NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
फिल्में
कला
रंगमंच
संगीत
भारत
राजनीति
आर्टिस्ट्स यूनाईट : कलाकारों को साथ आने की ज़रूरत क्यूँ है?
पिछले पाँच सालों में मौजूदा सरकार द्वारा किए गए लोकतंत्र और संविधान के विरोध में, देश भर में फैलाई गई नफ़रत के विरोध में कलाकार 2 और 3 मार्च को देश के कई शहरों में जमा हुए और नफ़रत के ख़िलाफ़ एकजुट होकर प्यार और शांति का संदेश सारे देश में फैलाया।
सत्यम् तिवारी
04 Mar 2019
नफ़रत से आज़ादी

प्रतिरोध किसी भी लोकतंत्र का एक अहम पहलू है। प्रतिरोध या विरोध, सत्ता की मनमानियों के ख़िलाफ़ , सत्ता के ज़ुल्म के ख़िलाफ़। भारत और पाकिस्तान के 70 साल के दौर में सरकारें तरह-तरह की मनमानियाँ करती रही हैं। नागरिकों के अधिकारों का हनन, उनकी आज़ादी पर हमला, हज़ारों-हज़ार दफ़ा देखने को मिला है। पाकिस्तान ने तो इन 70 साल में बार-बार सैन्य शासन देखा है। लेकिन इन ज़ुल्मों के विरोध में आवाज़ उठाने का काम समय-समय पर देश के कलाकारों ने बख़ूबी किया है। हमें मालूम है 70 के दशक का वो वक़्त जब पाकिस्तान में जनरल ज़िया उल हक़ ने साड़ी पहनने पे प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके विरोध में इक़बाल बानो ने एक प्रोग्राम में फ़ैज़ की नज़्म "हम देखेंगे" गाई थी। उस ऑडियो में लग रहे नारे सुन कर एक सुकून मिलता है और विरोध की ताक़त का भी अंदाज़ा होता है। इसी तरह से हर दौर में शायरों, लेखकों, फ़िल्म निर्माताओं, गायकों और हर विधा के कलाकारों ने देश की सरकार द्वारा किए जा रहे ज़ुल्मों के विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद की है।

IMG_0842 2.JPG

हर विधा के कलाकारों ने एक बार फिर से एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद की है। पिछले पाँच सालों में मौजूदा सरकार द्वारा किए गए लोकतंत्र और संविधान के विरोध में, देश भर में फैलाई गई नफ़रत के विरोध में कलाकार 2 और 3 मार्च को देश के कई शहरों में जमा हुए और नफ़रत के ख़िलाफ़ एकजुट होकर प्यार और शांति का संदेश सारे देश में फैलाया। ये कार्यक्रम "artists unite” के बैनर तले तमाम विधाओं के कलाकारों ने आयोजित किया था। पिछले साल हुये कैम्पेन "NOT IN MY NAME” में शामिल हुए संगठन इस कार्यक्रम में भी एक साथ सामने आए। चंडीगढ़, बंगलुरु, चेन्नई, अमदाबाद जैसे शहरों के अलावा दिल्ली के लाल क़िले पर ये प्रोग्राम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में हर विधा और हर उम्र के कलाकार शामिल थे।

Jashn-E-Qalam.jpg

लाल क़िले पर कैसे क्या हुआ?

पिछले साल हुए कैम्पेन NOT IN MY NAME में शामिल हुए अलग-अलग संगठनों ने मिल कर artists unite नाम के एक ग्रुप का गठन किया जिसका मक़सद था "लोकतंत्र के लिए, नफ़रत के खिलाफ़"

पिछले साल दिसम्बर में एक लिस्ट जारी की गई थी जिसमें उन सभी कलाकारों ने दस्तख़त किए थे जो नफ़रत के विरोध में artists unite के साथ खड़े थे। इस लिस्ट में देश भर से 450 कलाकारों ने दस्तख़त किए जिसमे नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक, नन्दिता दास जैसे नाम शामिल थे। सब कलाकार एकजुट हुए थे ये बताने के लिए कि लोकतंत्र सत्ता कि मनमानी के लिए नहीं, बल्कि जनता के हक़ और जनता कि आज़ादी के लिए होना चाहिए।

artists unite की तैयारियाँ इस साल के शुरुआत से ही चालू थीं। facebook, instagram पर posters unite नाम से अलग-अलग पोस्टर फैलाये गए जो नफ़रत को भुला कर प्यार और शांति के समर्थन में बात कर रहे थे। कॉलेजों में, गली-मोहल्लों में, रिहायशी कॉलोनियों में भी पोस्टर चिपका कर आम जनता से नफ़रत के विरोध में एकजुट होने की अपील की गई।

तमाम कोशिशों और तैयारियों के बाद 2 और 3 मार्च को लाल क़िले पर सभी कलाकार एकजुट हुए और सुबह 11 बजे से रात 10 बजे तक अपनी कला के माध्यम से नफ़रत के विरोध में अपनी आवाज़ें बुलंद कीं।

कार्यक्रम में गायक/गायिका शुभा मुद्गल, सोनम कालरा, मदनगोपाल सिंह (चार यार), कबीर कैफ़े, शीतल साठे, ध्रुव सांगरी के अलावा रैप ग्रुप्स, हिप-हॉप कलाकार शामिल हुए।

दास्तानगोई के लिए फ़ोज़िया दास्तानगो, उदित यादव, साहिल आग़ा। थिएटर/डांस में ध्वनि विज, जन नाट्य मंच, इशामुद्दीन, लोकेश जैन, माया राव के अलावा कवियों में अशोक वाजपायी, गौहर रज़ा, सबिका अब्बास नक़वी, मंगलेश डबराल, नोमान शौक़, सौम्या बैजल शामिल थे।

Sabika Abbas Naqvi_0.JPG

इसके अलावा आज़ाद मैदान में जगह-जगह पेंटर, नाटककार, जादूगर, अलग अलग तरीक़ो से लोगों को अमन और प्यार का संदेश दे रहे थे। युवाओं का जोश और उनका इतनी बड़ी तादाद में हिस्सा इस कार्यक्रम की अहम बात थी। कॉलेजों की नुक्कड़ नाटक संस्थाएं, अपने नाटक लेकर artists unite में शामिल हुईं।

कई युवा रैपेर्स, हिप-हॉप कलाकारों ने लाल क़िले पर अपनी कला का प्रदर्शन किया और लोकतंत्र के लिए हुए इस कार्यक्रम में अपनी हाज़िरी दर्ज की।

आज़ाद मैदान में जगह-जगह कला प्रदर्शनी लगाई गई थीं। डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में, फ़ोटोग्राफ़ी के ज़रिये भी कलाकारों ने नफ़रत के विरोध अपने स्वर को ऊँचा किया।

इस तरह के कार्यक्रम की ज़रूरत क्यूँ है?

किसी भी कलाकार को समाज का आईना माना जाता है, और उससे उम्मीद की जाती है कि समाज के हालात पर, देश में चल रहे माहौल पर अपनी कला का इस्तेमाल करते हुए प्रतिक्रिया दे। वो कलाकार जिसकी कला में आज के माहौल का ज़िक्र ना रहे, उसकी कला के कोई मायने रह जाते हैं। देश में आज का माहौल वो है जब अभिव्यक्ति कि आज़ादी पर हमले बढ़ रहे हैं, लोगों को आवाज़ उठाने कि वजह से मारा जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है। ये हरकतें पिछले पाँच साल में, मौजूदा सरकार के वक़्त में बढ़ा है, और लगातार बढ़ रहा है। सारे देश में नफ़रत का माहौल है। अल्पसंख्यकों,दलितों, पत्रकारों, पर लगातार हमले बढ़े हैं।

देश में जब भी ऐसा दौर आया है, तब कलाकारों ने नफ़रत को भुला कर प्यार कि बातें कि ही हैं। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के अमन के लिए बशीर बद्र ने ये शेर कहा था,

“दुश्मनी का सफ़र एक क़दम दो क़दम

तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे"

आज के नफ़रतों के इस माहौल में कलाकारों की ये ज़िम्मेदारी बनती है कि लिख कर, गा कर, फ़िल्मों के माध्यम से, देश में लगातार बढ़ रहे इस ज़ुल्म के विरोध में आवाज़ उठाएँ और ये कहें कि देश नफ़रत से नहीं, प्यार और शांति से ही आगे बढ़ सकेगा।

India

Related Stories

#metoo : जिन पर इल्ज़ाम लगे वो मर्द अब क्या कर रहे हैं?

अविनाश पाटिल के साथ धर्म, अंधविश्वास और सनातन संस्था पर बातचीत

ज़ायरा, क्रिकेट और इंडिया

हिंदी आख़िर किसकी मातृभाषा है?

रैपर हार्ड कौर के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज

"आरएसएस का सिद्धांत भारत के लिए हानिकारक है" - हामिद अंसारी

बूट-बूट की सरकार: हमारे नेताओं का अनुशासन कहाँ खो गया है?

कर्ता ने कर्म को...


बाकी खबरें

  • Ukraine
    सी. सरतचंद
    यूक्रेन युद्ध की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
    01 Mar 2022
    अन्य सभी संकटों की तरह, यूक्रेन में संघर्ष के भी कई आयाम हैं जिनकी गंभीरता से जांच किए जाने की जरूरत है। इस लेख में, हम इस संकट की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि की जांच करने की कोशिश करेंगे।
  • Chamba Tunnel
    सीमा शर्मा
    जाने-माने पर्यावरणविद् की चार धाम परियोजना को लेकर ख़तरे की चेतावनी
    01 Mar 2022
    रवि चोपड़ा के मुताबिक़, अस्थिर ढलान, मिट्टी के कटाव और अनुक्रमित कार्बन(sequestered carbon) में हो रहे नुक़सान में बढ़ोत्तरी हुई है।
  • UP Election
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश चुनाव: 'कमंडल' पूरी तरीके से फ़ेल: विजय कृष्ण
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव में इन दिनों सत्ताधारी भाजपा जनता पार्टी के राज्य बिगड़ते जातीय समीकरणों पर काफी चर्चा चल रही है. विशेषज्ञों के अनुसार जिन जातीय समीकरणों ने भाजपा को 2017 में सत्ता दिलाने में…
  • Manipur Elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर चुनावः जहां मतदाता को डर है बोलने से, AFSPA और पानी संकट पर भी चुप्पी
    28 Feb 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने नौजवानों की राजनीतिक आकांक्षाओं और उम्मीदों को टटोला, साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता ओनिल से जाना पानी संकट और ड्रग्स पर भाजपा की चुप्पी का सबब। साथ ही भारत…
  • Modi
    सोनिया यादव
    काशी में पीएम मोदी ने 'राजनीतिक गिरावट' की कही बात, लेकिन भूल गए ख़ुद के विवादित बोल
    28 Feb 2022
    चुनावी रैलियों में पीएम मोदी ने भले ही बीजेपी के स्टार प्रचारक के तौर पर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों को ख़ुश किया होगा, लेकिन एक पीएम के तौर पर वो इस पद की गरिमा को गिराते ही नज़र आते…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License