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बड़े प्राइवेट अस्पतालों ने 1,737% तक मुनाफ़ा कमायाः रिपोर्ट
नेशनल फार्मास्युटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी के अनुसार बड़े प्राइवेट अस्पतालों में दवाईयों, मेडिकल उपकरणों, दस्तानों, सिरिंज और जांच की बढ़ी हुई क़ीमत मरीज़ के बिल का आधा होता है।

न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
24 Feb 2018
hospital

दिल्ली-एनसीआर के चार प्राइवेट अस्पतालों ने दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और जांच समेत सर्जिकल मास्क, दस्ताने आदि पर 1,737% तक मुनाफ़ा कमाया। इसका खुलासा नेशनल फार्मास्युटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) के नए सर्वे में हुआ है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एनपीपीए ने इन अस्पतालों के बिल का विश्लेषण करने के बाद ये रिपोर्ट जारी किया है।वास्तव में, इन चीजों की बढ़ी हुई क़ीमत मरीज़ों के इलाज के बिल का लगभग 46% होता है।

ये सर्वे 20 फरवरी को जारी किया गया। बता दें कि पिछले कुछ दिनों में प्राइवेट अस्पतालों द्वारा इलाज के नाम पर मरीज़ों से लिए गए ज़रूरत से ज़्यादा पैसे की ख़बर सुर्खियों में थी। कई परिजनों ने निजी अस्पतालों पर ज़्यादा पैसे लेने का आरोप लगया था जिसके बाद ये अध्ययन सामने आया। ज्ञात हो कि 7 साल के आद्या सिंह के इलाज के लिए परिजनों का लाखों का बिल थमाया था। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल सितंबर महीने में डेंगू से पीड़ित आद्या को गुड़गांव के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट भर्ती कराया गया था। 15 दिनों के इलाज़ के बाद आद्या की मौत हो गई थी। अस्पताल ने इलाज़ के लिए आद्या के परिजन को 16 लाख रुपए का बिल दिया था, जिसमें 2,700 दस्ताने और 660 सीरिंज के शामिल थे।

हालांकि सर्वे के बाद जारी किए गए रिपोर्ट में चार प्राइवेट अस्पतालों के नाम नहीं बताए गए, लेकिन फोर्टिस अस्पताल का नाम इस अध्ययन में शामिल है।

एनपीपीए ने सर्वे में पाया है कि ज़्यादा फ़ायदा हासिल करने के लिए प्राइवेट अस्पताल "गैर-अनुसूचित ब्रांडेड दवाओं" को लिख रहे हैं। ये दवाईयां नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिंस (एनएलईएम) में सूचीबद्ध नहीं है। ऐसे मूल्य नियंत्रण की बात ही नहीं है। इसके बजाय ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) 2013 के तहतएनएलईएम में सूचीबद्ध दवाईयां मूल्य नियंत्रण के अधीन होते हैं। ज्ञात हो कि एनएलईएम में सभी आवश्यक दवाईयां सूचीबद्ध है।

इस अध्ययन के अनुसार "इलाज़ में इस्तेमाल की गई सूचीबद्ध दवाओं पर कुल लागत केवल 4.10% है, जबकि गैर सूचीबद्ध दवाइयों पर 25.67% है।"

एनपीपीए ने कहा कि वर्ष 2017 में गैर-एनएलईएम दवाओं की वृद्धि एनएलईएम दवाओं से दोगुनी थी, और "इस मुद्दे को नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से निपटाए जाने की ज़रूरत है।"

एनपीपीए के अध्ययन के निष्कर्षों पर 22 फरवरी को ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (एआईडीएएन) द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया गया। एआईडीएएन के सह-संयोजक डॉ मीरा शिवा ने कहा, "एनपीपीए का निष्कर्ष है कि गैर-सूचीबद्ध दवाईयां संयुक्त बिल लागत का 25% है जो शायद ही चौंकाने वाला है क्योंकि फार्मास्युटिकल बाजार का लगभग 90% मूल्य नियंत्रण के बाहर है। इस तरह अस्पताल अपने मुताबिक अधिक महंगी दवाइयां लिखने में सक्षम हैं। इस रिपोर्ट में एनपीपीए ने स्वीकार किया है कि मूल्य निर्धारण करने के लिए बाजार-आधारित सूत्र बड़े व्यापार लाभ के लिए रास्ता तैयार करते हैं।"

शिवा ने आगे कहा कि "डीपीसीओ 2013 का मुख्य दोष, दोषपूर्ण बाजार आधारित मूल्य निर्धारण तंत्र है जो मुनाफाखोरी और उच्च मूल्यों को वैधता देता है। एआईडीएएन ने डीपीसीओ के दायरे में सभी आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं को कवर करने और कंपनियों को उचित मुनाफा प्रदान करने वाली लागत आधारित मूल्य निर्धारण की एक विधि को पुनर्स्थापित करने के लिए लगातार समर्थन किया है।"

एनपीपीए के अध्ययन से यह भी उजागर हुआ है कि निजी अस्पतालों से थोक आपूर्ति का ऑर्डर प्राप्त करने के क्रम में दवाओं और उपकरणों के निर्माता को 'बाजार की आवश्यकताओं' के अनुसार ज़्यादा एमआरपी के प्रिंट के लिए 'मजबूर' किया जाता है।''

सर्वे के अनुसार "निजी अस्पतालों, जिनके ज्यादातर खुद की फार्मेसी है, द्वारा संस्थागत थोक खरीद से उन्हें बहुत अधिक मुनाफा कमाना आसान बना देता है और एमआरपी का उल्लंघन करने की आवश्यकता के बिना भी दवाओं और उपकरणों पर लाभ कमाना आसान बनाता है जो कि पहले से पर्याप्त रूप से बढ़ाए हुए हैं।

जैसा कि अध्ययन में कहा गया है वास्तव में बढ़ाए हुए एमआरपी के इन मामलों में मुनाफ़े के मुख्य लाभार्थी अस्पताल हैं न कि दवा और उपकरण निर्माता।

एनपीपीए के अनुसार ग़ैर-सूचीबद्ध दवाओं के अलावा, मेडिकल उपकरणों पर शुल्क कुल बिल का दसवां हिस्सा है और सूचीबद्ध (अनिवार्य) दवाओं पर ख़र्च का दो गुना से ज़्यादा है।

लेकिन इसमें कहा गया है कि ये मेडिकल सामग्रियां "एमआरपी की निगरानी या किसी भी प्रकार के मूल्य नियंत्रण के अधीन नहीं है क्योंकि ये ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत 'ड्रग्स' के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है। एनपीपीए एमआरपी की न तो निगरानी कर सकता है और न ही सार्वजनिक हित में असाधारण परिस्थितियों में इन डिस्पोजिबल्स को मूल्य नियंत्रण के अधीन ला सकता है।"

जांच में कुल लागत का 15% से अधिक का होता हैा

एनपीपीए के अनुसार "एनपीपीए द्वारा औचाक जांच में पाया गया है कि इस तरह के शुल्क अन्य निजी तौर पर संचालित निजी केंद्रों द्वारा किए जा रहे जांच की तुलना में निश्चित रूप से अधिक है।"

हालांकि फिर यह भी कहा कि "अस्पतालों द्वारा अन्य सभी शुल्कों सहित जांच सेवाएं एनपीपीए और केंद्र सरकार के दायरे से बाहर हैं और केवल राज्य विशिष्ट कानूनों के माध्यम से विनियमित किया जा सकता है। ऐसा केंद्रीय मॉडल क्लिनिकल एस्टैबलिशमेंट एक्ट 2010 और संबंधित नियमों का पालन कर या राज्य सरकारों के खुद के विशिष्ट कानूनों के जरिए जो प्रत्येक राज्यों में मौजूद हैं।”

इसके अलावा, सिरिंज, कैनुला और कैथेटर्स के मामले में इस्तेमाल किए जाने वाले गैर-अनुसूचित उपकरणों में लाभ की सीमा "हद से ज़्यादा पाई गई और स्पष्ट रूप से एक असफल बाजार प्रणाली में अनैतिक मुनाफाखोरी का एक बड़ा मामला" है।

एनपीपीए के अनुसार "दवाओं और उपकरणों और जांच पर कुल ख़र्च असल में अधिक (46%) है और "प्रक्रियाओं" (11.42%), कमरे का किराया (11.61%) आदि की तुलना में अस्पतालों द्वारा बताए गए 'पैकेज' (प्रत्यारोपण के मामले में) का हिस्सा नहीं है, जो कि अधिक स्पष्ट घटक हैं।

प्राधिकरण ने कहा कि मरीज़ों ने शिकायत की थी कि ख़र्च का प्रारंभिक अनुमान 3-4 गुना तक ज़्यादा पाई गई।

इसके अलावा दवाओं, उपकरणों और डिस्पोज़ेबलल्स अस्पतालों द्वारा अपने खुद के फार्मेसियों से इस्तेमाल किया जाता है और बेचा जाता है। इस अध्ययन में पाया गया कि मरीज़ों को इन चीजों को बाहर से ख़रीदने के लिए कोई विकल्प नहीं दिया जाता है जहां माना जाता है कि इन चीजों की क़ीमतें कम होती है।

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