NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
समाज
भारत
राजनीति
अयोध्या केस : क्यों हर बार हिंदुओं के पक्ष में गया फ़ैसला?
मंदिर बनाने या बाबरी मस्जिद गिराने के आरोप से सभी आरोपियों को बरी करना ही ऐसे फ़ैसले नहीं जो तर्क और तथ्य से ऊपर जाकर बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं और आस्था को पुष्ट और तुष्ट करते हैं, बल्कि आज़ादी के बाद से हर बार बाबरी मस्जिद से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले हिंदुओं के पक्ष में गए हैं।
अजय कुमार
07 Oct 2020
hin

सामूहिक स्मृतियां के सामने तर्कों का तीखापन बेअसर हो जाता है। सामूहिक स्मृतियां यह बना दी गईं   थी कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। मंदिर वहीं बनाएंगे जहां बाबरी मस्जिद है। लेकिन तर्क साफ और सीधा था कि एक मस्जिद सदियों से वहां खड़ी थी, जहां पर भगवान राम के जन्म का दावा किया जा रहा था। न्याय का तराजू किस ओर  झुकना चाहिए? फैसला किसके पक्ष में होना चाहिए?

यह तभी पता नहीं चलता जब बात न्यायालय तक पहुंचती। इसे सब जान रहे थे। अब भी सब जानते हैं। लेकिन बात वही है कि सामूहिक स्मृतियां इस तरह से गढ़ दी गई थी कि तर्कों की सच्चाई ने कोई असर नहीं किया।

आम लोग तो बहुत दूर की बात हैं। बुनियादी तर्कों से चलने वाले लोकतंत्र के सैद्धांतिक ढांचे में विडंबना यह रही है कि सुप्रीम कोर्ट तक ने सामूहिक स्मृतियों के सामने तर्कों की सच्चाई को नहीं स्वीकार किया।

 पहले बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद मामले का फैसला यह आया कि वहां मंदिर बनेगा। और सुप्रीम कोर्ट ने साफ स्वीकार किया की आस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगाना बहुत मुश्किल है। लेकिन एक बात भी कही की बाबरी मस्जिद गिराना आपराधिक कृत्य था। तो बहुत सारे तार्किक और सजग लोगों के मन में एक भाव बैठा हुआ था कि अगर अपराध करने वाले लोगों को सजा मिल जाए तब भी यह मान लिया जाएगा कि कई तरह की बाध्यकारी सीमाओं के बावजूद बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे मामले में न्याय हुआ। 

 लेकिन अंत में यह सब केवल ख्याली पुलाव साबित हुआ।  सीबीआई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराने वाले सभी आरोपियों को बरी कर दिया। किसी को सजा नहीं हुई। उल्टे यह कहा कि इन लोगों ने मस्जिद गिराई नहीं बल्कि मस्जिद गिराने वालों को रोकने की कोशिश की थी। मस्जिद कुछ अवांछित तत्वों ने मिलकर गिराई थी। जबकि सच्चाई जगजाहिर है। टीवी से लेकर वीडियो तक, डाक्यूमेंट्स लेकर अखबार के पन्ने तक सच्चाई मौजूद है और हमेशा मौजूद भी रहेगी। फिर भी कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जो आरोपियों को सजा दिलवा सके।

 कानूनी जानकार फैजान मुस्तफा इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं कि यह बात सही है कि षड्यंत्र के आरोपियों पर अपराध सिद्ध करना मुश्किल होता है। लेकिन यह बात बाबरी मस्जिद के लिए सही नहीं बैठती। ऐसे तमाम सबूत हैं जो यह बताते हैं कि आरोपियों ने आपस में एग्रीमेंट कर बाबरी मस्जिद गिराने का प्लान बनाया था। रथयात्रा की अगुवाई लालकृष्ण आडवाणी पूरे देश भर में कर रहे थे, इसकी वजह से बनने वाले अनलॉफुल असेंबली यानी गैर कानूनी सभाएं आखिर कर क्या थी? भारतीय दंड सहिता के तहत आपराधिक षड्यंत्र के लिए केवल यह साबित हो जाए कि कोई एग्रीमेंट हुआ था और अनलॉफुल असेंबली के लिए केवल यह साबित हो जाए की असेंबली यानी सभा में उपस्थिति थी, तब भी यह अपराध साबित करने के लिए ठोस सबूत होता है। और कोर्ट में दाखिल तमाम सबूत यह साबित कर रहे थे की बाबरी मस्जिद को पूरे षडयंत्र के साथ गिराया गया है। लेकिन सीबीआई कोर्ट ने सबको बरी कर दिया।

 लेकिन बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के साथ केवल एक यही फैसला नहीं है जिसमें तथ्यों, तर्कों पूरी तरह से दरकिनार कर केवल आस्थाओं  के आधार पर फैसला दिया गया हो, जो किस देश में बहुसंख्यक लोगों से जुड़ी हुई हैं। हर बार बाबरी मस्जिद से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले हिंदुओं के पक्ष में गए हैं।

 1. 23 दिसंबर साल 1949 की रात को कुछ स्थानीय हिंदू मस्जिद में घुसे। मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति को प्रतिस्थापित कर दिया। पुलिस की प्राथमिकी यानी एफआईआर में मस्जिद को एक कार्यकारी मस्जिद की तरह दर्ज किया गया। कार्यकारी मस्जिद यानी फंक्शनल मस्जिद कहने का मतलब यह कि जहां पर मस्जिद के स्वाभाविक काम जैसे की नमाज पढ़ना होता आ रहा है। लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने मस्जिद का चार्ज अपने हाथों में ले लिया। मस्जिद में स्थापित मूर्ति को बाहर नहीं निकाला। और यह घोषित कर दिया की मस्जिद की जगह कानूनी तौर पर एक डिस्प्यूटेड साइट यानी विवादित जगह है।

 दिलचस्प बात यह हुई कि मुस्लिमों द्वारा नमाज के पाठ करने की मांग को स्थानीय प्रशासन ने ठुकरा दिया लेकिन एक हिंदू पुजारी को मंदिर के अंदर रखा गया जिसे भगवान को भोग लगाने का काम सौंपा गया।

 2. न्यूज़क्लिक के साथ एक इंटरव्यू में प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं कि साल 1986 से पहले बाबरी मस्जिद ढांचा विवाद केवल लोकल हिंदू मुस्लिमों से जुड़ा विषय था। साल 1984 में जब विश्व हिंदू परिषद ने इसे खोजा उसके बाद यह इस्लाम और हिंदुत्व के बीच सभ्यता गत विवाद की तरफ मुड़ गया। समझिए एक तरह के सिविलाइजेशनल कनफ्लिक्ट की तरह मुड़ गया। साल 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने पहली बार उत्तर प्रदेश में रथयात्रा की शुरुआत की। यहीं से यह बाबरी मस्जिद ढांचा विवाद राम जन्मभूमि आंदोलन के नाम में तब्दील हो गया।

 25 जनवरी  साल 1986 में एक स्थानीय वकील उमेश पांडे ने फैजाबाद के मुंसिफ कोर्ट में मस्जिद के अंदर बिना रोक टोक पूजा पाठ करने की इजाजत के लिए गुहार लगाई। मुंसिफ कोर्ट ने इस गुहार को खारिज कर दिया। इसके बाद वकील उमेश पांडे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपील करने चले गए। जब उमेश पांडे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपील करने चले गए तो मुस्लिमों के तरफ से भी तरफ से भी कुछ लोगों ने मस्जिद की पुरानी वाली स्थिति बहाल करने के लिए डिस्ट्रक्ट कोर्ट में याचिका दायर की। आसान भाषा में यह समझिए कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दो याचिकाएं दायर हुई। पहली यह कि बिना रोक टोक हिंदुओं को पूजा पाठ की इजाजत मिल जाए और दूसरी यह की मस्जिद है मस्जिद में पहले नमाज होती थी। मस्जिद के स्टेटस को यानी स्वाभाविक स्थिति को बहाल कर दिया जाए। 1 फरवरी साल 1986 में मुस्लिमों की याचिका डिस्ट्रिक्ट जज ने खारिज कर दी और हिंदुओं की याचिका स्वीकार कर ली। डिस्ट्रिक्ट जज ने फैसला देते हुए कहा कि पिछले 35 साल से यहां पूजा-पाठ होते आ रहा है अगर गेट खोल दिया जाता है तो आसमान नहीं फट जाएगा। इस आदेश को मानने के बाद 2 फरवरी साल 1986 में हिंदुओं द्वारा बिना रोक-टोक पूजा पाठ करने के लिए गेट खोल दिया जाता है।

 3. साल 1986 से लेकर 1992 तक बाबरी मस्जिद हिंदू मुस्लिम विवाद का केंद्र बनकर उभरा। इस एक मस्जिद के सहारे जमकर बंटवारा हुआ। तकरीबन पूरा हिंदू मानस एक मंदिर को लेकर गोलबंद हो गया। उस बहुसंख्यकवाद विमर्श की शुरुआत हो गई जिसमें यह खुलकर कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान में मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं है।

6 दिसंबर साल 1992 को भाजपा आरएसएस विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने ऐलान किया कि वह कार सेवा करेंगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने एफिडेविट पर लिख कर दिया कि  वह मस्जिद गिरने नहीं देगी। लेकिन बाबरी मस्जिद भाजपा आरएसएस विश्व हिंदू परिषद जैसे तमाम हिंदुत्व वादी संगठनों की अगुवाई में गिरा दी गई। ठीक मस्जिद के केंद्र में भगवान राम की मूर्ति हटाकर नई मूर्ति स्थापित कर दी गई।

7 दिसंबर 1992 की सुबह एक तरफ कई तरह के पक्षकार आपस में वाद विवाद कर रहे थे तो दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद के पक्षकारों ने हाईकोर्ट में अस्थाई मंदिर बनाने की याचिका दायर कर दी। सोचिए यह सब मस्जिद गिरने के ठीक एक दिन बाद शुरू हुआ और एक महीने बाद 1 जनवरी साल 1993 में हाईकोर्ट ने इजाजत दे दी कि अस्थाई मंदिर बने। बिना रोक-टोक वहां कोई भी आकर पूजा पाठ कर सकता है।

 4. इसके बाद आया साल 2019. सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद मामले में ऐसा फैसला सुनाया गया जो तमाम विरोधाभासों से भरा था। बहुत लोगों ने इसे फ़ैसला माना, इसांफ़ नहीं। जानकारों ने कहा कि श्री राम पर ऐसा फैसला सुनाया गया जिसकी मनाही श्री राम के सहारे सिखाया जाने वाला जीवन मूल्य करता है। श्री राम अपनी राजधर्म की वजह से आज तक पूजनीय हैं। भले कुछ भी हो लेकिन जिस तरह का फैसला आया है वह फैसला श्रीराम का राजधर्म तो नहीं देता।

 सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस के 1045 पेज के जजमेंट में पैराग्राफ 795 से लेकर 798 तक के फैसले का सार लिखा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान किसी भी धर्म के विश्वास और आस्थाओं के साथ भेदभाव नहीं करता है। दिक्कत आने पर जज संविधान की व्याख्या करते हैं। लेकिन सबसे ऊपर नागरिक होते हैं जो इन से जुड़े होते हैं, जिनके जीवन का धर्म अभिन्न हिस्सा होता है।

 यहां पर अंतिम लाइन से आप काफी कुछ समझ सकते हैं।

 इस मामले में कोर्ट को ज़मीन के मालिकाना हक़ का फैसला करना था। कोर्ट जमीन के मालिकाना हक का फैसला दस्तावेजों तथ्यों के आधार पर करता है, आस्थाओं के आधार पर नहीं। यानी सुप्रीम कोर्ट अपनी दूसरी ही बात में अपनी पहली बात को काट रहा है। जहां वह कह रहा है कि धर्म नागरिकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है और नागरिक सबसे ऊपर हैं।

 इसके साथ सुप्रीम कोर्ट खुद स्वीकारता है कि एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे की नीचे कुछ मलबा मिले हैं, यह मलबे हिंदू मंदिर की संरचना जैसे लगते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं यह राम मंदिर था और इसे हमलावरों ने तोड़ दिया था। 

 यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ऐसा तथ्य निकल कर सामने नहीं आता है जो यह कहे कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई राम मंदिर था। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में साफ साफ कहता है कि साल 1949 में मंदिर के अंदर मूर्तियों का रखना गैरकानूनी था और बाबरी मस्जिद को ढहाना भी आपराधिक कृत्य था। यह सब कहने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंदिर बनाने के पक्ष की तरफ जाता है।

 आसान शब्दों में ऐसे समझिए कि सुप्रीम कोर्ट के पूरे फैसले के तर्क इस बात के पक्ष में हैं कि मंदिर बनाने के हक में फैसला नहीं जाना चाहिए लेकिन अंतिम फैसला ऐसा है की मंदिर बनाने का रास्ता साफ हो जाता है।

 इन सारे फैसलों से क्या साबित होता है? इसका जवाब यह है कि इन सारे फैसलों में तर्क चाहे कुछ भी हो लेकिन हर बार फैसला हिंदू पक्ष के हक में हुआ। सच्चाई यह थी कि विवाद जमीन, जमीन पर बनी इमारत और जमीन के अधिकार से जुड़ा था। केंद्र और हकीकत में बाबरी मस्जिद और बाबरी मस्जिद का ढहा हुआ ढांचा या इमारत थी। लेकिन इसे सबसे अधिक राम जन्मभूमि आंदोलन के नाम से जाना गया। साल 1986 के बाद से बनने वाली हिंदुस्तान की बहुसंख्यक स्मृतियां यह समझ कर बड़ी हुईं कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था। लेकिन जहां जन्म हुआ था वहां एक मस्जिद है। और दुर्भाग्य ऐसा है कि हिंदुओं के देश में भगवान राम के जन्म स्थान पर दूसरे धर्म का कब्जा है। यह लोग प्रचलन की सबसे गहरी स्मृति बन चुकी थी। इसका जुड़ाव भगवान राम की आस्था से था। सारे तर्क जायज होते हुए भी बेअसर कर दिए गए। और केवल एक ही बार नहीं बल्कि हर बार भले ही किसी की भी सरकार हो बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ा किसी भी तरह का फैसला हिंदुओं के पक्ष में गया। शायद यही वजह है कि लालकृष्ण आडवाणी जैसा नेता जिन्होंने कभी यह कहा था की बाबरी मस्जिद का गिरना उनके जीवन के सबसे उदास दिनों में से एक है। वही लालकृष्ण आडवाणी जब आरोप से बरी हुए तो उन्होंने खुलकर कहा कि वह बहुत अधिक खुश हैं।

Ayodhya Case
babri masjid dispute
each order in ayodhya case
ayodhya case after independence
crimanility in ayodhya case

Related Stories

अयोध्या विवाद के 'हल' होने के बाद, संघ परिवार का रुख़ काशी और मथुरा की तरफ़

तिरछी नज़र :  दो अपराध मिल कर बनता है एक ऐतिहासिक पुरस्कार!


बाकी खबरें

  • private
    अजय कुमार
    विश्लेषण: नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन या भाजपा के दानकर्ताओं के लिए पैसा कमाने का ज़रिया
    25 Aug 2021
    सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है। भारत जैसे गरीब मुल्क में सरकार की तरफ से इस्तेमाल होने वाला यह सबसे ज्यादा जनविरोधी वाक्य है। बिजनेस करने के तौर-तरीकों की वजह से मुट्ठी भर लोग ही आगे बढ़ रहे हैं,…
  • pharma
    रिचा चिंतन
    बड़ी फार्मा कंपनियों का असली चेहरा: अधिकतम आय, न्यूनतम ज़वाबदेही
    25 Aug 2021
    महामारी ने एक बार फिर पूंजीवाद का असली चेहरा सबके सामने ला दिया है, जहां मुनाफ़ा ही मुख्य प्रेरक होता है और बढ़ती असमानता की कोई फिक्र नहीं की जाती।
  • सार्वजानिक उपक्रम निजी हाथों में: मोदी सरकार की स्कीम का फायदा सिर्फ "मित्रों" को?
    न्यूज़क्लिक टीम
    सार्वजानिक उपक्रम निजी हाथों में: मोदी सरकार की स्कीम का फायदा सिर्फ "मित्रों" को?
    25 Aug 2021
    मोदी सरकार ने सार्वजनिक उपक्रम की इकाइयों को निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है और कहा है के इसके जरिये 6 लाख करोड़ की उगाही करेंगे। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार पर करारा हमला बोला है।…
  • सोनिया यादव
    यूपी: सिस्टम के हाथों लाचार, एक और पीड़िता की गई जान!
    25 Aug 2021
    सांसद अतुल राय मामले में पीड़िता और उसके साथी ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर पुलिस से लेकर जज तक कई बड़े लोगों पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि सभी की मिलीभगत से दोनों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे…
  • forest fire
    पीपल्स डिस्पैच
    अल्जीरिया की मोरक्को के साथ राजनयिक संबंध समाप्त करने की घोषणा
    25 Aug 2021
    पश्चिमी सहारा सहित इन दोनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक और हालिया मुद्दों पर बढ़ते तनाव और मतभेदों के बीच यह फैसला लिया गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License