NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था गहरे संकट में, बजट से भी उम्मीद नहीं
जैसे-जैसे मोदी सरकार 2019-20 के लिए बजट पेश करने के लिए तैयार हो रही है, उसके सामने एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जो सीधे गड्ढे में जा रही है, क्योंकि मानसून में देरी है और बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है।
सुबोध वर्मा
03 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
अर्थव्यवस्था गहरे संकट में, बजट से भी उम्मीद नहीं

इस साल फ़रवरी में, निवर्तमान मोदी सरकार ने एक अंतरिम बजट पेश किया था क्योंकि आम चुनाव पास ही थे। सत्तारूढ़ भाजपा ने एक बार फिर से निर्णायक जनादेश हासिल कर लिया, अब फिर से भाजपा की अगुवाई वाली सरकार होगी जो 5 जुलाई को अपना पूर्ण बजट पेश करेगी। इसमें एकमात्र बदलाव यह होगा कि इस बार भारत की नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण है - लेकिन इससे कुछ भी बदलने की संभावना नहीं है।

हालांकि देश की अर्थव्यवस्था, धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से एक गहरे संकट में डूब रही है। इसके लिए काफ़ी हद तक तो प्रणालीगत वयवस्था ज़िम्मेदार है, और कुछ यह आकस्मिक है। सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास दृष्टि और संसाधन के मामले में दूरदर्शिता है? वे इस संकट से कैसे निपटते हैं यह बात भी इस बजट में स्पष्ट हो जाएगी। आईए देश पर छा रहे इन घने काले बादलों पर एक नज़र डालें।

कृषि 

वर्तमान में सबसे बड़ी चिंता मानसूनी बारिश की अनिश्चितता है। लगातार चार कम पानी वाले मानसून के बाद (जबकि देश के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ा हुआ है), इस वर्तमान मानसून में भी देरी हो रही है। इसका मतलब है कि किसानों ने बुवाई को स्थगित कर दिया है, न जाने बारिश आएगी या नहीं और यदि हाँ, तो कब आएगी! कुल मिलाकर, खरीफ़ सीज़न के लिए सामान्य की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत कम क्षेत्र बोया गया है, जो पिछले पांच सीज़न का औसत है।

11_15.jpg

जैसा कि ऊपर दी गई तालिका में देखा जा सकता है, जिसे 28 जून दिनांकित सप्ताह के लिए अखिल भारतीय फसल स्थिति रिपोर्ट से प्राप्त किया गया है, जिसके मुताबिक़ दालों मे बुवाई में कमी 70 प्रतिशत है, तिलहन में 44 प्रतिशत और कपास में 41 प्रतिशत है। चावल और मोटे अनाज के लिए यह 24 प्रतिशत समान है।

यह सब बदल सकता है अगर मानसून जल्दी से आगे बढ़ जाए। बुवाई का समय किसानों के लिए बहुत लचीला होता है। लेकिन रेत तेज़ी से हाथ से फिसल रही है, और खिड़की बंद हो रही है। मानसून में एक बार फिर से कमी का मतलब किसानों की तकलीफ़ों में तेज़ी से वृद्धि होगी। सरकार हर किसान को 6,000 रुपये देकर हालात को सँभालने का भरोसा कर सकती है (पहले की योजना जो छोटे और सीमांत किसानों तक सीमित थी), लेकिन मानसून के ख़राब होने पर किसानों को भारी नुक़सान के एवज़ में यह ऊंट के मुहँ मे ज़ीरे जैसा होगा। याद रखें: भारत की 55 प्रतिशत खेती अभी भी वर्षा पर आधारित है, अर्थात यह मानसून की वर्षा से निर्वाह करती है, न कि सिंचाई से।

उद्योग

औद्योगिक क्षेत्र में भी स्थिति काफ़ी अधिक गंभीर है। पिछले साल के दौरान, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) कम या ज़्यादा स्थिर ही रहा है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से पता चल सकता है, जिसे सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से लिया गया है। इसका मतलब यह है कि समग्र सूचकांक द्वारा दर्शाए गए सभी क्षेत्रों में औद्योगिक उत्पादन में लगभग कोई वृद्धि नहीं हुई है। इसका मतलब यह भी है कि रोज़गार में भी कोई वृद्धि नहीं हुई है।

22.jpg

अब, नीचे दिए गए चार्ट पर एक नज़र डालें जो विनिर्माण क्षेत्र में जारी बैंक ऋण में वृद्धि दिखाता है। यह इस बात का पैमाना है कि उत्पादक क्षमता में कितना विस्तार हो रहा है, क्योंकि बैंक ऋण का उपयोग मुख्य रूप से उस उद्देश्य के लिए ही किया जाता है।

33.jpg

वर्ष 2015 के बाद से इसमें भी बमुश्किल कोई वृद्धि नज़र आती है। उद्योगपति अधिक उधार नहीं चाहते हैं क्योंकि वे उत्पादक क्षमताओं के विस्तार के लिए कोई बिंदु नहीं देख पा रहे हैं। ऐसा क्यूं? क्योंकि उनके उत्पादों के लिए मांग अपर्याप्त है।

कई अन्य संकेतक हैं जो इस औद्योगिक मंदी की पुष्टि करते हैं। पेट्रोलियम उत्पाद की खपत धीमी हो गई है। अगस्त 2018 से चिह्नित कमज़ोर रुझान के साथ जारी रहने के कारण फ़र्नेस ऑयल, पेट कोक, कोलतार और अन्य औद्योगिक ईंधन की खपत में 8.4 प्रतिशत और 9.3 प्रतिशत की गिरावट आई है। भारतीय रेलवे पर माल की आवाजाही वर्ष दर वर्ष में केवल 2.9 प्रतिशत की दर मई 2019 से बढ़ रही है, सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार, 2017-18 और 2018-19 के अधिकांश महीनों की तुलना ये काफ़ी धीमी है। पिग आयरन, स्टील और सीमेंट की बिक्री भी धीमी हो गयी है। अप्रैल 2019 में एयर कार्गो ट्रैफ़िक नकारात्मक क्षेत्र की तरफ फिसल गया है। बंदरगाहों पर, कमोडिटी ट्रैफिक में वृद्धि हुई है, लेकिन मुख्य रूप से तेल आयात में 11 प्रतिशत की वृद्धि के कारण।

इस बीच, 2019 के अप्रैल-मई में माल व्यापार घाटा बढ़कर 30.7 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले साल की समान अवधि में 28.3 अरब डॉलर था। सीएमआईई के अनुसार, पिछले वर्ष 12-13 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में इस अवधि में निर्यात आय में केवल 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

यात्री कार की बिक्री 23 महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, और दोपहिया वाहनों की बिक्री लगातार पांचवें महीने में गिर गई है। वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में सीधे छठे महीने में गिरावट आई है। यह सब दर्शाता है कि औद्योगिक क्षेत्र एक संकट की चपेट में है।

रोज़गार

नौकरियों में पहले से जारी संकट तब ज़्यादा गहरा जाएगा जब अर्थव्यवस्था में और अधिक गिरावट आएगी, और इसके अलावा, अगर मानसून विफ़ल हो जाता है तो इसकी दशा और भी ख़राब हो जाएगी। सीएमआईई के अनुसार बेरोज़गारी पहले से ही 7-8 प्रतिशत की दर पर स्थिर है। जनवरी-अप्रैल 2019 सीएमआईई सर्वेक्षण डेटा के नवीनतम अनुमानों के अनुसार भारत में 40 करोड़ 40 लाख 25 हज़ार लोग कार्यरत थे। इसका मतलब यह है कि पिछले साल की समान अवधि में डेढ़ करोड़ रोज़गार ख़त्म हो गए और जनवरी-अप्रैल 2017 के बाद से 4 करोड़ 70 लाख कुल नौकरियों का नुकसान हुआ है। जिस देश में नए रोज़गार सृजन की स्थिति इतनी ढुलमुल है, नौकरियों में यह लगातार नुक़सान अर्थव्यवस्था में गंभीर संकट की तरफ़ इशारा कर रहा है।

मोदी सरकार अर्थव्यवस्था मे इस तरह की तकलीफ़ों और दरारों को कैसे संबोधित करेगी इसे 5 जुलाई को देखा जाएगा जब बजट पेश होगा। लेकिन पिछले अनुभव को देखते हुए कुछ भी बेहतर होने की उम्मीद करना सही नहीं होगा।

Budget 2019-20
indian economy
Monsoons
Rain Deficit
unemployment
BJP
Nirmala Sitharaman
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    मुकुंद झा
    एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    16 Jan 2022
    संयुक्त किसान मोर्चा के फ़ैसले- 31 जनवरी को देशभर में किसान मनाएंगे "विश्वासघात दिवस"। लखीमपुर खीरी मामले में लगाया जाएगा पक्का मोर्चा। मज़दूर आंदोलन के साथ एकजुटता। 23-24 फरवरी की हड़ताल का समर्थन।
  • cm yogi dalit
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव और दलित: फिर पकाई और खाई जाने लगी सियासी खिचड़ी
    16 Jan 2022
    चुनाव आते ही दलित समुदाय राजनीतिक दलों के लिए अहम हो जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उनके साथ बैठकर खाना खाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि दलित वोटर अपनी पसंद किसे बनाते हैं…
  • modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : झुकती है सरकार, बस चुनाव आना चाहिए
    16 Jan 2022
    बीते एक-दो सप्ताह में हो सकता है आपसे कुछ ज़रूरी ख़बरें छूट गई हों जो आपको जाननी चाहिए और सिर्फ़ ख़बरें ही नहीं उनका आगा-पीछा भी मतलब ख़बर के भीतर की असल ख़बर। वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन आपको वही बता  …
  • Tribute to Kamal Khan
    असद रिज़वी
    कमाल ख़ान : हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
    16 Jan 2022
    पत्रकार कमाल ख़ान का जाना पत्रकारिता के लिए एक बड़ा नुक़सान है। हालांकि वे जाते जाते भी अपनी आंखें दान कर गए हैं, ताकि कोई और उनकी तरह इस दुनिया को देख सके, समझ सके और हो सके तो सलीके से समझा सके।…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    योगी गोरखपुर में, आजाद-अखिलेश अलगाव और चन्नी-सिद्धू का दुराव
    15 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के अयोध्या से विधानसभा चुनाव लडने की बात पार्टी में पक्की हो गयी थी. लेकिन अब वह गोरखपुर से चुनाव लडेंगे. पार्टी ने राय पलट क्यों दी? दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License