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भारत
राजनीति
बीमा कंपनियों और कॉर्पोरेट स्वास्थ्य के लिए - अच्छे दिन आने वाले हें
अमित सेनगुप्ता
02 Aug 2014

सरकार बनने के तुरंत बाद ही “अच्छे दिन” की शुरूआत के लिए भाजपा के मंत्रियों ने कई उपाय सुझाने शुरू कर दिए हैं। इसी पैटर्न को आधार बनाकर, नयी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री – डॉ. हर्षवर्धन ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई प्राथमिकताओं की घोषणा की है। इनमे से कोई भी घोषणा आश्चर्यजनक कर देने वाली नहीं है क्योंकि वे भाजपा की विचारधारा को ही दर्शाती है। यह सरकार भी यु.पी.ए. सरकार द्वारा चलाये गए नव-उदारवादी एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है।

डॉ.हर्षवर्धन द्वारा किए गए वायदे भाजपा के २०१४ और २००९ के घोषणापत्र की समझ को आगे बढाता है। भाजपा के 2009 के घोषणापत्र में कहा गया था कि भाजपा एक बड़ा कार्यक्रम शुरू करेगी, जिसमे “सार्वजनिक-निजी भागेदारी के तहत, एक नवीन बीम योजना के तहत “सभी के लिए स्वास्थ” योजना लागू करेगी। अपने 2014 के घोषणा पत्र में पार्टी बीमा और सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के बारे में कम स्पष्ट थी, लेकिन इसने अपने इरादों "स्वास्थ्य के व्यापक लक्ष्य सभी भारतीयों को सुलभ होंगें के आधार पर सभी भारतीयों के स्वस्थ” होने के आश्वासन के वायदे के साथ उजागर कर दिए हैं।

यही कारण है कि "स्वास्थ्य आश्वासन" स्वास्थ्य बीमा के साथ पर्याय बन गया है और सार्वजनिक निजी भागीदारी का अर्थ यहाँ स्पष्ट है। मीडिया के साथ अपनी पहली बातचीत से एक में, डॉ.हर्षवर्धन ने "सरकार स्वास्थ्य के लिए एक राष्ट्रीय बीमा पॉलिसी के माध्यम से 'सभी के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना' प्रदान करने के लिए काम करेगी" की सूचना दी है। उन्होंने  यूपीए सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की प्रशंसा की है, और उन्होंने इसका विस्तार करने का वादा किया। मीडिया के साथ अन्य बातचीत में मंत्री ने कहा कि वे सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) को विकसित करेंगें और बीमा संचालित स्वास्थ्य के सेवा को बढाने के प्रयास करेंगें। डॉ. हर्षवर्धन ने यह भी कहा कि वे इसके पक्ष में नहीं है कि “करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल एक ही तरह कि स्वास्थ्य नीति को लागू करने में किया जाए”।  

 

स्वास्थ्य चिकित्सा के लिए भाजपा का रोड मैप

ये सभी घोषणाएं,  भाजपा सरकार का स्वास्थ्य चिकित्सा पर क्या नजरिया है, को पूरी तरह खोल कर रख देती है।भाजपा का सपना यह है कि वह निजी क्षेत्र के साथ ' व्यापक साझेदारी' कर बीमा आधारित प्रणाली  को लागू करना चाहती है। पिछले एक दशक से यही दृष्टि यूपीए सरकार की रही है जिसे वह देश पर थोपने की कोशिश का सपना देखती रही है। स्वास्थ्य चिकित्सा प्रदान कराने के लिए बीमा आधारित योजना का सिद्धांत जिसे कि यु.पी.ए. सरकार ने बढ़ाया वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (नेशनल रूरल हेल्थ मिशन) ही है जिसे कि अब डॉ. हर्षवर्धन विकसित करना चाहते हैं। यूपीए सरकार की स्वास्थ्य नीति का चेहरा आंशिक रूप से इसलिए बच पाया क्योंकि उसने अपने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (जिसे बाद में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का नाम दिया गया) का समर्थन जारी रखा हालांकि वह यह सब उसने अपने हितों को ध्यान में रख कर किया। एनआरएचएम संप्रग सरकार के आखरी दिनों तक फंड की कमी की मार झेलता रहा । 2005 से ही, जब से इसे लागू किया गया इसके लिए जो फंड का प्रावधान था उसका केवल एक तिहाई ही आवंटित किया गया। बावजूद ढेर सारी कमियों के और इस कार्यक्रम के विरोध के (जिसमें योजना आयोग के अंदरके अनेक शक्तिशाली हित भी शामिल थे), यु.पी.ए. सरकार एनआरएचएम को मजबूत बनाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए एक प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता रहा। यह महत्वपूर्ण है कि भाजपा के 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में दावा किया गया था कि एनआरएचएम में "मौलिक सुधार किया जाएगा"। यह तो वक्त ही बतायेगा कि इस तरह के मौलिक सुधार क्या रूप लेते हैं, लेकिन यह भी काफी महत्तवपूर्ण है कि डॉ. हर्षवर्धन सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर भाजपा का रुख साफ़ किये बिना एन.आर.एच.एम् पर हमला बोलते रहे। यह तो स्पष्ट है कि भाजपा स्वास्थ्य क्षेत्र में नव-उदारवादी सुधारों को गहराई तक लागू करना चाहती है, जिसे कि यु.पी.ए. ने शुरू किया (एनआरएचएम के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं को  कमजोर समर्थन के बावजूद)। यह भी याद रखना होगा कि 2012 में योजना आयोग ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विखंडन लिए एक रोडमैप तैयार किया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना दस्तावेज में स्वास्थ्य अध्याय का पहला मसौदा तैयार किया गया जिसके तहत स्वास्थ्य बीमा योजनाओं, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, और ग्रामीण क्षेत्रों में देखभाल प्रदान करने के लिए निजी सेवा प्रदाताओं के नेटवर्क की भर्ती का विस्तार शामिल है। यदि इसे लागू किया जाता, योजना आयोग की समझ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की तबाही में बदल गयी होती। सौभाग्य से, इन सिफारिशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, लोकप्रिय आंदोलनों और यहां तक ​​की स्वास्थ्य मंत्रालय के भीतर से भी गंभीर विरोध का सामना करना पड़ा, और बाद में बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज से हटाया गया।  भाजपा जिसे लागू करना चाहती है, वह मोंटेक सिंह के निर्देशन में चलने वाले योजना आयोग के बहुत करीब है। कांग्रेस पार्टी लगातार एकदम सही बात कहती है कि भाजपा ने उसके एजेंडे को चोरी कर लिया है।

 

जनविरोधी और कॉर्पोरेट के हित साधने वाली दृष्टि

डॉ. हर्षवर्धन द्वारा की गई घोषणायें कोई भटकाव से प्रेरित टिप्पणी नहीं हैं, उनकी ये घोषणाएं  स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए एक ठोस दृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं जो खतरनाक, जन-विरोधी और कॉर्पोरेट के हित में हैं। इस दृष्टि के दो प्रमुख घटक हैं, पहला घटक स्वास्थ्य चिकित्सा व्यवस्था को खंडित करना चाहता है – एक गरीबों के लिए और दूसरी अमीरों के लिए। इसके भीतर यह सन्देश अन्तर्निहित है कि भाजपा कर द्वारा चलित एक ही तरह कि चिकित्सा व्यवस्था की समर्थक नहीं है। जबकि तथ्य यह है कि पूरी दुनिया का तजुर्बा एक ही तरह की चिकित्सा प्रणाली की व्यवस्था को मानता है-  वह है एक प्रगतिशील एवं सार्वभौमिक प्रणाली जो कर द्वारा अर्जित धन के माध्यम से वित्त पोषित हो और सबके लिए हो। कुशल और न्यायसंगत स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण की पूर्ण सफलता की कहानियां ऐसी प्रणालियों से संबंधित हैं – इसके उदहारण के लिए पिछले दसक में क्यूबा, कोस्टा रिका, मलेशिया, श्री लंका, यु.के. में एन.एच.एस. आदि और अभी हाल ही में ब्राज़ील और थाईलैंड का नाम लिया जा सकता है। इसके विपरीत, दुनिया के कई हिस्सों में नव-उदारवादी नीतियों ने दुनिया कई हिस्सों में, गरीबों के लिए बुनियादी देखभाल के न्यूनतम पैकेज और स्वास्थ्य सेवा को खंडित कर दिया है और अमीर के लिए एक से बढ़कर एक कॉर्पोरेट नियंत्रित निजी व्यवस्था बनाने के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। इन नीतियों ने स्वास्थ्य चिकित्सा में सार्वजनिक सहायता को न्यूनतम स्तर पर रखा है, जिसकी वजह से से प्रदान कि जा रही सेवाओं की सामग्री और गुणवत्ता कि स्थिति बहुत खराब है। इसके परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग और अमीर तबका सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की धुरी से बाहर जा रहा है और निजी संथाओं पर निर्भर हो रहा है।वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि नव-उदारवादी सुधारों ने अमीरों और सम्पन्न तबके  को कमाई पर करों में काफी छूट दी है, यही कारण है कि वे निजी चिकित्सा व्यवस्था के खर्चे को वहन कर पाते है। यहाँ यह भी उल्लेख करना जरूरी होगा कि भारत का सकल घरेलु उत्पाद और कर औषत दुनिया भर में सबसे खराब स्थिति पर है, भारत मे बावजूद कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा कमाने वाले व्यक्ति यहाँ के निवासी है, वे सबसे कम कर अदा करते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था से चूँकि संपन्न तबका बाहर है इसलिए फंड की कमी के चलते इस व्यवस्था के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे कि स्थिति दयनीय है। भारत की स्वास्थ्य प्रणाली का विभाजन आज स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।

 

पिछले दो दशकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च, सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत से   थोड़ा अधिक पर स्थिर होकर रह गया है (दुनिया में सबसे नीचे के पाँच में से एक), जोकि एक बेकार और खराब संसाधित सार्वजनिक प्रणाली और निजी वयवस्था पर बढती निर्भरता वाली प्रणाली बनकर रह गई है। भाजपा सरकार ने इस प्रक्रिया को और बढाने का फैसला लिया है जिससे स्थिति और बी दयनीय होने वाली है।

 

सबूतों के विपरीत बीमा आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देना

भाजपा की दृष्टि मे दूसरा स्तंभ यह है कि  बीमा आधारित प्रणाली और सार्वजनिक निजी भागीदारी के संयोजन के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं को भी निजी प्रदाताओं को आउटसोर्स किया जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का मॉडल ठीक इस तरह का है। नई सरकार द्वारा इस मॉडल के विस्तार की घोषित मंशा को देखते हुए भारत में इस मॉडल के अनुभव को जांचना जरूरी होगा।

2007 में आंध्र प्रदेश सरकार ने एक बीमा योजना 'राजीव अरोग्यसरी' योजना की शुरुवात की थी। अरोग्यसरी के आधार पर ही एक राष्ट्रव्यापी योजना को 2009 में शुरू किया गया, जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) कहा गया।इसी प्रकार राज्य स्तरीय योजनाओं को भी शुरू किया गया और  साथ ही यह कई राज्यों में शुरू होने की प्रक्रिया में हैं। इन सभी योजनाओं  के तहत उपचार प्राप्त करने वाले रोगी को उपचार के लिए मान्यता प्राप्त संस्थानों का 'विकल्प' प्रदान किया जाता है। ये संस्थान सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में से कोई भी हो सकते हैं। किसी भी अन्य बीमा पैकेज की तरह इन योजनाओं प्रतिपूर्ति के लिए भी एक तय सीमा है। इस तय सीमा के भिन्न-भिन्न आधार हैं -  इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत पांच सदस्यों वाले प्रति परिवार के लिए दर रु30, 000 पर तय है, जबकि अरोग्यसरी के तहत कुछ राज्य की योजनाओं  में यह सीमा रु. डेढ़ लाख या उससे अधिक के लिए प्रतिपूर्ति पर स्थित की गई है। ये योजनाएं 'वित्तपोषण के विभाजन और प्रोविजनिंग के बीच बटवारे' के तर्क पर कार्य करती हैं। जबकि वित्तपोषण सार्वजनिक संसाधनों (केंद्र और राज्यों द्वारा टैक्स आधार पर धन) के माध्यम से है, और इलाज किसी भी मान्यता प्राप्त सुविधा द्वारा प्रदान किया जा सकता है। इस तरह की सुविधा सार्वजनिक (यानी सरकारी अस्पतालों) या निजी भी हो सकती है। लेकिन असलियत में ज्यादातर  मान्यता प्राप्त संस्थानों की बड़ी संख्या निजी क्षेत्र में हैं। लाभार्थियों का बीमा उन बीमारियों के लिए किया जाता है जिनके लिए उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता है और सभी बीमारियों के निवारण की कोई गारंटी नहीं है- दूसरे शब्दों में यह कहना ठीक होगा कि समुचित स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की कोई गारंटी नहीं है, बल्कि एक पूर्व निर्धारित पैकेज के आधार पर देखभाल प्रदान करने का वादा है।

वित्तपोषण और प्रावाधिकरण के बीच विभाजन स्पष्ट रूप से निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए दरवाजे खोलता है। आंध्र प्रदेश में ई.पी.डब्लू., 27 अक्टूबर, 2012 में अरोग्यसरी के एक अध्ययन: में (एन.पुरेन्द्र प्रसाद, पी.राघवेन्द्र, मेडिकल नव उदारवाद के काल में हेल्थकेयर मॉडल में अरोग्यसरी योजना के विश्लेषण ) पर बहुत दिलचस्प आंकड़े उपलब्ध कराता है।विश्लेषण में नोट किया गया है कि "अरोग्यसरी  ट्रस्ट को राज्य के 491 अस्पतालों के पैनल में शामिल किया गया जिनमे लगभग 80% निजी क्षेत्र में हैं और शेष 20% सरकारी अस्पताल में से हैं। हालांकि अरोग्यसरी योजना गरीब ग्रामीणों के लिए है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी एक भी निजी अस्पताल नहीं है, हालांकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पैनल में शामिल सरकारी अस्पतालों का वितरण लगभग सामान है।

इस योजना सबसे से अधिक चिंता का विषय है वे निजी प्रदाता, जो चिकित्सा में बार बार अनैतिक तरीकों में लिप्त पाए जाते हैं और दोषी पाए गए है। छत्तीसगढ़ में जनता के दबाव के तहत स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक को इन मामलों के लिए एक तथ्य खोजने की टीम को नियुक्त किया और 22 मामलों में शामिल ऐसे डॉक्टरों को निलंबित कर दिया जिन्होंने बिना चिकित्सिय कारणों के गर्भाशय (गर्भाशय को हटाने) का आपरेशन कर दिया। दैनिक भास्कर में सिर्फ एक निजी अस्पताल में ही (धमतरी में गुप्ता अस्पताल) 900 दिनों में 604 गर्भाशय को हटाने के आपरेशन के आयोजन की सूचना दी थी। इसकी तुलना में, रायपुर में सरकार द्वारा संचालित  अम्बेडकर अस्पताल में इसी अवधि में सिर्फ सात आपरेशन हुए।अन्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बिहार में एक अनुमान के अनुसार 16,000 गर्भाशय को हटाने के आपरेशन किये गए जो  उनमें से ज्यादातर अनावश्यक आपरेशन थे। हर कोई जानता है ये रिपोर्टों सिर्फ शुरुवात हैं। इसलिए देश के कई हिस्सों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना स्कीम की आधारशिला अनैतिक और लालच से भरपूर है- जो कि अनावश्यक जांच, सर्जरी, दवा आदि जो केवल लाभ के भूखे भेडियों की ही मदद करता है।

बीमा कम्पनियाँ बड़ी तेजी से मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था को ख़त्म कर रही है। आन्ध्र प्रदेश में अरोग्य्श्री योजना केवल 2%  बीमारियों के बोझ को पोषितकरने  के लिए स्वास्थ्य बजट का २५% अपनी तरफ खींच रही है। इस प्रकार, बीमा योजनायें जोकि पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रही सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से संसाधनों को खीच लेती है और कॉरपोरेट अस्पतालों के खजाने भर देती है। छत्तीसगढ़ में पब्लिक हेल्थ रिसोर्स नेटवर्क (PHRN) और सामाजिक चिकित्सा और सामुदायिक स्वास्थ्य (CSMCH), जेएनयू द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत पैनल में शामिल संस्थाओं के सम्बन्ध में सरकार के राजस्व में  कोई वृद्धि नहीं हुई है बल्कि पहले से उपलब्ध धन वापस ले लिया गया है। इस प्रकार यह अपरिवर्तनीय सबूत है कि सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित बीमा मॉडल स्वास्थ्य के लिए न्यायसंगत पहुँच प्रदान करने में नाकाम रही है जिसका परिणाम है कि सार्वजनिक सेवाओं को इसने कमजोर बना दिया है। ऐसी योजनाएँ हमेशा नव-उदारवाद के सिद्धांत और व्यवहार के आगोश में क्यों  लिप्त रहती हैं, इसका भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारण है । सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित योजनायें टैक्स के जरिए जमा धन उन निजी क्षेत्रों के खजाने में पहुचाने का तरीका है – वे बीमा कंपनियां जो इन योजनाओं को चलाती है और निजी अस्पताल चेन जो चिकित्सा उपलब्ध कराती है।

अंत में,  स्वस्थ्ग्य चिकित्सा और नागरिकों के कल्याण में भाजपा के रिकॉर्ड की जांच करना उपयोगी होगा विशेष रूप से गुजरात जोकि इनका 'मॉडल' राज्य है। योजना आयोग द्वारा २०१२ किये गए एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं और उससे जुड़े मामलों के संबंध में, गुजरात 21 प्रमुख भारतीय राज्यों में सबसे नीचे 6 वे स्थान पर था। इसके अलावा,गुजरात 'हंगर इंडेक्स' यानी भूखमरी (राज्य हंगर इंडेक्स, 2008) में 17 बड़े राज्यों के बीच 13 वें स्थान पर था। 2009 में राज्य के कुल सरकारी व्यय का प्रतिशत स्वास्थ्य पर कुल  2.83% था, जोकि राष्ट्रीय औसत 3.60% से काफी नीचे की तरफ है। इसके अलावा, गुजरात में स्वास्थ्य पर खर्च राज्य के सकल घरेलू उत्पाद  का केवल 0.38% है जोकि राष्ट्रीय औसत 0.59% से कम है। सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत भारत में शुरू होने वाली सबसे पहली उच्च प्रोफ़ाइल  योजना चिरंजीवी योजना (जिसे गर्भवती महिलाओं के लिए संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया) थी जिसे 2006 में गुजरात में लागू किया था। इन योजनाओं के हाल के मूल्यांकन में (विश्व स्वास्थ्य संगठन के बुलेटिन में शामिल है) कई कमियों को इंगित किया और इस योजना को विफल माना गया। अगर भाजपा की चली तो गुजरात की कहानी को देश के बाकी हिस्सों में भी दोहराया जाएगा। निश्चित तौर पर अच्छे दिन आने वाले हें – लेकिन बीमा कंपनियों और कॉर्पोरेट अस्पतालों कि श्रंखलाओं के लिए।

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

डॉ. हर्ष वर्धन
स्वास्थ्य
अस्पताल
बीमा
नवउदारवाद
राजीव अरोग्यसरी
राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना

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