NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अनुच्छेद 370 : घाटी ने BJP और संघ के 'एकीकरण' को नकारा
कश्मीर के गुस्से से भरे सिविल कर्फ्यू से राज्य की सही स्थिति दिखाई दे जाती है।
बशारत शमीम
22 Oct 2019
article 370

बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से 35A के तहत मिली संवैधानिक सुरक्षा और विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद अब दो महीने से ऊपर वक्त गुज़र चुका है। दो महीनों से ही कश्मीर घाटी को गुस्से और निराशा ने जकड़ रखा है। माहौल में अब डर और अनिश्चितता बनी हुई है। विरोध प्रदर्शनों को बेरहमी से दबा दिया गया। लोगों का गुस्सा पूरी घाटी में हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में देखा जा सकता है। एक किस्म की मुर्दा शांति छाई हुई है।  

निचले और उच्च दर्जे के सभी शैक्षिणिक संस्थान अब भी बंद पड़े हैं। बंद से कश्मीरियों, खासकर मजदूर वर्ग की रोजी-रोटी पर बहुत बुरा असर पड़ा है। घाटी में मची उथल-पुथल से उन्हें फिर नुकसान हुआ है। कश्मीरी सेब उद्योग को बहुत बुरी मार पड़ी है। पिछले दो महीनों में दैनिक कामगार, मजदूर, स्टाल वेंडर्स, छोटे दुकानदार, ऑटोवाले और ड्राईवर समेत तमाम लोगों ने एक पैसा तक नहीं कमाया। एक तरफ इन लंबे प्रदर्शनों ने उनकी रोजी-रोटी को ख़तरे में डाल दिया है, तो दूसरी तरफ राज्य के दमन से उनकी जान पर बन आई है। दोनों ही तरफ से उनको राहत नहीं है।  

अगस्त,1952 में जम्मू और कश्मीर विधानसभा में दिए गए शेख अब्दुल्ला के भाषण को आज याद किया जाना चाहिए।  इस विख्यात भाषण में उन्होंने कहा था, 'भारत के साथ हमारे रिश्तों की सबसे बड़ी गारंटी लोकतंत्र और पंथनिरपेछ भावनाओं की पहचान है...मैं साफ कर देना चाहता हूं कि मनमर्जी से अगर इस संबंध के आधार का उल्लंघन किया गया, तो न केवल भारत के संविधान की आत्मा और शब्दों का उल्लंघन होगा, बल्कि इससे भारत के साथ हमारे राज्य के समन्वयपूर्ण जुड़ाव पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। '  

अब राज्य का विशेष दर्जा छीनकर उसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। यह जम्मू-कश्मीर के लोगों और भारत में रह रहे लोकतांत्रिक नागरिकों की भी मर्जी के खिलाफ है। 2019 में बीजेपी के बड़े बहुमत से वापस आने के बाद से ही विशेष दर्जे पर संकट के बादल छाने लगे थे। अब साबित हो चुका है कि बीजेपी कश्मीर समस्या के समाधान और शांति लाने में विश्वास नहीं रखती। इसके उलट यह कश्मीर में अपनी दमनकारी नीतियों को लागू करवाने और भारत-कश्मीर संबंध के जटिल सवाल को दोबारा सामने लाने पर खुश है।

राज्य में ज्यादातर लोगों का सोचना है कि नई दिल्ली का यह कदम तार्किकता से परे है। इस एहसास के बहुत खतरनाक नतीजे होंगे। भारतीय राज्य अब पूरी तरह से बेहद घृणित होकर बदनाम हो गया है। उनकी नजरों में भी जो पहले भारतीय राज्य के साथ थे। इसने भयंकर खतरनाक स्थितियों की निर्माण का रास्ता खोल दिया है। अब इस बात का अनुमान लगाना कठिन हो चुका है कि कैसे घाटी में स्थितियां सामान्य होंगी।  

कश्मीर में भारी सैन्य कार्रवाई में हजारों लोगों को गिरफ्तार कर आगरा, बरेली और दूसरी जगह भेज दिया गया है। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कई विधायक अब भी या तो गिरफ्तार हैं या नजरबंद कर दिए गए हैं। राज्य में इस वक्त बहुत बड़े स्तर का संचार अवरोध है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। साथ ही सैन्यबलों की संख्या में भी बहुत इज़ाफा किया गया है। किसी के समझ से परे है कि डिजिटल इंडिया की बहती गंगा में एकदम से सूखा आ गया है और किसी को कस्बों और गांवों में सैनिकों की बाढ़ की कोई खबर ही नहीं है।

सबकुछ सेना और अर्धसैनिक बलों के हाथ में दे दिया गया है।  इनकी गाड़ियां खाली सड़कों पर गश्त लगाती हैं। जगह-जगह बैरिकेड लगाए गए हैं और स्थानीय लोगों, खासकर युवाओं के काग़ज़ातों की जांच की जा रही है। भीतरी ग्रामीण इलाकों में तो सैन्यबल के हाथों में ही कानून-व्यवस्था है। इन इलाकों में गांव के बुजुर्गों, युवाओं और धार्मिक गुरूओं को अक्सर आर्मी कैंपों में सवाल-जवाब के लिए बुलाया जाता है। स्थानीय पुलिस के हाथ से ताकत छीन ली गई है।  

साफ है कि गृहमंत्री के तौर पर पिछले कार्यकाल में राजनाथ सिंह की तमाम यात्राएं, कश्मीर पर मध्यस्थ की नियुक्ति और मोदी का इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत का जाप सिर्फ भाषणबाजी और ढकोसला था। क्योंकि पहली बार बड़ी संख्या में भीतरी इलाकों में आर्टिलरी हथियारों की तैनाती की गई है। ताकि स्थानीय लोगों को डराकर अपनी मर्जी के अधीन किया जा सके। कुछ गांवों और शहरी इलाकों में प्रदर्शन के बाद सुरक्षाबलों द्वारा स्थनीय लोगों की पिटाई और संपत्ति को नुकसान की खबरें भी सामने आई हैं।  

असहमत कश्मीरियों को दबाने के लिए ताकत के इस अंधे और दंभ भरे इस्तेमाल से साफ है कि बीजेपी सरकार की कश्मीर में शांति लाने में रुचि नहीं है। भारत में नफरत, कट्टरपंथ और उदासीनता के माहौल में किसी को भी कश्मीरियों की जिंदगी के बारे में चिंता नहीं है। संघ परिवार दुर्भावना से भरा अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इस नाजुक वक्त का पूरा इस्तेमाल कर रहा है। संघ की नफ़रत पर आधारित राजनीति, जो यह शेष भारत में बेहूदगी से इस्तेमाल करता है, वह अब कश्मीर पहुंच चुकी है। इससे विध्वंस की आग पैदा हुई है।

इसी आग को जलाए रखने के लिए अनुच्छेद 370 को हटाया गया है, जबकि साफ था कि इससे ज्यादा नुकसान होगा। इसके बावजूद संघ परिवार ने राजनीतिक पूंजी बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। इसमें संघ की कारपोरेट मालिकों वाले मीडिया के एक बड़े हिस्से ने बहुत मदद की।

गुज़रते सालों में जैसे-जैसे लोग सद्भाव और सुलह की राजनीति की अहमियत समझ रहे थे, उनका भरोसा अब उठ चुका है। पिछले दो महीनों में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र का उत्कृष्ट विचार तार-तार हो चुका है। यही वो चीजें थीं, जो भारत कश्मीरियों को देने का दावा करता था। चिंता इस बात की है कि अब एक कट्टरपंथी मिलिटेंट की एक नई नस्ल सामने आ सकती है। आशा करनी चाहिए कि ऐसा न हो, पर लगता है भारत इस बात फिक्र नहीं करता कि चीजें अब कहां जा रही हैं।

इस बात को जरूरी तौर पर समझ लेना चाहिए कि संघ परिवार पंथनिरपेक्षता और संवैधानिक गणराज्य के विचारों को नहीं मानता। यही दो विचार कश्मीर और भारत को जोड़ते हैं।  आरएसएस का पुरातन विचार रहा है कि देश का एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य उनके सपनों का हिंदू राष्ट्र बनाने में सबसे बड़ा रोढ़ा है।

तर्कों के लिए ही सही, भारत लंबे वक्त तक मानता रहा कि पंथनिरपेक्षता को जिंदा रखने के लिए कश्मीर का भारत में होना जरूरी है। जवाहर लाल नेहरू ने 1953 में पहली बार कहा था, 'हमने हमेशा कश्मीर समस्या को सांकेतिक माना है, जबकि भारत पर इसके लंबे प्रभाव पड़ेंगे। कश्मीर इस बात को साबित करता है कि हम एक पंथनिरपेक्ष राज्य हैं। कश्मीर से भारत और पाकिस्तान दोनों में प्रभाव पड़ता है, क्योंकि अगर हम द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर कश्मीर को अलग कर देते हैं, तो भारत और पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे लाखों लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। बहुत से भर चुके जख्म दोबारा हरे हो जाएंगे।'

जब संघ अपने सांप्रदायिक, फासिस्ट और पंथनिरपेक्ष विरोधी विचारधारा की कसम खाता है, तो कश्मीर की पंथनिरपेक्ष धारा उन्हें कैसे रास आ सकती है। शेख अब्दुल्ला ने भारत की पंथनिरपेक्षता और संवैधानिकता में कश्मीर का विलय किया था, न कि संघ और इसकी नफरत भरी विचारधारा में। अपने जीते जी वो कभी उनसे सुलह नहीं कर पाए और हमेशा उनकी विचारधारा को नकारते रहे। कश्मीर और भारत के रिश्तों को वापस पटरी पर उतारने के लिए जरूरी है कि राज्य में लोकतंत्र लागू किया जाए और पूरी स्वायत्ता के साथ राज्य का दर्जा बहाल किया जाए।  

(बशारत शमीम, जम्मू-कश्मीर के एक ब्लॉगर और लेखक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।) 

अंग्रेजी में लिखा मूल लेख आप नीचे लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं। 

Art 370: Valley Rejects BJP-Sangh ‘Integration’

Kashmir civil curfew
kashmir history
Sangh and Kashmir
Ideology and hatred

Related Stories

अनुच्छेद 35A की विडम्बनापूर्ण मौत कश्मीरी पंडितों और भारत को सताएगी

कश्मीर समस्या की जड़ें कहाँ हैं?


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License