ने सूडान में सेना के लिए खुल कर समर्थन किया है। मिस्र ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह सूडान में लोकतांत्रिक परिवर्तन के पक्ष में नहीं है। इसका कारण यह है कि सऊदी अरब और यूएई इस संभावना को स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक इस्लाम लोकप्रिय विद्रोह की लहर को बढ़ावा दे सकता है और सूडान में सत्ता में आ सकता है जैसा कि मिस्र में कुछ समय में हुआ था और ऐसा ही मोरक्को में हुआ था।

किसी भी क़ीमत पर सऊदी-यूएई-मिस्र की धुरी काहिरा में निरंकुश शासन की तर्ज पर सूडान के भविष्य की परिकल्पना करती है जो कि स्पष्टतः गुप्त सैन्य तानाशाही है। जैसा कि वर्ष 2013 में मिस्र में सैन्य तख़्तापलट का मामला सामने आया जिसने मोहम्मद मोर्सी की निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंका। इज़रायल और अमेरिका भी सूडान में पर्दे के पीछे के बड़े पात्र हैं। यह सामने आया है कि सूडानी सेना के शीर्ष अधिकारी मोसाद और सीआईए के संपर्क में रहे हैं।

इसलिए सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए भले ही सूडान में विरोध प्रदर्शन सेना को समझौता करने और नागरिक शासन का रास्ता तैयार करने के लिए मजबूर करता है तो वह केवल एक अस्थायी व्यवस्था साबित हो सकती है। सऊदी और यूएई अंततः ख़ार्तूम में एक सशक्त व्यक्ति को स्थापित करने के उद्देश्य से सेना को समर्थन करेंगे। अधिक संभावना यह है कि सैन्य समर्थन और विदेशी समर्थन वाला एक और सशक्त व्यक्ति अपने समय का इंतज़ार कर रहा है।

दुखद पहलू यह है कि सूडान को मध्य पूर्व क्षेत्र में तीन निरंकुश सरकार की दया पर छोड़ दिया गया है। कोई बड़ी शक्ति - अमेरिका, रूस या चीन सूडान के लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन नहीं करता है। वे या तो उदासीन हैं या गुप्त रूप से ख़ार्तूम में फिर से सशक्त व्यक्तियों के प्रकट होने का इंतज़ार कर रहे हैं। वे शायद राजनीतिक इस्लाम के उत्थान से असहज हैं, यहाँ तक कि इसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मामले में भी यही स्थिति है। फिर से सीरिया की तरह वे मुख्यतः भू-राजनीतिक प्रिज़्म के माध्यम से इस उभरती हुई स्थिति को देखते हैं। तास न्यूज़ एजेंसी ने मंगलवार को रिपोर्ट किया कि "रूस नए सूडानी अधिकारियों को स्वीकारता है और उनके साथ संपर्क बनाए हुए है।"

यह कहने के लिए पर्याप्त है कि अगर इस भू-राजनीति ने मुस्लिम मध्य पूर्व के उत्तरी क्षेत्र के इन देशों के लिए शानदार तरीक़े से काम किया होता तो यह दक्षिणी क्षेत्र के देशों में अरब क्रांति की उन्नति में बाधाएँ पैदा करता।

इस निराशाजनक परिदृश्य में अब तक की सबसे अच्छी बात यह है कि सूडान में लोक सम्मत क्रांति अहिंसक रही है। इतिहास से पता चलता है कि हिंसक विद्रोह नई तानाशाही को संगठित करने और प्रेरित करने के लिए प्रतिशोधात्मक ताक़तों के हाथों से संचालित होते हैं। दूसरी ओर सविनय अवज्ञा, बहिष्कार, प्रदर्शन और ग़ैर-हिंसक रणनीतियों के अन्य रूप तब तक सफ़ल नहीं हो सकते जब तक कि लोक सम्मत आंदोलन न हो जो सूडान में हो रहा है।

बिना संदेह के विभिन्न नस्लीय और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों, युवा तथा वृद्ध, महिलाओं तथा पुरुषों, धर्मनिरपेक्ष तथा धार्मिक लोगों की सूडान के विरोध प्रदर्शनों में व्यापक भागीदारी है। जो चीज़ उन्हें इकट्ठा करती है वह है आज़ादी और बेहतर जीवन जीने की चाह। और इस तरह की समग्रता हमेशा सुधार विरोधी ताक़तों (पूर्ववर्ती सरकार के सिद्धांत, सेना, हित समूह, आदि) द्वारा क्रांति और/या लोकसम्मत आंदोलन को छिन्न-भिन्न करने के प्रयासों के ख़िलाफ़ एक बड़ा क़दम है।

इस तरह से इस विरोध आंदोलन की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व की आवश्यकता होती है। यहाँ फिर से बेहतर पहलू यह है कि प्रदर्शनकारी सचेत दिखाई देते हैं कि वे बहुत लंबी और चिंताजनक प्रक्रिया की आरंभ में हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसा लगाता है कि वे इस क्षेत्र में अरब क्रांति के पूर्ववर्ती लक्षणों से सबक सीखे हैं। विशेष रूप से उन्हें अपनी ओर से और अपनी शर्तों पर सेना को प्राप्त करने की आवश्यकता का एहसास होता है ताकि वे मिस्र जैसे परिदृश्य को दोहराने से रोक सकें।

अब तक सूडान में स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी हो गई है। हालांकि कोई ग़लती न हो जिससे ख़राब स्थिति पैदा हो सके। इस मामले की सच्चाई यह है कि मिस्र, सऊदी अरब और यूएई में सरकारें वास्तव में डरती हैं कि अगर सूडान में क्रांति सफ़ल हो जाती है तो एक दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है जिससे उनके ख़ुद के निरंकुश शासन पर ख़तरा हो सकता है।

इस तरह इस भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से दक्षिणी क्षेत्र (इज़रायल और अमेरिका के साथ) में निरंकुश शासन को डर होगा कि अल्जीरिया और सूडान विशेष रूप से सूडान मुस्लिम मध्य पूर्व में वर्तमान स्थिति में उत्तरी क्षेत्र के देशों (तुर्की और ईरान) के क़रीब हो सकता है जो निश्चित रूप से क्षेत्रीय संतुलन को पूरी तरह प्रभावित करेगा।

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लाल सागर तथा स्वेज नहर का मानचित्र

विडंबना यह है कि 'त्रिपक्षीय नियंत्रण' रणनीति के परिप्रेक्ष्य से जो सऊदी अरब, यूएई और मिस्र द्वारा तुर्की, ईरान और कतर के ख़िलाफ़ क्षेत्रीय तौर पर चलाया जा रहा है और इज़रायल की सुरक्षा हितों के लिए है- ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रणनीतिक रूप से स्थित सूडान जैसे दक्षिणी क्षेत्र के देश जो स्वेज नहर को जोड़ने वाले लाल सागर के किनारे स्थित है वह भरोसेमंद सशक्त लोगों के शासन में एक संरक्षित राष्ट्र बना रहे।

Courtesy: Indian Punchline
Sudan
Arab Spring
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Geopolitics
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