NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
घटना-दुर्घटना
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
बिहार ही नहीं पूरे देश में बीमार है स्वास्थ्य सेवा!
देश में बड़ी संख्या में मौत स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से हो रही है फिर भी ये सरकारों की प्राथमिकता में यह नहीं है?
मुकुंद झा
22 Jun 2019
बिहार ही नहीं पूरे देश में बीमार है स्वास्थ्य सेवा!

बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। यहां एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (चमकी बुखार) के चलते बच्चों की मौत के बढ़ते मामलों की रिपोर्ट पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने केंद्र और बिहार सरकार को नोटिस भेजकर जवाब माँगा।

लेकिन क्या सिर्फ बिहार में बच्चे ख़राब सुविधा के कारण मर रहे हैं? इसका जबाब है नहीं।

आज देश में सरकारी अस्पतालों ठीक से सुविधा न मिलने के कारण बिहार के अलावा अन्य राज्यों में भी लोग मर रहे हैं। यहाँ तक देश की राजधानी दिल्ली में भी कल, शुक्रवार को एक बच्ची की मौत आईसीयू में बेड न मिलने से हुई है। ये सब दिखाता है कि भारत की स्वास्थ्य सेवाएं खुद ICU में हैं? इतनी संख्या में मौत स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से हो रही है फिर भी ये सरकारों की प्राथमिकता में यह नहीं है?

मेडिकल जर्नल, द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में दावा किया गया है कि स्वास्थ्य सेवा की पहुंच न होने के कारण और स्वास्थ्य देखभाल की खराब गुणवत्ता के कारण मृत्यु बहुत अधिक हैं।

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज अध्ययन के अनुसार 2016 में भारत में 2.4 मिलियन (24 लाख) से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई, जिनका इलाज हो सकता था। 

अध्ययन में कहा गया है कि 24 लाख में लगभग 16 लाख लोग यानी 66%, स्वास्थ्य सेवाओं की खराब गुणवत्ता के कारण मर गए, जबकि 8,38,000 लोगों की मृत्यु स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग न करने के कारण हुई ।

मोदी सरकार के तमाम दावों और वादों के बाद भी देश की स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल नजर आती हैं। साल में प्रति व्यक्ति सिर्फ 1,112 रुपये के साथ भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है।

इस  रिपोर्ट ने भी इस बदहाली पर मुहर लगा दी है। इसमें कहा गया है कि भारत में 11,082 लोगों पर महज एक डॉक्टर है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में यहां जीडीपी का महज एक फीसदी खर्च किया जाता है, जो वैश्विक औसत 6% से बहुत कम है। यहां तक कि डब्ल्यूएचओ जीडीपी के कम से कम 5% सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च की सिफारिश करता है। भारत पड़ोसी देशों मालदीव, भूटान, श्रीलंका और नेपाल के मुकाबले भी कम खर्च करता है। देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हर साल प्रति व्यक्ति रोजाना औसतन महज़ तीन रुपये खर्च किए जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश में डॉक्टरों की भारी कमी है। फिलहाल प्रति 11,082 आबादी पर महज एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मानकों के मुताबिक यह अनुपात प्रति एक हजार (1:1000) होना चाहिए यानी कम से कम एक हज़ार व्यक्तियों पर एक डॉक्टर, परन्तु देश में यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11 गुना कम है। बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में तो स्थित और भयावह है। वहां प्रति 28,391 लोगों पर महज एक डॉक्टर है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ का हाल भी कुछ बेहतर नहीं है।

गोवा सबसे बेहतर, असम सबसे पिछड़ा है

64.8 अंकों के साथ गोवा और 63.9 अंकों के साथ केरल ने भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। अन्य शीर्ष राज्यों में दिल्ली (56.2) और हिमाचल प्रदेश (51.7) हैं। सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले छत्तीसगढ़ और झारखंड (34.7), बिहार (37), ओडिशा (36.3), उत्तर प्रदेश (34.9) और असम (34) हैं।

मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टर पंजीकृत थे। इनमें से सिर्फ 1.2 लाख डॉक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं। बीते साल सरकार ने संसद में बताया था कि निजी 8.18 लाख और सरकारी 1.2 लाख अस्पतालों में काम करने वाले लगभग 10 लाख डाक्टरों को ध्यान में रखें तो देश में डॉक्टर और मरीजों का अनुपात 1:1,612 हो सकता है। लेकिन यह तादाद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के मुकाबले कम ही है। इसका मतलब है कि तय मानक पर खरा उतरने के लिए देश को फिलहाल और पांच लाख डॉक्टरों की जरूरत है। लगातार बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए यह खाई हर साल तेजी से बढ़ रही है।

ऐसा नहीं केवल देश के पिछड़े ग्रामीण इलाकों के सरकारी अस्पतालों में ही डॉक्टरों की कमी है। देश में सबसे बेहतर समझे जाने वाले एम्स भी डॉक्टरों की भरी कमी से जूझ रहा है।  

एम्स में भी डाक्टरों की कमी

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री, अश्विनी कुमार चौबे के अनुसार, 1,042 की स्वीकृत पदों के मुकाबले 670 संकाय चिकित्सक (फैकल्टी डॉक्टर) वर्तमान में काम कर रहे हैं। मंत्री जी ने शुक्रवार 21 जून को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए यह जानकारी दी । 

मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के अनुसार, भोपाल, भुवनेश्वर, जोधपुर, पटना, रायपुर, ऋषिकेश, मंगलागिरी, नागपुर, कल्याणी, रायबरेली में नए एम्स में संकाय डॉक्टरों के लिए 2,395 स्वीकृत पदों में से केवल 1,031 पद ही भरे हैं,  जहाँ 1,364 के पद खाली हैं, यानी 56.95% पद खाली हैं। इन 9 एम्स में से छह चल रहे हैं- भोपाल, भुवनेश्वर, जोधपुर, पटना, रायपुर और ऋषिकेश।  इन एम्स भी में, 47.49% डॉक्टरों के पद खाली हैं। 

नौ एम्स में, सीनियर रेजिडेंट के लिए स्वीकृत 2,002 पदों में से 850 यानी 42.46% सीटें खाली रह गई हैं। जूनियर रेजिडेंट्स के लिए 1,814 स्वीकृत पदों में से 509, यानी 28.06% सीटें खाली हैं। छह चालू एम्स के में भी,  सीनियर रेजिडेंट्स और जूनियर रेजिडेंट्स के लिए रिक्त पदों का प्रतिशत क्रमशः 42.41% और 27.85% है।

स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने कहा कि एम्स दिल्ली में, कुल 90 सहायक प्रोफेसर, 2,270 सीनियर रेजिडेंट्स और 2617 जूनियर रेजिडेंट्स पिछले तीन वर्षों के दौरान नियुक्त किए गए हैं। छह अन्य एम्स में, 2018 में कुल 2,771 डॉक्टर नियुक्त किए गए थे।

एक तरफ देश में पर्याप्त सरकारी अस्पताल नहीं हैं, और जो हैं भी उनका खुद का स्वास्थ्य ख़राब है। सरकार द्वारा निवेश की कमी के कारण अधिकांश सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ठीक से काम नहीं करती हैं। निजी अस्पतालों में सेवाएं कुछ बेहतर भी हैं तो लेकिन वहां उसके लिए इतनी भारी राशि का भुगतान करना पड़ता है कि वो आम जनता के पहुँच से बाहर रहती है।

सरकार के खुद के आकड़े बताते की देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बेहद ही चिंताजनक स्थिति में है। अभी भी सरकारों को इस दिशा में सकारत्मक कार्रवाई करनी चाहिए। 5 जुलाई को केंद्र सरकार अपना बजट पेश करने जा रही है। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि इस बार सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट बढ़ाएगी।

muzaffarnagar deaths
children deaths
hospital tragedy
Bihar
Health facilities
chamki bukhar
India
health facilities in rural areas
doctors
bihar givernment
health policies
health care
health sector in India

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

रघुवंश बाबू का जाना राजनीति से एक प्रतीक के जाने की तरह है

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिजली गिरने की इतनी घटनाएं क्यों हो रही हैं?

उत्तर प्रदेश, बिहार में बिजली गिरने से दो दिन में 110 लोगों की मौत, 32 घायल

हादसा-दर-हादसा: अलग-अलग स्थानों पर 14 मज़दूरों समेत 15 की मौत, 30 घायल

आईटीबीपी के जवान ने गोलीबारी की, छह जवानों की मौत

गंगा के कटाव से विस्थापित होने की कगार पर हजारों परिवार

बिहार: बच्चों के लिए मिड डे मील बना रहे एनजीओ के प्लांट का बॉयलर फटा, 3 की मौत

शर्म : बिहार में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म, पंचायत ने पीड़िता का सिर मुंडवाकर गांव में घुमाया

सीसीडी के संस्थापक सिद्धार्थ का शव मिला, पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या का संदेह जताया


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License