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भारत
राजनीति
बीपीसीएल के निजीकरण पर सरकार की ‘हड़बड़ी’, कर्मचारियों के लिए चिंता का सबब
फ़ायदे में चलने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी के कर्मचारियों ने पीएमओ को पत्र लिखकर चेताया है कि किस तरह तेल के क्षेत्र में वैश्विक एकाधिकारी पूंजी अपने पाँव पसार रही है।
पृथ्वीराज रूपावत
10 Oct 2019
bpcl
(फोटो: डेक्कन हेराल्ड से साभार)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) को निजी हाथों में बेचने का प्रस्ताव जिस ‘हड़बड़ी’ में रखा है, सिवाय इसके कि वह इसके माध्यम से अपने इस साल के महत्वाकांक्षी विनिमेश के लक्ष्य को हासिल कर सकती है, इसकी कोई दूसरी वजह नज़र नहीं आती।

हाल ही में यह ख़बर आई थी कि नरेंद्र मोदी सरकार ने उस क़ानून को “गुपचुप तरीक़े से निरस्त कर दिया है” जिसके द्वारा इस कम्पनी का राष्ट्रीयकरण सम्भव हुआ था, और इस प्रकार इसे बेचने से पहले संसद से ली जाने वाली आवश्यक सहमति की औपचारिकताओं को भी ख़त्म कर दिया है।

इन घटनाओं से चिंतित बीपीसीएल कर्मी जगह-जगह विरोध प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं, और सरकार को चेता रहे हैं कि उसके इस प्रस्ताव से तेल और पेट्रोलियम क्षेत्र में “निजी एकाधिकार” का रास्ता खुल जायेगा, जबकि पहले से ही वैश्विक एकाधिकार वाले पूंजीपति समूह भारतीय पेट्रोलियम बाज़ार पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए नज़रें गड़ाये हुए हैं।

हाल ही में, समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार निरस्तीकरण एंव संशोधन अधिनियम 2016 के ज़रिये “क़ानूनी किताबों में बिना मतलब रखे 187 सड़ गल चुके निरर्थक क़ानूनों” जिसमें 1976 का अधिनियम भी शामिल है, जिसके द्वारा बर्मा शेल का राष्ट्रीयकरण सम्भव हुआ था, को निरस्त कर दिया। एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया गया कि “यह अधिनियम निरस्त हो चुका है और अब BPCL की रणनीतिक बिक्री के लिए संसद की मंज़ूरी की कोई ज़रूरत नहीं है।”

2003 में जब तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार BPCL के साथ साथ हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के भी निजीकरण को लेकर उत्सुक थी, तब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में बताया था कि इन कंपनियों का निजीकरण सिर्फ़ संसद द्वारा उपरोक्त क़ानून में संशोधन के ज़रिये ही संभव है।

जैसे ही BPCL के निजीकरण की ख़बर चर्चा में आई, देश के विभिन्न राज्यों में स्थित BPCL इकाइयों के समक्ष चिंतित कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं। इसके अतिरिक्त, कई BPCL कर्मचारी संघ जिसमें कोचीन रिफ़ायनरीज़ ऑफ़िसर्स एसोसिएशन, BPCL-MSA मुंबई रिफ़ाइनरी डिवीज़न, NRL ऑफ़िसर्स एसोसिएशन और BPCL मार्केटिंग ऑफ़िसर्स एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को एक पत्र लिखकर अपनी आशंकाओं को ज़ाहिर किया है। BPCL में 12,500 से अधिक स्थाई कर्मचारी कार्यरत हैं।

कर्मचारी संघों ने अपने पत्र में घोषणा की है कि “निजी पूंजीपति इस क्षेत्र में जिस तरह की रुचि और व्यावसायिक मॉडल अपनाएंगे, इस बात को लेकर अधिकारी वर्ग आशंकित और डरा हुआ है। हमें इस बात का भी भय है कि निजीकरण के बाद, कहीं इस तरह के नीतिगत निर्णय न लिए जाएँ जिसका सीधा असर तेलशोधन की प्रकिया और कर्मचारियों की नौकरी की गारंटी पर पड़े।”

पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि BPCL ने किस तरह पेट्रोलियम क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, और इसके “निजीकरण से हमारे देश पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, क्योंकि निजी कंपनियों का लक्ष्य अधिकतम लाभ कमाने पर होता है, और इससे ऊर्जा सुरक्षा सहित सेवाओं के वितरण में सामाजिक समावेशी स्वरूप की उपेक्षा होनी अवश्वम्भावी है।”

पत्र में यह भी कहा गया है कि, “हमें इस बात की भी चिंता है कि BPCL के निजीकरण के चलते BRPL सहित कई अन्य क्षेत्रों में स्थापित संयुक्त उपक्रम भी प्रभावित हो सकते हैं। हमें इस बात का डर है कि निजी क्षेत्र के पूंजी समूह BPCL के मज़बूत और व्यापक मार्केटिंग नेटवर्क का फ़ायदा उठाकर इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम में सेंधमारी कर सकते हैं, जिससे अंततः कुछ वर्षों में केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की ये कम्पनियाँ बीमार घोषित कर दी जायेंगी।”

कर्मचारी यूनियनों ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि पिछले 5 वर्षों में BPCL का शुद्ध लाभ 5,000 से 8,000 करोड़ रुपये के बीच था, और इसने 50,000 करोड़ रुपये से अधिक  का निवेश कई परियोजनाओं में किया है, जिसे बिना किसी अधिक समय सीमा या लागत के पूंजीकृत कर लिया गया है।

BPCL के पास अपनी कुल चार रिफ़ाइनरी हैं, जो असम, केरल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं जिनकी क्षमता 38.30 मिलियन टन कच्चे तेल को ईंधन में बदलने की है। इसके पास अपने 15,078 पेट्रोल पंप हैं और 6,004 एलपीजी वितरकों का नेटवर्क है। कम्पनी में सरकार की कुल 53.23% हिस्सेदारी है और 25% हिस्सेदारी सार्वजनिक शेयरधारकों के पास है।

BPCL की वेबसाइट पर कम्पनी ख़ुद को ‘बेहतरीन तरीक़े से संचालित’ महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में दर्शाती है, जिसने अपनी शुरुआत भारत की तेल और गैस कंपनी के रूप में की थो जो आज ख़ुद को तेल शोधन, अन्वेषण और विपणन के क्षेत्र में विश्व की फ़ार्च्यून 500 कम्पनियों में शुमार करने में सफल रही है।

BPCL ने 2018-19 के वित्त वर्ष में 7,132 करोड़ का शुद्ध लाभ अर्जित किया है, जो 2017-18 की तुलना में थोड़ा ही कम है। लेकिन सरकार ने इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया है कि वह क्यों लाभ में चलने वाली इस संस्था को बेचना चाहती है सिवाय इसके कि उसे इसके ज़रिये अपने 1.05 लाख करोड़ के विनिवेश के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।

दूसरी तरफ़, इस क्षेत्र के वैश्विक एकाधिकार वाले पूंजीपति समूह भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र में अपने विस्तार के लिए नज़रें गड़ाये बैठे हैं। 2017 में, रूस ने रोसनेफ़्ट और ट्राफीगुरा-UCP कंसोर्टियम को अधिग्रहित किया जिसने एस्सार ऑयल का अधिग्रहण 12.90 बिलियन डॉलर (क़रीब 83 हज़ार करोड़ रुपये) में किया था, जिसकी तेलशोधन क्षमता 20 मिलियन टन, और 1000 मेगावाट कैप्टिव पॉवर प्लांट के साथ 3500 पेट्रोल पंप थे। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष सऊदी अरब सरकार की कम्पनी, सऊदी अरामको ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ (RIL) के तेलशोधन और पेट्रोलियम व्यवसाय में अपनी 20% हिस्सेदारी हासिल करने के लिए 1.05 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है।

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