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बिहार : राष्ट्रभक्ति का नया आदर्श हिटलर!
एबीवीपी नेता ने छात्र संघ कार्यालय में हिटलर की तस्वीर लगाकर आदर्श घोषित किया। इसके खिलाफ एबीवीपी को छोड़ सभी छात्र संगठनों ने प्रतिरोध मार्च निकाला और विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखित ज्ञापन दिया।
अनिल अंशुमन
10 Jul 2019
छात्र संघ कार्यालय में हिटलर की तस्वीर
फोटो : साभार

महात्मा गांधी के जन्मदिन पर अपने सभी सांसदों को पदयात्रा करने का निर्देश देनेवाली देश की वर्तमान सरकार के पिछले शासन में तो गोडसे जयंती मनाने और उसकी मूर्ति स्थापना-पूजन जैसे कृत्यों को ही देखा-सुना गया था। लेकिन अबकी बार अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे के लिए किस तरह से हिटलर को आदर्श प्रतीक बनाने की कवायद शुरू की जा रही है इसकी बानगी दिखी बिहार के सर्वोत्तम शिक्षा संस्थान पटना विश्वविद्यालय में।

खबरों के अनुसार इस विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव व एबीवीपी के नेता ने हिटलर को राष्ट्रवाद के प्रेरणा प्रतीक के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर स्थित छात्र संघ कार्यालय में महात्मा गांधी की जगह हिटलर की तस्वीर लगाई।

यह वह जगह है जहां छात्रों की प्रेरणा के लिए सुभाषचंद्र बोस, विवेकानंद, नेहरू और जयप्रकाश नारायण इत्यादि व्यक्तित्वों और पीयूएसयू के पूर्ववर्ती नेताओं की तस्वीरें लगी हुई हैं।

इसकी वायरल हुई खबर में 25 जून को वहाँ मनाए गए आपातकाल की तानाशाही विरोधी दिवस का बैनर भी दिखाया गया है। एबीवीपी नेता के अनुसार महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं होने के कारण उनकी तस्वीर हटाकर हिटलर की तस्वीर लगायी है। चूंकि हम राष्ट्रवादी हैं और जब हिटलर को पढ़े तो उनका राष्ट्रवाद अच्छा लगा। जिससे यह प्रेरणा मिलती है कि हर व्यक्ति को हिटलर की तरह ही अपने देश के प्रति वफादार होना चाहिए।   

गोदी मीडिया के अधिकांश अखबारों द्वारा इस खबर को दबाये रखने के बावजूद सोशल मीडिया में तस्वीर के साथ इस खबर के वायरल होते ही कैंपस समेत अन्य छात्रों में भी काफी रोष फैल गया। पटना विश्वविद्यालय के सभी वाम और अन्य छात्र संगठनों ने तत्काल एकजुट होकर एबीवीपी नेता के इस कृत्य की तीखी भर्त्सना की। फलतः इस विरोध का नेतृत्व कर रहे 2 छात्रों पर फर्जी मुकदमा भी हो गया।

Adolf Hitler VIRODH2.jpg

29 जून को इस पूरे प्रकरण के खिलाफ एबीवीपी को छोड़ सभी छात्र संगठनों ने प्रतिरोध मार्च निकाला और विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखित ज्ञापन दिया। जिसमें विश्व के तानाशाह हिटलर की तस्वीर लगाए जाने को इस विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा के लिए शर्मनाक बताते हुए इस घटना पर तुरत संज्ञान लेने की मांग की गयी। अंधराष्ट्रवाद व नस्लीय श्रेष्ठता के नाम पर लाखों लोगों का कत्लेआम करानेवाले तानाशाही के प्रतीक हिटलर को ‘आदर्श’ बनाए जाने का कड़ा विरोध किया गया ।

छात्र संगठनों ने मांग की-

  • विश्वविद्यालय प्रशासन मामले की जांच कर दोषियों को विश्वविद्यालय से बाहर करे।
  • पीयूएसयू के सभी छात्र अधिकारी से कुकृत्य की नैतिक ज़िम्मेवारी लेते हुए इस्तीफा दें।
  • विश्वविद्यालय प्रशासन भविष्य में हिटलर–मुसोलोनी जैसे मानवद्रोही प्रतीकों के इस्तेमाल नहीं होने देने के लिए आवश्यक कदम उठाए तथा इस प्रकरण का विरोध कर रहे दो छात्रों पर लगाए गए फर्जी मुकदमे को वापस लेकर कैंपस में लोकतान्त्रिक वातावरण की गारंटी करे।

मामले को तूल पकड़ता देख विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्र संघ कार्यालय को सील करके इस मामले में जल्द समुचित कारवाई करने का आश्वासन देने को मजबूर होना पड़ा। डीएसडब्ल्यू को यह भी स्पष्टीकरण देना पड़ा कि हिटलर की तस्वीर लगाने की कोई अनुमति नहीं ली गयी है।

छात्र संघ के अध्यक्ष व छात्र जदयू नेता को भी सफाई देनी पड़ी कि उनसे पूछे बगैर और उनकी अनुपस्थिती में यह सब हुआ है। लेकिन एबीवीपी नेता और छात्र संघ महासचिव ने हिटलर की तस्वीर लगाने को सही ठहराते हुए साफ तौर पर कह दिया कि इस फोटो को लगाने के लिए प्रस्ताव पास किया गया है।

इस पूरे मामले में राजधानी में ही रह रहे कुलाधिपति महोदय की चुप्पी हैरान करनेवाली है। विश्वविद्यालयों को शिक्षा के साथ साथ देश के भावी संचालक लोकतान्त्रिक नागरिकों के निर्माण का केंद्र माना जाता है। जब वहाँ एक तानाशाह को आदर्श प्रतीक बनाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा हो और कुलाधिपति महोदय अनभिज्ञ बनकर खामोश रहें तो यकीनन सवाल बनता है। जबकि सर्वविदित है कि छात्रों के लोकतान्त्रिक केंद्र के रूप में पटना विश्वविद्यालय की कितनी गौरवशाली परंपरा रही है। देश की आज़ादी के चल रहे संग्राम में इस विश्वविद्यालय के छात्रों की ज़बरदस्त भागीदारी रही है । सन् 1942 के चर्चित रहे ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय पटना स्थित सचिवालय पर तिरंगा लहराने के क्रम में शहीद हुए सात छात्रों का स्मारक युवाओं के लिए प्रेरणा प्रतीक स्थल बना हुआ है। ‘74 के आपातकाल की तानाशाही के विरोध में हुए ऐतिहासिक छात्र आंदोलन का मुख्य केंद्र पटना विश्वविद्यालय ही रहा। विडम्बना है कि उसी आंदोलन के छात्र नेता रहे प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री व उप मुख्यमंत्री महोदयों में से किसी ने भी तानाशाही के प्रतीक हिटलर के महिमामंडन पर कुछ नहीं कहा है।

पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ पर इन दिनों एबीवीपी व छात्र जदयू यानी एनडीए गठबंधन राजनीति का कब्जा है। आज़ाद मुल्क में संभवतः ये पहली घटना है कि जब किसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में तानाशाह हिटलर को राष्ट्रभक्ति के प्रेरणा प्रतीक बनाकर खुले रूप से महिमामंडित किया गया हो। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा फिलहाल हिटलर की तस्वीर हटाकर वहाँ महात्मा गांधी की तस्वीर लगा दी गयी है। लेकिन प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा-जदयू गठबंधन की एनडीए सरकार की ओर से किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया का नहीं आना दर्शाता है कि हिटलर को राष्ट्रभक्ति का प्रतीक आदर्श बनाया जाना महज एबीवीपी छात्र नेता के निजी सोच से ही नहीं हुआ है, बल्कि शासन कर रही वर्तमान सत्ता-राजनीति द्वारा देश पर थोपे जा रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी व सावरकर मार्का राष्ट्रभक्ति के दर्शन को स्थापित करने की ही सुनियोजित साजिश की एक बानगी है। हालांकि यह भी उतना ही स्थापित सत्य है कि बिहार की मिट्टी हमेशा से तानाशाही के खिलाफ लोकतान्त्रिक संघर्षों की धरती रही है। ऐसे में हिटलर को ‘आदर्श राष्ट्रभक्त’ के रूप में स्थापित करने की वर्तमान सत्ता प्रायोजित हरचंद कवायदों के बावजूद बिहार समेत बहुसंख्य लोग हिटलर को मानवद्रोही तानाशाह ही मानते हैं और मानते रहेंगे।

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