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अविवेक के इस माहौल में गणराज्य, योजना और विज्ञान को याद करना
संविधान और गणतंत्र दिवस जिसे हम मनाते हैं, उसे आरएसएस और उसके विभिन्न संगठनों ने कभी स्वीकार नहीं किया। हालांकि, उन्होंने आज यह तय किया है कि इसे आज की स्थिति में धीरे-धीरे बेअसर करना बेहतर होगा।
प्रबीर पुरकायस्थ
25 Jan 2019
Translated by महेश कुमार
RASTRPATI BHAVAN

26 जनवरी, 1950 को भारत उस वक्त एक गणतंत्र राज्य बन गया था, जब संविधान सभा द्वारा बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा संचालित संविधान लागू हुआ था। यह वह संविधान है जो इस बात की गारंटी देता है कि आपके  किसी भी नस्ल, धर्म या जाति से सम्बंधित होने के बावजूद सभी वर्गों के लोगों को पूरे अधिकार प्राप्त होंगे, जिसमें एक बेहतर जीवन स्तर जीने का अधिकार भी शामिल है। यह लोकतंत्र और एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की वह दृष्टि है जो आज पूरी तरह से ख़तरे में है।

यह सप्ताह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है। बोस, जिन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में, 1938 में योजना समिति की स्थापना की थी, जिसकी अध्यक्षता नेहरू द्वारा की गई थी। वह उतना ही विश्वास करते थी, जितना कि नेहरू, एक योजना के निकाय में विश्वास करते थे जो स्वतंत्र भारत की सरकार का मार्गदर्शन करेगा। उन्होंने अक्टूबर क्रांति के बाद योजनाबद्ध विकास के मामले में सोवियत प्रयोगों से प्रेरणा प्राप्त की थी। स्वतंत्रता के बाद, योजना आयोग ने योजना समिति के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया और अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई असहनीय गरीबी और असमानता के दोहरे बोझ को दूर करने के लिए, अर्थव्यवस्था की योजना बनाने की आवश्यकता थी, राज्य को अर्थव्यवस्था और विज्ञान में एक प्रमुख भूमिका निभानी थी और प्रौद्योगिकी भारत के विकास की मुख्य कुंजी थी।

बीजेपी का खेल जिसमें वह अंबेडकर बनाम नेहरू या बोस बनाम नेहरू के खेल खेलती, और इस खेल के जरिये भाजपा चाहेगी कि हम भूल जाएं कि ये नेता किस मक़सद के लिए खड़े थे। उनके लिए राजनीति केवल व्यक्तित्व के बारे में है, जैसे उनके लिए इतिहास केवल मिथकों के बारे में है। हां, ये जरूर है कि इन नेताओं के बीच  रणनीति के बारे में, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के बारे में और संघर्षों के समय के संबंध में आपसी मतभेद थे। इसलिए कि वे मजबूत विचारों वाले नेता थे और उन्हें व्यक्त करने से वे डरते नहीं थे; या असहमत होने पर अलग-अलग रास्ते भी अपना लेते थे। लेकिन जिसे उन्होंने एकजुट होकर किया, वह एक ऐसे भारत का एक बड़ा दृष्टिकोण था, जिसमें विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता थी, और इस विकास को समतावादी होना था। उनके लिए, भारत को न केवल राजनीतिक, बल्कि आर्थिक लोकतंत्र की भी आवश्यकता थी। अंबेडकर ने, 1948 में संविधान सभा को दिए अपने संबोधन में इसे स्पष्ट किया था :

"राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में हम एक आदमी के एक वोट और एक वोट के एक मूल्य के सिद्धांत को अपनाएंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में, हम अपने सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण, हम एक आदमी एक मूल्य के सिद्धांत को नकारते रहेंगे। कब तक हम विरोधाभासों के इस जीवन को जीना जारी रखेंगे?"

यह लोकतंत्र की वह दृष्टि है जिसने जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को अंबेडकर के साथ मिलाया था। उनकी दृष्टि में, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए योजना बनाना और उसका निर्माण करना एक संपूर्ण आवश्यकता थी, इसका मक़सद न केवल भारत के औद्योगिक और कृषि का उत्थान था, बल्कि देश के  सभी लोगों के लिए विकास के लाभों को फिर से वितरित करना था। यह तभी संभव है जब भारत घनघोर गरीबी, असमान जीवन जीने की स्थिति और अशिक्षा से मुक्त होगा, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन छोड़ कर गया है।

भाजपा हमें राष्ट्रीय आंदोलन और उसके नेताओं के दृष्टिकोण को भुलाना चहती है। बोस और नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन में संघ के भाग लेने से इनकार करने, योजनाबद्ध विकास  का विरोध और एक मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र का विरोध करने के लिए संघ को आड़े हाथों लिया था। भाजपा द्वारा नेहरू पर हमला करने के लिए अन्य नेताओं की प्रशंसा करना केवल एक रणनीति है, बल्कि उसका असली मक़सद तो राष्ट्रीय आंदोलन के मूल मूल्यों को अस्वीकार करना है। इसीलिए वे योजना आयोग, सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त कर और मेक इन इंडिया में विदेशी पूंजी को आमंत्रित कर; या ट्रम्प की भाषा का इस्तेमाल कर, वे डसॉल्ट और अंबानी के जरिये भारत को फिर से महान बनाएंगे ऐसी उनकी योजना है।

आम लोगों की नजरों में, नेहरू को जल-विद्युत परियोजनाओं के निर्माता के रूप में पहचाना जाता है, जिसे भारत ने स्वतंत्रता के बाद लागू किया था। जबकि नेहरू ने बहुउद्देश्यीय सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं का पूरा समर्थन किया था, लोग भूल जाते हैं कि बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं का खाका - सिंचाई और बिजली उत्पादन के संयोजन के साथ-साथ एक एकीकृत राष्ट्रीय ग्रिड को अम्बेडकर द्वारा विकसित किया गया था। उन्होंने ऐसा पहले वायसराय के मंत्रिमंडल में श्रम, सिंचाई और बिजली प्रभारी सदस्य की हैसियत से 1942-46 में किया था, और बाद में कानून मंत्री की हैसियत से उन्होंने विद्युत अधिनियम, 1948 का मसौदा तैयार किया और उसे पेश किया था। उनके लिए, बिजली उत्पादन और एक राष्ट्रीय ग्रिड विकसित करना औद्योगीकरण का आधार था, और उनके विचार में "... औद्योगिकीकरण का मतलब था लोगों को गरीबी के उस अनन्त चक्र से बचाना जिसमें वे जकड़े हुए थे।"

संविधान और गणतंत्र दिवस जिसे हम मनाते हैं, उसे आरएसएस और उसके विभिन्न संगठनों ने कभी स्वीकार नहीं किया। हालांकि, उन्होंने आज यह तय किया है कि इसे आज की स्थिति में धीरे-धीरे बेअसर करना बेहतर होगा, सच्चाई यह है कि उन्होंने कभी भी इसके मूल सिद्धांतों के खिलाफ अपने विरोध को कभी छिपाया नहीं है। आरएसएस और जनसंघ ने मनु और मनुस्मृति का गुणगान करते हुए अंबेडकर को एक लिलिपुट कहा था। ऑर्गनाइज़र जो कि आरएसएस का मुखपत्र है ने ऐसा 30 नवंबर, 1949 के अंक में लिखा था :

"भारत के नए संविधान के बारे में सबसे बुरी बात यह है कि इसके बारे में भारतीय कुछ भी नहीं है। संविधान के निर्माताओं ने इसे ब्रिटिश, अमेरिकी, कनाडाई, स्विस और विविध अन्य तत्वों के सार के समावेश से तैयार किया है ... लेकिन हमारे संविधान में, प्राचीन भारत में अद्वितीय संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु का कानून स्पार्टा के लाइकुरस या फारस के सोलन से बहुत पहले लिखा गया था। आज तक मनुस्मृति में वर्णित उनके कानून दुनिया भर में प्रशंसा पाते हैं और यह कानून लोगों की सहज आज्ञाकारिता और अनुरूपता का परिचय पाते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों की नजरों में  इसका मतलब कुछ भी नहीं है। "

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भारतीय संविधान के अन्य विकास की अवधारणा, शिक्षा और रोजगार के मामले में सकारात्मक कार्रवाई या आरक्षण का विरोध, आरएसएस द्वारा हमेशा किया जाता रहा है। आज भी, आरएसएस के नेता आरक्षण के खिलाफ खुलकर बोलते हैं, और बताते हैं कि यह अलगाववाद को कैसे बढ़ावा देता है और इसे क्यों खत्म किया जाना चाहिए।

इन स्तंभों में, हमने तर्क और विज्ञान पर हमले के बारे में कई बार लिखा है, और मिथकों को विज्ञान और इतिहास के रूप में पागलपन के स्तर तक प्रचारित करने के संबन्ध में भी; जैसे कि उनके अनुसार महाभारत के वक्त उड़ान रथों के जरिये विभिन्न ग्रहों पर यात्रा की जाती थी और अनुवांशिकी विकास सत्य या असत्य है जो दशावतार के बहुत बेहतर सिद्धांत से परिलक्षित होता है। हम बीजेपी/आरएसएस की सरासर मूर्खता पर लगातार बातें कर सकते हैं। लेकिन यह उन खतरों और नुकसान को कम करके आंकना होगा जो वे लोगों पर कर रहे हैं। यह एक छोटी सी मिसाल है कि वे कैसे सोचते हैं और किस विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके मुख्य उद्देश्य धार्मिक पहचान पर आधारित एक राष्ट्रवादी भारत है। यही कारण है कि वे तर्क और इतिहास को ध्वस्त करना चाहते है; एक ऐसा भारत, जिसमें अल्पसंख्यकों को बहुत कम अधिकार होंगे; एक ऐसा भारत जहां पुराने और नए दोनों तर्कों को मिथकों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ेगा; जहां योग्यता का अर्थ होगा धन और जाति।

अल्पसंख्यकों और कुछ विशेष जातियों और समुदायों के खिलाफ हमला महज एक दिखावा नहीं है। मौलिक बात यह है कि आरएसएस, भाजपा और उसके विभिन्न मोर्चे इसके बारे में कैसे सोचते हैं। ये हमले उस समय हो रहे हैं जब भारत फिर से उतना ही असमान हो गया है जितना कि अंग्रेजों के अधीन था, या फ्रांसीसी अर्थशास्त्री पिकेट्टी ने इसके बारे जो कहा है कि: ब्रिटिश राज से लेकर बिलियनेयर राज; जहां नौ परिवार आज सभी भारतीयों के समान आधे से अधिक संपत्ति रखते हैं। ये हमले आज हमारे संविधान में निहित बुनियादी मूल्यों पर हैं जिनमें आर्थिक लोकतंत्र भी शामिल है। यही कारण है कि हमें लड़ना है, यह एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए हमारी लड़ाई है जिसे हमने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लड़ा था।

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