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भारत
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बिहार: हाईस्कूल के परिणाम आने से पहले 42 हज़ार मूल्यांकित कॉपियाँ गायब
बिहार कभी जो अपने ज्ञान के लिए पहचाना जाता था, उस राज्य की शिक्षा व्यवस्था बद से बद्दतर होती जा रही है | अगर सरकारी आँकड़े देखें तो बिहार शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहा है I
मुकुंद झा
19 Jun 2018
nitish kumar

बिहार के हाईस्कूल के परिणाम कल आने की संभावना है, लेकिन इससे पहले एक ऐसी खबर आई जिसने शिक्षा विभाग की नींद उड़ा दी है| बिहार के गोपालगंज शहर में एसएस बालिका प्लस टू स्कूल से साल  2018 के 10वीं की लगभग 42 हज़ार जाँची हुई कॉपियाँ गायब हैं|

प्रभात खबर के अनुसार पूरे मामले का खुलासा एक रिपोर्ट से हुआ जो एसएस बालिका प्लस टू स्कूल की जाँच के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समीति को सौंपी गयीथी| बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने टेबलेटिंग के दौरान टॉपरों की कॉपियों की माँग की थी| जब कॉपियों को बिहार बोर्ड भेजा गया तो  सामाजिक विज्ञान की दो, हिंदी की दो, संस्कृत की दो, गणित की दो, विज्ञान की दो, अंग्रेजी की दो समेत कुल 12 कॉपियों के गायब होने की जानकारी बोर्ड से स्कूल के प्राचार्य प्रमोद कुमार श्रीवास्तव को फोन पर दी गयी| फिर आनन-फानन में प्राचार्य ने मूल्यांकन केंद्र को खुलवा कर जाँच शुरू की | स्कूल प्रबंधन मिनी ट्रक से कॉपियों के गायब किये जाने की आशंका जता रहा है| लगभग 42 हज़ार कॉपियाँ बिना दरवाज़ा खोले कैसे गायब हो गयीं, यह जाँच का विषय है|

माकपा के राज्य सचिव अवधेश सिंह ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि, “नीतीश राज में यह सब अब आम घटना हो गई है, शिक्षा के नाम पर पूरे बिहार में केवल शिक्षा माफिया हावी है| उन सभी को सरकार का पूरा समर्थन है”|

आगे उन्होंने कहा कि, “शिक्षा व्यवस्था के लिए केवल नीतीश सरकार है इनके राज में शिक्षा का पूरी तरह व्यापारीकरण हो रहा है| पैसा लेकर फर्ज़ी प्रमाण पत्र धड़ल्ले से शिक्षा माफिया सरकार के संरक्षण में बेच रहे हैं”|


बिहार कभी जो अपने ज्ञान के लिए पहचाना जाता था, उस राज्य की शिक्षा व्यवस्था बद से बद्दतर होती जा रही है | अगर सरकारी आँकड़े को देखे तो बिहार शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहा है| बिहार में किसी भी अन्य राज्य की तुलना में अधिक अशिक्षित लोग हैं| 2011 के अनुसार साक्षरता एक दशक में 14.8 प्रतिशत तक बढ़ी है, बिहार की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में भरी संकट है: यहाँ की कक्षाओं में छात्रों की संख्या देश के बाकि राज्यों के मुकाबले काफी ज़्यादा है और शिक्षक बहुत कमI

लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा कि बिहार के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम 2,00,000 से अधिक  पद खाली पड़े हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई के स्तर में गिरावट हुई है और निजी स्कूलों में सुधार हुआ | यह बिहार के लिए शुभ संकेत नहीं क्योंकि पूरे बिहार में 90% स्कूल सरकार द्वारा चलाये जाते हैं।

बिहार में पर्याप्त कक्षाएँ भी नहीं हैं| जहाँ देश में छात्र और क्लास रूम का अनुपात 27 है, वहीं बिहार में यह 51 है, जो देश में सबसे बुरा है|

बिहार में को ठेके पर शिक्षक रख छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार किया है। लेकिन इन शिक्षकों को स्थायी शिक्षकों की तुलना में बहुत ही कम वेतन मिलता है|

बिहार के एक शिक्षक ने बतया कि, “इनमें से अधिकतर भर्तीयाँ भी अपने आप में बहुत ही संदेहास्पद है क्योंकि केवल अनुभव प्रमाण-पत्र के आधार पर भर्ती की गई थी| ऐसे कई उदहारण है जहाँ लोगों ने घूँस देकर प्रमाण पत्र बनावाये और इस नौकरी प्राप्त की”|

दूसरी तरफ “जो अनुबंध पर शिक्षकों की भर्ती की गई है उन्हें 4,000 से 10,000 तक का मासिक वेतन मिलता है जो बहुत ही कम है| इसको लेकर कई बार न्यायालय ने भी टिप्पणी की लेकिन सरकार के कान पर जूँ तक नही रेंगी”|

बिहार की पूरी शिक्षा व्यवस्था भाजपा-नीतीश के राज में राम भरोसे ही चल रही है| छात्रों का कहना है कि बिहार में इस तरह की घटनाओं से उनके भविष्य से भी मज़ाक हो रहा है| क्योंकि वे अपनी मेहनत से पढ़ाई करते हैं लेकिन लोग फिर भी उन्हें शक की निगाह से देखते हैं| सरकार को लोगो में बिहार की शिक्षा

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Nitish Kumar

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