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अयोध्या विवाद : साल 1949 से 1990 तक
इस दौरान की कहानी कई मोड़ लेती है लेकिन सरकार से लेकर न्यायपालिका सभी हिन्दू आस्थाओं की तरफ झुके हुए दिखते हैं। मुस्लिम पक्ष पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।
अजय कुमार
30 Oct 2019
ayodhya
the economic times

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे पर मुकदमों को लेकर साल 1949 तक का इतिहास यह रहा कि इस मुद्दे पर छह बार अदालत में बहस हो चुकी थी। इन सारी बहसों में कुछ में हिन्दू-मुस्लिम और कुछ बहसों में सुन्नी और शिया मुस्लिम की तरफ से बहस हुई। अदालत की बहस के केंद्र में यह था कि विवादित स्थान पर मंदिर था या मस्जिद। और अदालतों ने फैसला सुनाते समय जजों ने आस्था को अलग रखा था। कहने का मतलब यह है कि जजों ने इसे एक ज़मीन के विवाद के तौर पर जांचा परखा। आस्था को इस पर तवज्जो नहीं दी। अब शुरू करते हैं साल 1949 से आगे की कहानी। जिस साल चबूतरे से मूर्तियां हटकर मस्जिद के गुम्बद के अंदर चली गयी।

आगे बढ़ने से पहले एक बात समझ लेते हैं। क़ानूनी मसलों के जानकर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि यह एक सिविल मामला था, सिविल मामले में रेस जेयूडीकेटा का सिद्धांत काम करता है। यानी अगर एक बार किसी कोर्ट ने किसी मामले को निपटा दिया। तो वह मामला बार-बार नहीं उठाया जा सकता है। पहली बार इस मसले पर फैसला दिसंबर 1885 में आ चुका था। फैसला यह था कि सभी पक्षकार 'स्टेटस को' यानी यथास्थिति बनाये रखें। यानी मस्जिद में नमाज़ हो और चबूतरे पर राम की पूजा हो। उसके बाद साल 1886 में इस पर दायर की गयी अपील को कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था।

इसे पढ़ें :राम मंदिर विवाद - शुरू से लेकर साल 1949 तक

आगे की कहानी

गाँधी जी की हत्या के अपराध में हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कुछ समय के लिए प्रतिबन्ध लगा था। साल 1949 में इस प्रतिबन्ध को हटा लिया गया। आज़ादी के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीति में गोविन्द वल्लभ पंत और समाजवादी नेता नरेंद्र देव आमने सामने थे। जानकारों का कहना है कि गोविन्द वल्ल्भ पंत को हारने का डर लग रहा था। इसलिए गोविन्द वल्लभ पंत ने राजनीति में धार्मिक आस्था का इस्तेमाल किया और इसका केंद्र बना अयोध्या का विवादित ढांचा। इसमें गोविन्द वल्लभ पंत की तरफ से हिन्दू महासभा ने भूमिका निभाई। या कह लीजिये कि हिन्दू महासभा को फिर से प्रासंगिक होने का मौका गोविन्द वल्लभ पंत ने दे दिया।

वलय सिंह की एशियन ऐज में 'हाउ ए मॉस्क बिकम टेम्पल' नाम से छपी रिपोर्ट कहती है कि हिन्दू महासभा ने 24 नवंबर 1949 राम चबूतरे पर मूर्तियों का पूजा पाठ किया। इनका भरोसा था कि गुम्बद के नीचे राम का जन्म हुआ था, इसलिए पूजा-पाठ के बाद मूर्तियाँ अपने आप ही चबूतरे से गुम्बद के अंदर चली जाएंगी लेकिन लागातर सात दिनों की पूजा-पाठ के बाद भी ऐसा नहीं हुआ।

ऐसा न होने पर मस्जिद के ताले तोड़े गए। 22 - 23 दिसम्बर की रात में मस्जिद के अंदर राम और सीता की मूर्तियां रखी गयी। हिन्दू महासभा के लोगों की तरफ से यह कार्रवाई की गयी। फैज़ाबाद थाने में दर्ज की गयी एफआईआर से यह पता चलता है कि इसमें कौन लोग शामिल हैं। एक कॉन्स्टेबल ने अभिराम दास, राम शुक्ल दास, सुदर्शन दास और 60-70 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। इस पूरी घटना पर 'अयोध्या द डार्क नाइट' नाम से धीरेन्द्र कुमार झा की किताब भी छपी है। यह किताब बताती है कि इस पूरी कार्रवाई में अयोध्या के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के.के नायर की भी बहुत बड़ी भूमिका थी। के. के नायर ने मूर्तियों को मस्जिद में रखवाने में खुलकर सहयोग किया था। इस किताब में लिखा है कि ''डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के.के. नायर, महंत अभिराम दास से कहते है कि महाराज अभी मत जाइये, माइक पर सभी से कहिये कि नारे लगाएं कि रामलल्ला भूखे हैं।'' यानी जो कुछ भी हुआ, वह हिन्दू महासभा के सदस्यों की तरफ से हुआ और इसमें प्रशासन ने के.के नायर को खुलकर सहयोग दिया।

इसके बाद राज्य सरकार ने इस कदम की छानबीन की। नायर साहेब ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए यह कहा कि मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखना एक गलत कदम था। लेकिन यह सब हिन्दू समुदाय के समर्थन से हुआ है। हिन्दू समुदाय की तरफ से नारे लगाया जा रहा था कि नायर तुम अन्याय मत करो, रामलला का फाटक खोल दो। इसलिए अगर मूर्तियों को मस्जिद से हटाया गया तो अनर्थ हो जाएगा।

यही नायर साहेब आगे जाकर जनसंघ के टिकट पर लोकसभा के सदस्य बनते हैं। नायर साहेब की भी हरकत ठीक वैसी ही है जैसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मध्यस्थता की कमिटी के श्री श्री रविशंकर की थी, जिन्होंने कहा था कि अगर राम मंदिर नहीं बनता है तो हिंदुस्तान सीरिया में बदल जाएगा।

29 दिसंबर 1949 को मजिस्ट्रेट मार्कंडेय सिंह ने इस ज़मीन को अपने कब्जे में ले लिया और ज़मीन को म्युनिसिपल बोर्ड के हवाले कर दिया।

कानूनी मसलों के जानकार प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा अपने यू-ट्यूब चैनल पर कहते हैं कि पुलिस रिपोर्ट पर जब किसी संपति की वजह से शांति में खलल पड़ती है तो मजिस्ट्रेट संपति अपने कब्जे में ले लेता है। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात है कि जिस कानून के तहत ऐसी संपतिया कब्जे में ली जाती हैं, उसी कानून में यह भी लिखा है कि वैसी विवादित संपति पर दो महीने पहले जिसका स्वामित्व था और जिसे बलपूर्वक हटाया गया था उस फिर से वह संपति लौटा दी जाए। दुखद बात यह है कि इस पर न मजिस्ट्रेट और न ही हाई कोर्ट ने ध्यान दिया।

3 मार्च 1951 को सिविल जज फ़ैज़ाबाद ने कहा कि जिस दिन ज़मीन के मालिकाना हक़ के लिए मामला दर्ज हुआ है, उस दिन हिन्दू वहां पर पूजा कर रहे हैं और मुसलमानों को कोई खास परेशानी नहीं हो रही है। वह दूसरे मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ लें। यह सोचने वाली बात यह है कि जिस अयोध्या के बारे में कहा जाता है कि 'कण कण में राम बसते हैं',  जहां हर गली में मंदिर हैं वहां पर न्यायालय हिन्दुओं की बजाए मुस्लिमों को कह रहा है कि वह दूसरी जगह जाकर नमाज पढ़ लें। इसके बाद हाई कोर्ट में अपील की जाती है। हाई कोर्ट, लोअर कोर्ट के पास यह कहकर सारे रिकॉर्ड वापस लौटा देता है कि इस मामले में ग़लत फैसला आया है। इस पर फिर से सुनवाई हो। लेकिन तब तक पूजा होती रही। इस तरह से मस्जिद में मूर्ति रख दी गई। पूजा पाठ होने लगा और इस केस से निकलने वाली बात-चीत के सहारे यह मुद्दा स्थानीय से पूरे देश भर का बनने की तरफ बढ़ चला।

इस दौरान की कहानी का निचोड़ बताया जाए तो इतना है कि  सरकार से लेकर न्यायपालिका सभी हिन्दू आस्थाओं की तरफ झुके हुए थे। मुस्लिम पक्ष पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।

1950 में महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया। साल 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया। अचरज की बात है साल 1949 में मस्जिद में मूर्तियां रख देने के बाद मुस्लिमों की तरफ से यह पहला केस होता है। वह भी वक्फ बोर्ड की तरफ से। वक्फ बोर्ड क़ानूनी तौर पर सरकार की संस्था होती है जो मुस्लिम समुदाय से जुडी सार्वजनिक सम्पतियों के देख रेख के लिए काम करती है। इसका अध्यक्ष भी सरकार का अधिकारी होता है। कहने का मतलब यह है कि मुस्लिमों की तरफ से आजादी के बाद इस बारे में अभी तक कोई विशेष पहल नहीं होती है।

80 का दशक : वीएचपी का प्रवेश

साल 1984 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अनुषांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने बाबरी मस्जिद का ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू कर दिया। एक कमेटी का गठन किया गया। इसी दौरान बजंरग दल की स्थापना भी हुई। इसकी स्थापना भी राम मंदिर बनाने के मकसद से ही की गयी थी। विश्व हिन्दू परिषद ने घोषणा की कि अगर छह मार्च 1986 तक मस्जिद के ताले नहीं तोड़े जाते हैं तो वह कानून को नहीं मानेगी। कानून को तोड़कर अपने मकसद के लिए काम करेगी।

1 फरवरी 1986 को फैज़ाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। जबकि असलियत यह थी कि साल 1949 से मस्जिद के अंदर पूजा-पाठ होते आ रहा था। इसका सीधा मकसद था कि इस अभियान को मंदिर बनाने के अभियान में बदल दिया जाए। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

इस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। 9 नवंबर 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी। जानकरों का कहना है कि राजीव गाँधी सरकार को हिन्दू धड़े का अच्छा ख़ासा समर्थन हासिल था। सिख दंगों में भी राजीव गांधी सरकार को हिन्दू धड़े ने समर्थन दिया था। इसलिए राजीव गाँधी सरकार ने हिन्दू धड़े के दबाव में आकर नहीं बल्कि हिन्दू तुष्टिकरण और वोट के लालच में आकर ऐसा किया। इसके बाद इस पर भाजपा की जमकर राजनीति शुरू होती है। इस एक मुद्दे को लेकर भाजपा पूरे देश को हिन्दू मुस्लिम में बाँट देती है। और भारतीय समाज और राजनीति में एक ऐसी दरार डाल दी जिसे पता नहीं कब पाटा जा सकेगा .


आगे की कहानी अगली कड़ी

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hindu mhsabha role in ayodhya dispute
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