NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आर्थिक मंदी : परिवारों की बचत घटी और क़र्ज़ बढ़ा
मौजूदा आर्थिक संकट का बुरा असर न केवल भारतीय परिवारों के वर्तमान, बल्कि उनके भविष्य को भी तबाह कर देगा।
सुबोध वर्मा
19 Sep 2019
Economic slowdown in India
Image Courtesy: Rediff.com

आर्थिक विकास में लगातार गिरावट, बड़ी संख्या में जा रही नौकरियां (पहले से ही मौजूद बेरोज़गारी की बदतर स्थिति में इज़ाफ़ा होते हुए) और कामकाजी लोगों की कम होती आमदनी के चलते जारी आर्थिक संकट में कुछ छिपे हुए घटक हैं जो भविष्य में लंबे समय तक असर डालेंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार परिवारों को अपनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए उन्हें बचत की हुई रक़म का इस्तेमाल करने और क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्पष्ट तौर पर इसका मतलब यह है कि भविष्य का ख़र्च - जिसके लिए बचत की गई थी - प्रभावित होगा और भविष्य में होने वाली आय, लिए गए क़र्ज़ को चुकाने में ख़र्च करनी होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो ये मंदी न सिर्फ़ वर्तमान में जीवन को प्रभावित कर रही है बल्कि भविष्य के जीवन स्तर को भी प्रभावित कर रही है।

जीडीपी के हिस्से के रूप में घरेलू बचत 2011-12 में 23.6% से लगातार घटकर 2017-18 में 17.2% हो गई है। इस संबंध में आरबीआई का पिछले साल का डाटा उपलब्ध है। [नीचे दिया गया चार्ट देखें] ऐसा माना जाता है कि 2018-19 के आंकड़ों में मंदी के प्रभाव के चलते इसी तरह की गिरावट जारी रहेगी। वास्तविक (मुद्रास्फ़ीति-समायोजित) गिरावट को उजागर करने के लिए जीडीपी के हिस्से के रूप में बचत (सेविंग्स) को शामिल करना आवश्यक है।

graph 1_0.PNG

ये घरेलू बचत वित्तीय बचत (जैसे बैंक जमा आदि), वस्तुगत संपत्ति (जैसे मकान) में बचत और सोने व चांदी के आभूषणों के रूप में बचत से इकट्ठा होते हैं। बैंक ऋण जैसे परिवारों की वित्तीय देनदारियों को सकल वित्तीय बचत के लिए घटाया जाता है।

सिक्के का दूसरा पहलू क्या है - परिवारों की देनदारियां? आरबीआई का यही स्रोत घरेलू देनदारियों में 2011-12 में सकल घरेलू उत्पाद की 3.3% से 2015-16 में 2.8% तक की मामूली गिरावट दिखाता है और फिर 2017-18 में सकल घरेलू उत्पाद के 4.3% तक पहुंचने के लिए स्पष्ट रूप से बढ़ जाता है। इस संबंध में पिछले साल का डाटा उपलब्ध है। [नीचे दिया गया चार्ट देखें] ये सालाना देय देनदारियां हैं।

graph 2_0.PNG

यह स्पष्ट है कि वर्तमान संकट की जड़ें काफ़ी पहले से मौजूद हैं। ख़राब मानसून के अलावा नौकरियों के गंभीर संकट, पहली मोदी सरकार की अक्षमता और 2016 के अंत में होने वाली नोटबंदी जैसी विनाशकारी घटनाओं के चलते पूरी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है और वर्तमान आर्थिक संकट से घिर गई है। इसीलिए, पिछले कुछ वर्षों से बचत और घरेलू देनदारियां बढ़ रही हैं।

अब, आइए हम बैंकों से प्राप्त परिवारों के बक़ाया कुल ऋण की ओर रुख करें। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से पता चलता है कि ऐसे व्यक्तिगत बक़ाया ऋण 2014 से लगातार बढ़े हैं। उस समय ये जीडीपी का 9% था जो बढ़कर मार्च 2019 तक जीडीपी का 11.7% तक बढ़ गया।

graph 3.PNG

ये ऋण किस प्रकार के हैं? ख़ास तौर से इनमें से लगभग आधे आवास ऋण हैं। लेकिन शिक्षा ऋण, उपभोक्ता स्थायी ऋण और तेज़ी से बढ़ते क्रेडिट कार्ड बक़ाया भी हैं। याद रहे कि ये आंकड़े कुल ऋण बक़ाया हैं जो वार्षिक वृद्धि नहीं हैं, जो कि इन आंकड़ों को पहले चर्चा की गई वित्तीय देनदारियों से अलग करता है।

ध्यान दें कि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से ऋण में यह वृद्धि वास्तव में तेज़ी से हुई है। तब तक यह स्थिर थी। मोदी सरकार ने परिवारों के क़र्ज़ के बोझ को बढ़ाते हुए इस ऋण आधारित ख़र्च को गति दी है।

इन आंकड़ों पर नज़र डालें तो ये आंकड़े उस नुक़सान का खुलासा करते हैं जो सरकार की नीतियों ने परिवारों पर थोपा है। इन सबके अलावा सच्चाई यह है कि इस अवधि में बेरोज़गारी ज़्यादा रही है और मज़दूरी स्थिर रही है, कृषि से आय में वृद्धि काफ़ी ख़राब रही है और आयात और नोटबंदी व जीएसटी की दोहरी मार से छोटे और मझोले क्षेत्र के उद्योग चौपट हुए हैं और इस सरकार की नीतियों के चलते डरावनी आर्थिक मुसीबत की तस्वीर आप देख सकते हैं। यह अविश्वसनीय लगता है कि यह वही सरकार है जिसने अच्छे दिनों का वादा किया था।

Economic slowdown
Economic Slowdown under Modi Government
Modi government
Narendra modi
Finance Ministry
Family Savings
indian economy

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • अरुण कुमार त्रिपाठी
    विचार: योगी की बल्ले बल्ले, लेकिन लोकतंत्र की…
    27 Mar 2022
    अंतरराष्ट्रीय पूंजी ने आधुनिक किस्म के हिंदुत्व के साथ एक तालमेल बिठा लिया है। अब इसे मनुवादी कहना और ब्राह्मणवादी कहना एकदम से सटीक नहीं बैठता। इसमें सत्ता में भागीदारी का पूरा इंतजाम किया गया है।
  • international
    न्यूज़क्लिक टीम
    रूस-यूक्रेन युद्धः क्या चल रहा बाइडन व पुतिन के दिमाग़ में
    26 Mar 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने युक्रेन युद्ध के एक महीने होने के बाद चल रहे दांवों पर न्यूज़ क्लिक के एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ से बातचीत की। इसमें रूस की रणनीति के साथ-साथ…
  • रवि शंकर दुबे
    IPL 2022:  नए नियमों और दो नई टीमों के साथ टूर्नामेंट का शानदार आगाज़
    26 Mar 2022
    आईपीएल 2022 का आगाज़ हो चुका है, इस बार कई नियमों में बदलाव किए गए हैं तो लखनऊ और गुजरात की टीमों ने भी एंट्री मार ली है। ऐसे में क्रिकेट फैंस के लिए टूर्नामेंट बेहद रोचक होने वाला है।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या RSS योगी में देखता है मोदी का उत्तराधिकारी
    26 Mar 2022
    यूपी में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है. भारतीय जनता पार्टी-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियो में अब उनकी बराबरी कराने वाला कोई नहीं!
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    रेलवे में 3 लाख हैं रिक्तियां और भर्तियों पर लगा है ब्रेक
    26 Mar 2022
    एक तरफ बेरोज़गार युवा दर-दर भटक रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सरकारी विभागों में इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां, वह भी केवल एक विभाग में, चौंकाने वाली है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License