NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
असम : चाय बागानों के आदिवासियों की दर्दगाथा सुना गया बिरसा मुंडा शहीद मेला!
असम के तिनसुकिया ज़िले के राजगढ़ स्थित लकड़ीबाम चायबागान में पिछले कई वर्षों से इंकलाबी नौजवान सभा और स्थानीय आदिवासी युवा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर 9 और 10 जून को शहीद मेला का आयोजन कर रहे हैं।
अनिल अंशुमन
23 Jun 2019
बिरसा मुंडा शहीद मेला

पिछले दिनों धरती आबा कहे जानेवाले झारखंड के प्रतीक, नायक बिरसा मुंडा की मूर्ति उनके ही अपने राज्य की राजधानी में तोड़ने वालों के खिलाफ अबतक कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी है। बिरसा मुंडा की उसी मूर्ति पर फूलों की माला चढ़ाने वाली माननीय राज्यपाल, मुख्यमंत्री और सरकार की तमाशाई भूमिका दिखला रही है कि उनके लिए बिरसा मुंडा का कितना महत्व है। जबकि सिर्फ झारखंड ही नहीं देश के कई इलाकों के अनगिनत आदिवासी–मूलवासियों और लोकतंत्र पसंद लोगों के लिए बिरसा मुंडा आज भी जीवंत प्रेरणा बने हुए हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सुदूर असम के चाय बागान इलाके में आयोजित हुए ‘बिरसा मुंडा शहीद मेला’ में शामिल होकर साक्षात देखने को मिला।

RYA4.jpg

असम के तिनसुकिया ज़िले के राजगढ़ स्थित लकड़ीबाम चायबागान में पिछले कई वर्षों से इंकलाबी नौजवान सभा और स्थानीय आदिवासी युवा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर 9 और 10 जून को शहीद मेला का आयोजन कर रहे हैं। जो एक प्रकार से चाय बागान क्षेत्र के आदिवासी सांस्कृतिक मेले का ही स्वरूप लिए होता है। इस अवसर पर जनसभा का आयोजन कर चाय बागान की दुर्दशापूर्ण स्थितियों, मालिकों के रवैये तथा चाय श्रमिकों की ज्वलंत समस्याओं के साथ साथ राज–समाज की जटिल स्थितियों पर भी चिंतन–विमर्श होता है। सांस्कृतिक सत्र में होने वाले आदिवासी झूमर नृत्य–गीत प्रतियोगिता में चाय बागानों में बसे झारखंड–ओडिशा मूल के श्रमिक आदिवासियों के अलावा अन्य समुदायों की श्रमिक बस्तियों के सांस्कृतिक जत्थे भी शामिल होते हैं। देर रात तक चलने वाले इस मेले में युवाओं की भागीदारी देखते बनती है। मुंडा–संथाल–उरांव, ताँती, महली व कर्मकार इत्यादि आदिवासी समाज समेत सभी समुदायों के युवा बिरसा मुंडा को अपना सर्वमान्य प्रतीक नायक मानते हैं।

RYA2.jpg

इस बार 9 जून को कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत बिरसा मुंडा की शहीद वेदी पर माल्यार्पण–श्रद्धांजलि देने के पश्चात ‘उलगुलान परिक्रमा’  निकाल कर की गयी। सबसे बुजुर्ग चाय श्रमिक महिला मागदली मुंडा द्वारा पौधारोपण कर किया गया। इस अवसर पर आयोजित जनसभा के मुख्य अतिथि थे जेएनयू छात्रसंघ के वर्तमान अध्यक्ष एन. साईं बालाजी, जिन्होंने अपने जोशपूर्ण सम्बोधन में वर्तमान सरकार की आदिवासी–दलित–वंचित समुदाय विरोधी नीतियों की चर्चा करते हुए कहा कि तथाकथित शिक्षा सुधार के नाम पर आदिवासी–गरीबों को बेहतर शिक्षा के साथ साथ आरक्षण के अधिकार से भी पूरी तरह वंचित करने की साजिश की जा रही है। महाराष्ट्र में डॉ. पायल की सांस्थानिक हत्या प्रकरण का ज़िक्र कर आदिवासी-दलित व अन्य वंचित समुदाय के पढ़े लिखे छात्र-युवाओं के साथ होनेवाले सत्ता संरक्षित भेदभाव के खिलाफ साहसपूर्ण मुक़ाबले का आह्वान किया। विशिष्ट वक्ता के तौर पर झारखंड जसम से आमंत्रित इन पंक्तियों के लेखक (अनिल अंशुमन) ने यहाँ बसे आदिवासियों को अबतक एसटी का दर्जा नहीं दिये जाने और ज़मीन का स्थायी पट्टा नहीं दिये जाने का सवाल उठाया।

दूसरे दिन के सांस्कृतिक सत्र का उदघाटन करते हुए झारखंड से ही बुलाये गए मुंडा सांस्कृतिक संगठन ‘सेंगेल’ के सामाजिक संस्कृतिकर्मी गौतम मुंडा ने बिरसा उलगुलान की जानकारी देते हुए आदिवासी समाज से बौद्धिक–वैचारिक सक्रियता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। चाय बागान के श्रमिक आदिवासियों के सवालों पर सक्रिय रहने वाले तथा आयोजन के मुख्य संयोजक सीपीआई एमएल केंद्रीय कमेटी सदस्य युवा नेता बलिन्द्र सैकिया ने बिरसा मुंडा से प्रेरणा लेकर अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य के सपने देखने की अपील की। कई स्थानीय वक्ताओं ने वर्तमान सरकार की नीतियों को दिनों दिन रुग्ण हो रहे चाय बागानों को पूरी तरह से नष्ट करने वाला बताया। साथ ही केंद्र व राज्य में चल रही ‘डबल इंजन’ की सरकार द्वारा अभी तक न्यूनतम मजदूरी नहीं दिये जाने का मुद्दा भी उठाया।

RYA1_0.jpg

दो दिवसीय सांस्कृतिक मेले में प्रस्तुत लगभग सारे आदिवासी गीत – नृत्य बिरसा मुंडा पर ही केन्द्रित रहे। बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित नाटक भी प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा बच्चों की चित्र, कविता पाठ एवं क्विज़ प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ। तीरंदाज़ी की प्रतियोगिता को सबने बड़े ही चाव से देखा। कार्यक्रम के अंतिम दिन प्रतिभागी सांस्कृतिक दलों व कलाकारों को पुरस्कृत किया गया।

इसी आयोजन के क्रम में एक बड़ी विडम्बना यह देखने को मिली कि चाय बागानों के आदिवासी युवाओं में से कोई भी न तो अपनी आदिवासी मातृभाषा जानता है और न ही अपने पुरखों के मूल स्थान के बारे में। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके पिता भी बचपन से ही सादरी भाषा सुनते और बोलते आए हैं। इस कारण वे भी इसी को अपनी मातृभाषा मानते हैं। उनकी मातृभाषा बताने वाले पुरानी पीढ़ी के अधिकांश लोग अब जीवित ही नहीं हैं। ऐसे में ‘सादरी’ भाषा ही इस इलाके में उनके आदिवसीयत की पहचान बनी गयी है। शिक्षा के संदर्भ में सबने ही बताया कि बेहद गरीबी और महज चंद सरकारी स्कूल होने तथा वहाँ की लचर पढ़ाई के कारण लगभग सारे युवा नौवीं–दसवीं के बाद ही पढ़ाई छोड़ मजदूरी करने में लग जाते हैं। बरसों बरस से यहाँ का निवासी होने के बावजूद आदिवासी का दर्जा नहीं मिलना उन्हें सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित कर रखा है। इस मुद्दे को उठाने वाले अधिकांश आदिवासी व अन्य राजनीतिक दल और नेतागण सिर्फ अपने राजनीतिक लाभ की दुकानें ही चला रहें हैं।

इन तमाम विपरीत स्थितियों के बीच भी बिरसा मुंडा शहीद मेला के आयोजन समिति के उत्साही सभी युवा सदस्यों का कहना है कि - चाय बागान के आदिवासी युवाओं के साथ साथ वर्तमान पीढ़ी के सभी लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर वैचारिक तौर पर सक्षम सक्रिय बनाना ही उनके आयोजन का मक़सद है। जिसके माध्यम से वे यहाँ के सभी आदिवासी किशोर व युवाओं में आदिवसीयत की विशिष्ट संस्कृति–परंपरा को जानने – समझने की रुचि और क्षमता बढ़ाना चाहते हैं । मेले कि बढ़ती लोकप्रियता बता रही है कि चाय बागानों के आदिवासी परिवार और युवा अपने पुरखों की अज्ञानता की जड़ जमायी सीमा और पिछड़ेपन से बाहर निकालना चाहते हैं।

birsa munda
Assam
​​​​tea garden
tribal communities
Tea plantation worker
बिरसा मुंडा शहीद मेला

Related Stories

मध्यप्रदेश : आदिवासियों को मिलेगी साहूकार के क़र्ज़ से मुक्ति

लोस में उठी चाय अधिनियम और चाय बागान श्रमिक अधिनियम में संशोधन की मांग

असम: चाय बागान श्रमिकों की अंतहीन दर्दगाथा

गलत पहचान: 'विदेशी' महिला मानकर हिरासत शिविर में रखी गई बुजुर्ग महिला तीन साल बाद रिहा

ललित मुर्मू : व्यापक दृष्टि के देशज व्यक्तित्व का असमय जाना


बाकी खबरें

  • itihas ke panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?
    22 May 2022
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने पत्रकार और मेरठ दंगो को करीब से देख चुके कुर्बान अली से बात की | 35 साल पहले उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास हुए बर्बर मलियाना-…
  • Modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक
    22 May 2022
    हर बार की तरह इस हफ़्ते भी, इस सप्ताह की ज़रूरी ख़बरों को लेकर आए हैं लेखक अनिल जैन..
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'कल शब मौसम की पहली बारिश थी...'
    22 May 2022
    बदलते मौसम को उर्दू शायरी में कई तरीक़ों से ढाला गया है, ये मौसम कभी दोस्त है तो कभी दुश्मन। बदलते मौसम के बीच पढ़िये परवीन शाकिर की एक नज़्म और इदरीस बाबर की एक ग़ज़ल।
  • diwakar
    अनिल अंशुमन
    बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका
    22 May 2022
    बिहार के चर्चित क्रन्तिकारी किसान आन्दोलन की धरती कही जानेवाली भोजपुर की धरती से जुड़े आरा के युवा जन संस्कृतिकर्मी व आला दर्जे के प्रयोगधर्मी चित्रकार राकेश कुमार दिवाकर को एक जीवंत मिसाल माना जा…
  • उपेंद्र स्वामी
    ऑस्ट्रेलिया: नौ साल बाद लिबरल पार्टी सत्ता से बेदख़ल, लेबर नेता अल्बानीज होंगे नए प्रधानमंत्री
    22 May 2022
    ऑस्ट्रेलिया में नतीजों के गहरे निहितार्थ हैं। यह भी कि क्या अब पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन बन गए हैं चुनावी मुद्दे!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License