NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कोरोना की दूसरी लहर के बीच देश में शुरू होना चाहिये न्यूनतम बुनियादी आय कार्यक्रम
भारत कोरोना की दूसरी लहर से पैदा होने वाले आर्थिक झटके और मानवीय वेदना से निपटने की तैयारी कर रहा है।
नित्या चक्रवर्ती
14 Apr 2021
कोरोना

आज भारत कोरोना की दूसरी लहर से पैदा होने वाले आर्थिक झटके और मानवीय वेदना से निपटने की तैयारी कर रहा है, इसके मद्देनज़र नित्या चक्रबर्ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सार्वभौमिक न्यूनतम बुनियादी आय कार्यक्रम की वकालत कर रही हैं।

—

पूरे भारत में कोरोना की दूसरी लहर जारी है। कई राज्यों में इस लहर ने लोगों के जीवन को थाम दिया है। रात में कर्फ्यू लगाए जा रहे हैं। वहीं कुछ हिस्सों में आंशिक, तो कहीं पूर्ण लॉकडाउन लगाया जा रहा है। अगर मौजूदा लहर लंबी चलती है, तो लंबे वक़्त के लिए लॉकडाउन लगाए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। औद्योगिक शहरों में रहने वाले प्रवासी मज़दूर डरे हुए हैं, इनमें से कुछ ने अपने गृह राज्यों की ओर जाना भी शुरू कर दिया है। वहीं दूसरे लोग भी मान रहे हैं कि अगर यही हालात बने रहते हैं, तो वे भी अपने गृह राज्य लौट जाएंगे। 

देश एक अभूतपूर्व स्थिति का सामना कर रहा है, जहां समाज के सबसे वंचित तबके को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। 2020 में जब लॉकडाउन लगा था, तब गरीब़ और श्रमशक्ति के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ा था। अब जब यह लोग हालिया महीनों में अर्थव्यवस्था में आ रही तेजी के साथ अपने भविष्य के बेहतर होने की उम्मीद लगा रहे थे, तो अचानक एक बार फिर उनके सामने लॉकडाउन और दूसरे प्रतिबंधों से आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। 

अनुमानों के मुताबिक़ मौजूदा लहर मई के अंत तक ही ढलान पर जाएगी। इसका मतलब हुआ कि बड़ी उम्मीदों के विपरीत, 2021-22 का वित्तवर्ष भी भारत के लिए बहुत अच्छे बदलाव लाने वाला नहीं होगा। इस साल बमुश्किल इतना हो सकता है कि किसी तरह अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन नुकसान से बचाए रखकर थोड़ा-बहुत सुचारू रखा जा सकता है।

2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था की तबाही

भारत सरकार ने पिछले साल जिस आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी, उसका लॉकडाउन से बेरोज़गार हुए लोगों और गरीब़ों पर कुछ गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा।

सभी मौजूदा अध्ययनों में बताया गया है कि महामारी वाले वर्ष में भारत और दुनिया में सिर्फ़ बड़े कॉरपोरेट खिलाड़ियों ने ही मुनाफ़ा कमाया है। जबकि दूसरी तरफ हज़ारों लोग गरीब़ी के दलदल में फंसने के लिए मजबूर हो गए। 

भारत में आर्थिक असमानता हालिया सालों में वैसे ही बहुत तेजी से बढ़ रही है, महामारी आने के बाद तो इस चौड़ी होती खाई में पंख ही लग गए। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि भारत में गरीब़ों की संख्या में पिछले साल 7.5 करोड़ का इज़ाफा हुआ। क्योंकि आय और रोज़गार के नुकसान का सबसे ज़्यादा भार आब़ादी के निचले आर्थिक तबके में आने वाले लोगों को उठाना पड़ा है, जो ज़्यादातर असंगठित क्षेत्र में काम करते थे। रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में मध्यमवर्ग में भी सिकुड़न आई है।

"सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इक्नॉमी" की रिपोर्ट बताती है कि भारत में महामारी के चलते बचत में वृद्धि हुई है, लेकिन उपभोक्ताओं की मांग थम चुकी है। क्योंकि ज़्यादातर आबादी के पास अधिशेष आय नहीं है; जिन लोगों के पास अधिशेष है, तो वे भी जरूरी चीजों के अलावा बाकी पर खर्च करने में सावधानी रख रहे हैं। अमीर लोग भी अपने ख़र्च में बहुत चयनित हो गए हैं, लेकिन उनकी मांग भी बहुत सीमित ही है। अकेले इस वर्ग के ख़र्च से अर्थव्यवस्था को जरूरी तेजी नहीं मिलेगी।  

भारत में सार्वभौमिक आय कार्यक्रम 

फिर इस अभूतपूर्व दौर में सबसे बेहतर कदम क्या हो सकता है? सभी दिग्गज अर्थशास्त्री अब भारत में वंचित और संकटग्रस्त सामाजिक-आर्थिक वर्ग के लिए "सार्वभौमिक न्यूनतम बुनियादी आय" की बात कर रहे हैं। केवल इसी तरीके से एक बड़े वर्ग के जीवन स्तर में सुधार लाया जा सकता है और अर्थव्यस्था में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मांग बढ़ाई जा सकती है।

उदाहरण के लिए अमेरिका में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है, जहां जीवन स्तर बेहद ऊंचा है। वहां भी राष्ट्रपति बाइडेन ने राहत पैकेज इस तरीके से गठित किया है, जिससे कामग़ार वर्ग को मदद देने वाले कदमों के साथ-साथ ज़्यादातर अमेरिकियों को अतिरिक्त आय की गारंटी दी जा सके।

हमारे यहां प्रधानमंत्री का नागरिकों को भाषण दिखावा ज़्यादा था, उसमें ठोस चीजों की कमी थी। पिछले साल उन्होंने बड़े-बड़े दावे और महत्वाकांक्षी वायदे करते हुए अपनी सरकार के राहत पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन दूरदर्शी नज़रिए से देखें तो यह साफ़ है कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था में तेजी और शहरी या ग्रामीण इलाकों के लोगों के जीवन में सुधार करने में नाकामयाब रही है।

केंद्र सरकार ने अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी और रघुराम राजन जैसे दिग्गज अर्थशास्त्रियों द्वारा दिए गए सभी अच्छे सुझावों को मानने से इंकार कर दिया। इसके बजाए बड़े बैंकों से कर्ज़ लेने की नीति अपनाई, जबकि इस वास्तविकता को ध्यान में नहीं रखा गया कि कोई भी, यहां तक कि जिनके पास नगद तरलता उपलब्ध है, वे भी फिलहाल ख़र्च करने के मूड़ में नहीं हैं। बड़ी संख्या में गरीबों और बेरोज़गारों को खर्च के लिए प्रेरित किया जा सकता था, जिससे खपत बढ़ती, बशर्ते इन लोगों को सीधे नगद उपलब्ध कराया गया होता। ऐसा सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) के ज़रिए संभव है। 

महामारी आने के पहले से ही देश की अर्थव्यवस्था खुद के द्वारा निर्मित आर्थिक मंदी की वज़ह से मुश्किल में चल रही थी। उस आर्थिक मंदी के लिए कई कारक ज़िम्मेदार थे, जिनमें नोटबंदी, हड़बड़ी में जीएसटी को लागू किया जाना और वैश्विक व्यापार की दिक्कतें शामिल थीं। महामारी के आने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दोहरा हमला हुआ, जिसे आज के नाजुक दौर में घरेलू ख़पत बढ़ाने के लिए बड़े प्रोत्साहन की जरूरत है।

यह प्रोत्साहन ग्रामीण और शहरी गरीब़ वर्ग को पैसा दिए बिना संभव नहीं है, इनमें वो लोग भी शामिल हैं, जिनकी आजीविका पिछले 14 महीनों में लॉकडाउन के चलते ख़त्म हो गई है, खासकर भारत के संकटग्रस्त, लेकिन बेहद बड़े अनौपचारिक क्षेत्र के लोग।

पश्चिम में UBI के विचार पर गहन विमर्श शुरू हो चुका है। खासकर अमेरिका में इस विचार को बहुत लोकप्रियता मिल रही है, जहां आय में असमानता के मुद्दे का दोनों ही पार्टियों के लोकप्रिय नेताओं ने समाधान करने की कोशिश की है। यहां तक कि कई अमेरिकी अरबपतियों ने भी UBI की वकालत की है। यह वकालत जरूरी तौर पर समग्र समाधान के तौर पर नहीं है। बल्कि आय की असमानता और गरीब़ी से पैदा हुई गंभीर स्थिति में कुछ हद तक दर्द निवारक का काम करने के लिए भी UBI की वकालत की जा रही है।

2019 के लोकसभा चुनावों के मेनिफेस्टो में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 6000 रुपये महीने की न्यूनतम आय की मदद का वायदा किया था। पिछले साल INC ने 21 विपक्षी दलों के साथ मांग रखी कि केंद्र सरकार आयकर दायरे से बाहर आने वाले परिवारों को 6 महीने तक 7,500 रुपये प्रतिमाह की मदद करे। आज कोई भी इस राशि पर तर्क-वितर्क कर सकता है, लेकिन हर तार्किक व्यक्ति देख सकता है कि लोगों की जिंदगियां बचाने के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए UBI की जरूरत है। 

प्रधानमंत्री मोदी अब अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकते हैं, इसके लिए उन्हें गंभीरता से न्यूनतम बुनियादी आय की नीति अपनानी होगी, जिससे गरीब़ो को मदद दी जा सके और अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाई जा सके। दुनिया की अलग-अलग सरकारों द्वारा कोविड से प्रभावित अर्थव्यवस्था में जनता की मदद करने के लिए उठाए गए कदमों से मोदी सरकार को सीख लेनी चाहिए। 

अगर हम भारत को एक मज़बूत राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें ऐसे जन-हितैषी तरीके अपनाने होंगे।

यह लेख मूलत: द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

COVID-19
Migrant workers
COVID Pandemic
Lockdown
indian economy
Narendra modi
universal basic income

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • veto
    एपी/भाषा
    रूस ने हमले रोकने की मांग करने वाले संरा के प्रस्ताव पर वीटो किया
    26 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में एक मत पड़ा। चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात मतदान से दूर रहे।
  • Gujarat
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
    26 Feb 2022
    छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
  • Leander Paes and Rhea Pillai
    सोनिया यादव
    लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?
    26 Feb 2022
    लिव-इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा को मान्यता देने वाला ये फ़ैसला अपने आप में उन तमाम पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद है, जो समाज में अपने रिश्ते के अस्तित्व तो लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: किस तरफ होगा पूर्वांचल में जनादेश ?
    26 Feb 2022
    इस ख़ास बातचीत में परंजॉय गुहा ठाकुरता और शिव कुमार बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में पूर्वांचाल की. आखिर किस तरफ है जनता का रुख? किसको मिलेगी बहुमत? क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पायेगी? जवाब ढूंढ रहे हैं…
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता
    26 Feb 2022
    ड्रग्स, अफस्पा, पहचान और पानी का संकट। नतीजतन, 5 साल की डबल इंजन सरकार को अब फिर से ‘फ्री स्कूटी’ का ही भरोसा रह गया है। अब जनता को तय करना है कि उसे ‘फ्री स्कूटी’ चाहिए या पीने का पानी?    
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License