NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
अरे, 15 अगस्त इस बार भी 15 अगस्त को ही मनाया गया!
तिरछी नज़र : मोदी जी जब हर काम ‘नया’ और ‘पहली बार’ करने के लिए मशहूर हैं। तो 15 अगस्त और 26 जनवरी क्यों पुराने दिन के हिसाब से मनाई जाए।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
18 Aug 2019
Independence Day 2019
Image Courtesy : NDTV.com

इस बार भी स्वतंत्रता दिवस हर बार की तरह 15 अगस्त को ही मनाया गया, पंडितों ने इसके लिए कोई नया दिन नहीं सुझाया। और वैसे मोदी जी जब हर काम ‘नया’ और ‘पहली बार’ करने के लिए मशहूर हैं। तो 15 अगस्त और 26 जनवरी क्यों पुराने दिन के हिसाब से मनाई जाए। इसलिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस भी हिन्दू तिथियों के हिसाब से मनाया जाए तो मज़ा आ जाये। और मोदी हैं तो मुमकिन भी है!

इस तरह स्वतंत्रता दिवस कभी बारह अगस्त को मनाया जाएगा तो कभी अट्ठारह अगस्त को। हो सकता है कभी कभार पंद्रह अगस्त को भी मनाया जा सके। और प्रधानमंत्री जी के झंडा फहराने का महूर्त तो और भी मजेदार हो सकता है। कभी प्रातः चार बजे तो कभी रात दस बजे। मोदी जी को तो कोई तकलीफ नहीं होगी वे तो सिर्फ दो घंटे ही सोते हैं (तीन घंटे तो पिछले टर्म में सोते थे) पर जो भाषण सुनने आना चाहेंगे उन्हें जरूर कठिनाई होगी। वैसे भक्त लोग तो कभी भी पहुंच ही जायेंगे। लेकिन मोदी जी के जाने के बाद क्या होगा। हमें न तो सिर्फ दो घंटे सोने वाला प्रधानमंत्री मिलेगा और न ही इतने सारे भक्त।

गणतंत्र दिवस के बारे में तो और भी दिक्कत हो जायेगी जो इस समय छब्बीस जनवरी को मनाया जाता है। तब हो सकता है कि गणतंत्र दिवस तो कभी कभी फरवरी में भी मनाया जाये। और परेड, वह भी महूर्त देख कर निकले तो रात में भी निकल सकती है। आखिर पंडित पंचांग देखकर ही तो तिथि और महूर्त निकालेंगे। मजा तो तब आयेगा जब स्वतंत्रता दिवस या फिर गणतंत्र दिवस एक दिन नहीं दो दो दिन पड़ें। जैसे स्वतंत्रता दिवस तेरह और चौदह अगस्त को या फिर गणतंत्र दिवस इकतीस जनवरी और एक फरवरी को। आज कल सभी बड़े त्योहार इसी तरह मनाये जाते हैं। कुछ पंडित त्योहार की तिथि एक दिन निकालते हैं और दूसरे कुछ पंडित अगले दिन।

tirchi najar after change new_28.png

दिल्ली-एनसीआर में इन सभी राष्ट्रीय त्योहारों को एक दिन पहले सभी विद्यालयों में मनाया जाता हैं। सबसे पहले प्रधानाचार्य द्वारा ध्वजारोहण एवं राष्ट्रगान होता है और फिर भाषण दिये जाते हैं। बहुत सारे स्कूलों में छोटे छोटे बच्चे विभिन्न नेताओं का रूप धारण कर आते हैं। इस बार भी स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मनाये जाने वाले कार्यक्रमों में भी अमूमन ऐसा ही हुआ।

छोटी छोटी बच्चियां भारत माता का रूप धारण कर आयीं। तिरंगे की साड़ी, सिर पर मुकुट और हाथ में त्रिशूल। कुछ बच्चियां रानी लक्ष्मीबाई का रूप धारण कर के भी आयीं। बच्चे महात्मा गांधी बन कर आये। सफेद धोती, चेहरे पर गांधी जी जैसा चश्मा और हाथ में लाठी। सिर पर गांधी टोपी और अचकन में गुलाब का फूल लगाये बच्चे नेहरू बन कर आये। सिर पर हैट लगा कर भगत सिंह बने। नुकीली मूंछों के साथ कमर में पिस्तौल लटकाये चंद्रशेखर आजाद का रूप धारण कर आये। बच्चे बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपतराय भी बने। पर कोई भी बच्चा हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी या दीनदयाल उपाध्याय बन कर नहीं आया। बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों, सभी को पता है कि इन सब लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं किया है। अब इनका भी योगदान दिखाना है तो झूठ बोलना ही पड़ेगा, इतिहास बदलना ही पड़ेगा।

अब इतिहास किताबें बदल देने से तो नहीं बदल जाता है। हिटलर के मंत्री गोयबल्स ने यह तो समझा दिया है कि झूठ बार बार बोलने से सच लगने लगता है पर इससे झूठ सच नहीं बन जाता है। बार बार बोलने से झूठ अगर सच बन जाये तो दुनिया का सबसे झूठा व्यक्ति सबसे सच्चा माना जाये। फिर तो ट्रम्प जी और मोदी जी भी सच्चे ही माने जायें। वैसे इस बात से भक्तों को बुरा मानने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें तो खुश ही होना चाहिए कि मैंने मोदी जी को ट्रम्प जी के साथ रखा है। मुझे आज भी याद है कि ट्रम्प जी के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद मोदी जी के भक्तों ने ट्रम्प जी का जन्मदिन किस धूमधाम से मनाया था। किस तरह से ट्रम्प जी के पुतले को केक खिलाया था।

लेकिन बात तो हम झूठ की कर रहे थे। कहते हैं झूठ के पैर नहीं होते हैं। गोयबल्स के जमाने में झूठ हवा पे सवार हो फैलता था और अब मोदी काल में व्हाट्सएप पर सवार होकर। अब अपने झूठ को सच बनाने के लिए बच्चों को बतायें, झूठ ही सही, कि हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी या दीनदयाल उपाध्याय का देश की आजादी में क्या योगदान था। यह भी बतायें कि ये लोग कैसे दिखाई देते थे, क्या कपड़े पहनते थे, जिससे बच्चे फैंसी ड्रेस में इन जैसे बन कर भी आ सकें।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

Indian independence day
Independence Day 2019
Red Fort
Narendera Modi
TIRANGA
republic day
15 august
26 January

Related Stories

विशेष: एक हमारी और एक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो

तिरछी नज़र: 26 जनवरी बिल्कुल ही सरकार जी की प्लानिंग के मुताबिक रही

इतवार की कविता : साधने चले आए हैं गणतंत्र को, लो फिर से भारत के किसान

इतवार की कविता : साहिर लुधियानवी की नज़्म 26 जनवरी

'हम काग़ज़ विहीन भारत के लोग'


बाकी खबरें

  • Ayodhya
    रवि शंकर दुबे
    अयोध्या : 10 हज़ार से ज़्यादा मंदिर, मगर एक भी ढंग का अस्पताल नहीं
    24 Jan 2022
    दरअसल अयोध्या को जिस तरह से दुनिया के सामने पेश किया जा रहा है वो सच नहीं है। यहां लोगों के पास ख़ुश होने के लिए मंदिर के अलावा कोई दूसरा ज़रिया नहीं है। अस्पताल से लेकर स्कूल तक सबकी हालत ख़राब है।
  • BHU
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: ‘भूत-विद्या’ के बाद अब ‘हिंदू-स्टडीज़’ कोर्स, फिर सवालों के घेरे में आया बीएचयू
    24 Jan 2022
    किसी भी राष्ट्र को आगे ले जाने के लिए धर्म की नहीं, विज्ञान और संविधान की जरूरत पड़ती है। बेहतर होता बीएचयू में आधुनिक पद्धति के नए पाठ्यक्रम शुरू किए जाते। हमारा पड़ोसी देश चीन बिजली की मुश्किलों से…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: एक वीरता पुरस्कार तो ग़रीब जनता का भी बनता है
    24 Jan 2022
    बेरोज़गारी, महंगाई और कोविड आदि की मार सहने के बाद भी भारत की आम जनता ज़िंदा है और मुस्कुरा कर पांच राज्यों में फिर मतदान की लाइन में लगने जा रही है, तो एक वीरता पुरस्कार तो उसका भी बनता है...बनता है…
  • genocide
    पार्थ एस घोष
    घर वापसी से नरसंहार तक भारत का सफ़र
    24 Jan 2022
    भारत में अब मुस्लिम विरोधी उन्माद चरम पर है। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से इसमें लगातार वृद्धि हुई है।
  • bulli bai
    डॉ. राजू पाण्डेय
    नफ़रत का डिजिटलीकरण
    24 Jan 2022
    सुल्ली डील्स, बुल्ली बाई, क्लबहाउस और अब ट्रैड्स के ज़रिये अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का काम लगातार सोशल मीडिया पर हो रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License