NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बजट 2019: टैक्स रेवेन्यू में गिरावट, सरकार ने ख़र्च से हाथ खींचा
अनुमान है कि 2018-19 में टैक्स रेवेन्यू में 1.67 लाख करोड़ की कमी आएगी। इसलिए सरकार ने सार्वजनिक ख़र्च पर शिकंजा कस दिया है, ख़र्च को 1.6 लाख करोड़ रुपये घटा दिया है।
सुबोध वर्मा
05 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
बजट 2019: टैक्स रेवेन्यू में गिरावट, सरकार ने ख़र्च से हाथ खींचा

यदि आप नव-उदारवादी हठधर्मिता द्वारा की गई बर्बादी को देखना चाहते हैं, तो मोदी सरकार के पहले शासन काल के अंतिम वर्ष के वित्त पर एक नज़र डालें। 5 जुलाई को संसद में पेश किए जाने वाले 2019-20 के पूर्ण बजट में यह विवरण सामने आएगा, लेकिन लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के पास पिछले साल के ख़र्च और आय के बारे में सभी आंकड़े मौजूद हैं।

इस साल फ़रवरी में पेश किए गए अंतरिम बजट में, आम चुनावों से ठीक पहले, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अनुमान लगाया था कि रेवेन्यू प्राप्तियों के रूप में उसे 7.3 लाख करोड़ रुपये की उम्मीद थी, जो मुख्य रूप से कर संग्रह से आनी थी। हालांकि, सीजीए से पता चलता है कि मार्च के अंत तक (जो वित्त वर्ष 2018-19 का अंत है), रेवेन्यूप्राप्तियां कुल 15.6 लाख करोड़ रुपये की रहीं। यह 1 करोड़ 65 लाख करोड़ रुपये की भारी कमी को दर्शाती है।

इस कमी के कारणों का पता लगाना कोई मुश्किल बात नहीं है। फ़रवरी में शुद्ध कर रेवेन्यूका अनुमान 14.8 लाख करोड़ रुपये लगाया गया था, जबकि मार्च के अंत तक मात्र 13.2 लाख करोड़ रुपये ही हासिल हुआ - जो सीधे-सीधे 1 करोड़ 74 लाख रुपये की कमी को दर्शाता है। यह बढ़ती जीएसटी की प्राप्ति, बेहतर आयकर अनुपालन, व्यापक कर शुद्ध के जाल और बड़े दावों के विपरीत की तस्वीर है।

cga chart 1819.jpg

कर रेवेन्यूमें रेवेन्यूके विभिन्न अन्य स्रोतों को जोड़ने के बाद, सरकार की कुल प्राप्तियों का अंतिम आंकड़ा 16.66 लाख करोड़ रुपये रहा, जो अंतरिम बजट में अनुमानित 18.23 लाख करोड़ से कम रहा था।

यह विश्वास करना मुश्किल है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने से ठीक एक महीने पहले, सरकार को इस बात का कोई अंदाज़ा ही नहीं था, जोकि अपने आप में एक खेदजनक स्थिति है। इससे एकमात्र निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि चुनावों पर नज़र रखते हुए फ़रवरी में आंकड़े कृत्रिम रूप से बढ़ा दिए गए थे।

यह मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों और वित्तीय गुरुओं के लिए काफ़ी प्रथागत सा है, जो रेवेन्यूकी कमी का सामना करने के बाद आवेग में आ जाते हैं। वे तुरंत ख़र्च में कटौती के वैश्विक नवउदारवादी नुस्खे को ट्राई करने लगते हैं, उनके अनुसार, जिसका अभ्यास सभी सरकारों द्वारा हर समय करना चाहिए, लेकिन विशेष रूप से यदि रेवेन्यूगिर रहा हो तो। अन्यथा, वे कहते हैं, कि घाटा बढ़ेगा, और किसी भी नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में ऐसा नहीं होना चाहिए।

भारतीय वित्त मंत्रालय के दिग्गज इस पौराणिक कथा में डूबे हुए है, और इसलिए, वे भी ख़र्च को निचोड़ रहे हैं, जैसा कि ऊपर दी गई तालिका में देखा जा सकता है। फ़रवरी में अंतरिम बजट में कुल व्यय का अनुमान 24.57 लाख करोड़ रुपये था, लेकिन मार्च में सीजीए से पता चलता है, कि यह वास्तव में 23.11 लाख करोड़ रुपये था। यानी इसमें 1 करोड़ 45 लाख रुपये की कटौती की गई है।

यह शिकंज़ा वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में कसा गया, यानी मार्च में। दरअसल, वित्त मंत्रालय ने पूरे साल भर में वित्त ख़र्च पर शिकंजा कसा था। और इसे विभिन्न ख़र्चों की तैयारी में किया गया था जो वर्ष समाप्त होने के साथ ही समाप्त हो रहे थे। उदाहरण के लिए, इस वर्ष किसानों की आय के पूरक (पीएम-केसान) के लिए योजना की पहली किश्त के लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसके बाद इस वर्ष 75,000 करोड़ रुपये की एक और किश्त दी जानी थी। तथाकथित सामाजिक सुरक्षा योजना सहित इस तरह के कई अन्य उदाहरणों का हवाला दिया जा सकता है। इस तरह के विशेष राजनीतिक निर्णयों के अलावा, किसी भी वर्ष को उठा कर देखें तो आप पाएंगे कि सरकार वित्तीय वर्ष के अंत यानी मार्च में ख़र्च को बढ़ा देती है। यह इस तरह के अंतिम-मिनट के ख़र्च को समायोजित करने के बाद की स्थिति है, साथ ही चुनाव संबंधी ख़र्च के बाद की भी है जो सरकार के ख़र्च में कमी के साथ समाप्त हो जाती है।

अब सवाल यह है: आगामी बजट में, सरकार कैसे इस गिरते रेवेन्यूके संकट से निपटने का प्रस्ताव करती है? यह लोगों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि सरकार ऐसा होने पर ख़र्च में कटौती करने की इच्छा रखती है। और, यह ऐसे समय में ओर भी विनाशकारी होगा जब अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुज़र रही है, मांग बढ़ रही है, निवेश रुक रहा है, और बेरोजगारी बढ़ रही है।

Budget 2019
modi 2.0
Nirmala Sitharaman
Economy
GST

Related Stories

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

पश्चिम बंगालः वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चाय बागान के कर्मचारी-श्रमिक तीन दिन करेंगे हड़ताल

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

कमरतोड़ महंगाई को नियंत्रित करने में नाकाम मोदी सरकार 

कर्नाटक : कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों से प्लास्टिक उत्पादक इकाईयों को करना पड़ रहा है दिक़्क़तों का सामना

‘जनता की भलाई’ के लिए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंतर्गत क्यों नहीं लाते मोदीजी!

पिछले 5 साल में भारत में 2 करोड़ महिलाएं नौकरियों से हुईं अलग- रिपोर्ट


बाकी खबरें

  • उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार
    29 Apr 2022
    जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई इलाके इस समय भीषण सूखे की चपेट में हैं। सूखे के कारण लोगों के पलायन में 200 फीसदी वृद्धि होने का अनुमान है।
  • भाषा
    दिल्ली दंगा : अदालत ने ख़ालिद की ज़मानत पर सुनवाई टाली, इमाम की याचिका पर पुलिस का रुख़ पूछा
    29 Apr 2022
    दिल्ली उच्च न्यायालय ने देशद्रोह के कानून की संवैधानिक वैधता पर उच्चतम न्यायालय के समक्ष आगामी सुनवाई के मद्देनजर सुनवाई टाल दी और इसी मामले में शरजील इमाम की जमानत अर्जी पर दिल्ली पुलिस का रुख पूछा।
  • विजय विनीत
    इफ़्तार को मुद्दा बनाने वाले बीएचयू को क्यों बनाना चाहते हैं सांप्रदायिकता की फैक्ट्री?
    29 Apr 2022
    "बवाल उस समय नहीं मचा जब बीएचयू के कुलपति ने परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन और अनुष्ठान किया। उस समय उन पर हिन्दूवाद के आरोप चस्पा नहीं हुए। आज वो सामाजिक समरसता के लिए आयोजित इफ़्तार…
  • अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश: बुद्धिजीवियों का आरोप राज्य में धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने का फ़ैसला मुसलमानों पर हमला है
    29 Apr 2022
    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा धार्मिक उत्सवों का राजनीतिकरण देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगा।
  • कुमुदिनी पति
    नई शिक्षा नीति से सधेगा काॅरपोरेट हित
    29 Apr 2022
    दरअसल शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह से सरकार द्वारा बिना संसद में बहस कराए ताबड़तोड़ काॅरपोरेटाइज़ेशन और निजीकरण किया जा रहा है, उससे पूरे शैक्षणिक जगत में असंतोष व्याप्त है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License