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अर्थव्यवस्था
बावजूद औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के दावे के बेरोजगारी 7 प्रतिशत की दर से बड़ी
रिपोर्ट के मुताबिक़ औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में वृद्धि हुई है और बढ़ती जा रही है, लेकिन बड़े पैमाने पर बढ़ती बेरोजगारी इस बात को ठुकरा रही हैं।

सुबोध वर्मा
14 Mar 2018
Translated by महेश कुमार
employment

केंद्रीय सरकार द्वारा 13 मार्च को जारी औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) आंकड़ों के नवीनतम सूचकांक में कॉर्पोरेट और मुख्यधारा के मीडिया सर्किलों में बहुत उत्साह अपने को ही शाबाशी देने का वातावरण है। जनवरी 2018 में आईआईपी में जनवरी 2017 के मुकाबले 7.5 बढ़ोतरी दर्ज की गयी। सूचकांक एक मासिक उपाय है कि कितना औद्योगिक उत्पादन हो रहा है और समय के साथ यह कैसे बदल रहा है। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि औद्योगिक उत्पादन अंततः उठ रहा है।

हालांकि, यही आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्तीय वर्ष 2017-18 में, अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 तक आईआईपी में वृद्धि पिछले वित्तीय वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 4.1 प्रतिशत रही, जो कि अप्रैल 2016 से जनवरी 2017 तक का साइकिल है।

दूसरे शब्दों में, यह सब आप पर निर्भर करता है कि इसमें क्या ढूंढना चाहते हैं - डेटा समान है अपरिहार्य तथ्य यह है कि औद्योगिक विकास - किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी होती है- जो रोज़गार के मामले में कमजोर बनी हुई है, कुछ बिंदु ऊपर या नीचे, लेकिन कुछ भी ऐसा जिसे सकारात्मक रूप से लिखा जा सके।

क्यों जनवरी 2018 से जनवरी 2017 की साल-दर-वर्ष की तुलना इसमें क्यों एक बड़ी छलांग दिखती है? याद रखे, यह नोटबंदी है! जिसके जरिए  नवंबर और दिसंबर 2016 महीने में मोदी सरकार ने भारत में सबसे बड़ी आर्थिक आपदाओं में से एक को आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक और कृषि उत्पादन और रोजगार में गड़बड़ी पैदा कर दी थी। जनवरी 2017 के महीने में भी  अर्थव्यवस्था अभी भी इस हमले से जूझ रही थी। इसलिए, पिछले साल जनवरी के साथ इस वर्ष के जनवरी के आंकड़ों की तुलना केवल पिछले साल के निम्न स्तर को दर्शाती है और एक बड़ी वृद्धि को दिखाती है। बेहतर उपाय होगा कि जनवरी से अप्रैल की तुलना पिछले वर्ष की तुलना में जाए तो पायेंगे कि यह ऊपर दिखाए गए आंकड़ों के अनुसार अभी भी कमजोर वृद्धि है।

बेरोजगारी पर सीएमआईई के नवीनतम आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि 11 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में, बेरोजगारी की दर 7 प्रतिशत थी जबकि श्रम भागीदारी दर 42.6 प्रतिशत  थी। सीएमआईई द्वारा जारी फरवरी 2018 के लिए व्यापक आंकड़े कहते हैं कि 2.6 करोड़ लोग बेरोजगार थे, 1.1 करोड़ "मामूली बेरोजगार" थे और 40.7 करोड़ व्यक्ति कार्यरत थे। सीएमआईई ने "मामूली बेरोजगार" को परिभाषित किया है कि वे बेरोजगार हैं, काम करने को तैयार हैं, लेकिन सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में नहीं हैं।

सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक, देश में नियोजित व्यक्तियों की संख्या अभी भी स्तर के नीचे है। अक्टूबर 2016 में, 41.4 करोड़ लोग श्रम शक्ति में थे वे अभी भी काम फिर से शुरू करने के लिए वापस नहीं आए हैं।

अगर आप सोच रहे हैं कि बेरोजगारों की बड़ी समस्या के विवरण के लिए – जब मोदी ने हर वर्ष दो करोड़ नौकरियों का निर्माण करके इसको हल करने का वादा किया था – अगर इन बेरहम आंकड़ों के संदर्भ में देखे तो मोदी का नारा एक खिलवाड़ नज़र आता है, और कोई भी अच्छी खबर तलाश नहीं होती है।

हर साल, 2.4 करोड़ लोग श्रमिक बल में तकनीकी रूप से शामिल होते हैं- वे 14 वर्ष की आयु से अधिक होते हैं। लेकिन उनमें से सभी वास्तव में काम करना शुरू नहीं करते क्योंकि कुछ पढ़ रहे होते हैं, कुछ (मुख्यतः लड़कियों) घरेलू काम कर रहे होते हैं। इसी तरह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 43 प्रतिशत वास्तव में काम में भाग लेना चाहते हैं। यह अभी भी एक बड़ी संख्या है – जोकि लगभग 1 करोड़ है।

इस विशाल, और बढ़ती, नौकरी चाहने वालों की सेना के लिये, नौकरियों की वृद्धि समुद्र में कुछ बूँद के बराबर है फिर आप किसी भी तरह वृद्धि और बढ़ोतरी को गिन लें।

इसलिए, आईआईपी में वृद्धि, या ऐसे अन्य आंकड़े जो कि सरकार द्वारा पेश किये जा रहे हैं, समस्या को हल करने में मदद नहीं करते है लेकिन मोदी और उनकी सरकार इस बढ़ते संकट की अनदेखी कर रही है।

unemployment
नरेन्द्र मोदी
भारतीय अर्थव्यवस्था
बेरोज़गारी
औद्योगित उत्पादन

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