NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बांग्लादेशी प्रवासियों की 'बाढ़' के मिथक तोड़ते जनगणना के आंकड़े!
बांग्लादेशी अप्रवासियों के बारे में एक मिथक यह है कि वे भारत के विभिन्न हिस्सों में 'बाढ़' की तरह भर रहे हैं। इसे भी, संघ परिवार द्वारा ख़ूब प्रचारित किया जाता है। इस प्रासंगिक डाटा को जनगणना वेबसाइट से जारी होने के एक महीने के भीतर ही हटा दिया गया है।
सुबोध वर्मा
21 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
बांग्लादेशी प्रवासियों

2011 में हुई जनगणना के बाद माईग्रेशन से संबंधित डाटा को जारी करने में जनगणना कार्यालय को आठ साल लग गए। और इसके जारी होने के एक महीने के भीतर ही, एक विशेष डाटा के सेट को हटा दिया गया। यह हटायी गयी टेबल डी -2 है जो विदेशी प्रवासियों की संख्या को बताती है। आधिकारिक जनगणना वेबसाइट अब एक गुप्त फ़ुटनोट में कहती है कि, इस पहलू का डाटा "जांच के अधीन” है।

न्यूज़क्लिक ने इस डाटा के ग़ायब होने से पहले डी-2 तालिका और उससे जुड़े कुछ प्रमुख पहलुओं को डाउनलोड कर लिया था – जो शायद इसे हटाए जाने का कारण भी हो सकता है – जिन्हें नीचे दिया जा रहा है। हासिल किए गए जनगणना के आंकड़ों से पता चला है कि भारत में 27 लाख व्यक्ति ऐसे हैं जिन्होंने बताया कि उनका अंतिम निवास स्थान बांग्लादेश था। यह आंकडा 2001 में हुई पिछली जनगणना में लगभग 31 लाख था।

इस डाटासेट में वर्तमान स्थान पर रहने की अवधि भी दी गई है। यह वह समय है जबसे वे अपना देश छोड़ कर आए हैं। इससे पता चलता है कि 1991 से पहले आप्रवासियों की तीन चौथाई से अधिक संख्या (लगभग 77 प्रतिशत) भारत में आ गई थी। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है (हासिल की गई डी-2 तालिका के आधार पर), बांग्लादेश से इमीग्रेशन/पलायन समय के साथ लगातार गिर रहा है।

bnagadesh chart.jpg

जबकि संघ परिवार/भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लगातार ये अभियान चलाया है कि बांग्लादेशी अप्रवासी देश में बाढ़ की तरह आ रहे हैं और इसलिए इन्हे "घुसपैठिया" या "अवैध" घोषित करने की ज़रूरत है, ताकि आगे चलकर उन्हें देश से बाहर फेंक दिया जाएगा। भाजपा के शीर्ष नेताओं को यह कहते हुए सुनना आम बात है कि देश में 40 लाख बांग्लादेशी हैं जो अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश से इमीग्रेशन में गिरावट कई कई कारण हो सकते है, जिसमें सीमा पर बाड़ लगाने, चौकसी करने और बांग्लादेश में आर्थिक स्थितियों में कुछ सुधार भी हो सकते है।

बांग्लादेशी अप्रवासियों के बारे में एक अन्य मिथक यह भी है कि वे भारत के विभिन्न हिस्सों में 'बाढ़' की तरह भर रहे हैं। इसे भी, संघ परिवार द्वारा ख़ूब प्रचारित किया जाता है। उनकी पहचान करने और उन्हें देश से बेदख़ल करने के नारे का इस्तेमाल राजनीतिक नारे के रूप में उन सब जगहों पर भी किया जाता है, जहाँ कुछ मुट्ठी भर अप्रवासी ही हैं। उदाहरण के लिए, यह मांग दिल्ली में भी उठाई गई है जहाँ हाल ही में, भाजपा सांसद परवेश वर्मा ने इसे लोकसभा में बड़ी गरज के साथ कहा और “अवैध अप्रवासियों” को देश के बाहर निकालने के लिए असम जैसी एन.आर.सी. (नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स) बनाने की माँग की। हालांकि, जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में बांग्लादेश से केवल 2,321 प्रवासियों ही है।

दरअसल, लगभग 95 प्रतिशत बांग्लादेशी अप्रवासी पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में रह रहे हैं। शेष 5 प्रतिशत जोकि बहुत ही कम मात्रा है देश के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं, मुख्यतः कुछ शहरों में। इनमें वे भी शामिल हैं, जो 1971 के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में सरकार द्वारा बसाए गए थे, हालांकि उनकी संख्या उम्र दराज़ी के साथ घटती जा रही है।

दूसरा मिथक यह है कि पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेशी "घुसपैठियों" की भरमार है। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से पता चलता है कि पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों में बसे बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या नगण्य है। केवल त्रिपुरा में ऐसे प्रवासियों का अनुपात अधिक है जहां लगभग 5,862 प्रवासी प्रति लाख जनसंख्या पर है। हालांकि यह भी, बहुत महत्वपूर्ण अनुपात नहीं है, आबादी का केवल 6 प्रतिशत बैठता है।

bang chart.jpg

जनगणना के आंकड़े भारत में निवासियों के रहने की वैधता या उससे जुड़ी अन्य बातों का संकेत नहीं देते हैं। जनगणना वाले केवल इस बारे में पूछताछ करते है कि संबंधित व्यक्ति अपने वर्तमान निवास से ठीक पहले कहां रह रहा था। यह भी संभव है कि कुछ लोग जनगणना करने वाले को गलत तरीक़े से भी रिपोर्ट कर सकते हैं। लेकिन जब तक अविश्वास का कोई ख़तरा या माहौल नहीं होता है, तब तक यह विश्वास करने का कोई विशेष कारण नहीं है कि इस तरह की त्रुटियां या ग़लतफ़हमी गणना के दौरान हो रही है।

जिस वर्ष जनगणना आयोजित की गई थी – यानी 2011 में – तब किसी भी तरह का तनाव या मनमुटाव नहीं देखा गया था, जैसा कि आज एन.आर.सी. के मामले में देखा जा रहा है, जो लाखों लोगों के सिर पर तलवार की तरह लटकी हुई है। न ही संघ परिवार ने कभी इतनी आक्रामक तरीक़े से लोगों को अपनी धार्मिक पहचान बताने और इसे आप्रवासन से जोड़ने के लिए उकसाया था। इसलिए, ये आंकड़े, बहुत ही बड़े सच का प्रतिनिधित्व करते हैं। शायद इसी लिए, जनगणना कार्यालय (जो गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है) ने डाटासेट को हटा दिया है।

Bangladeshi Immigrants
Foreign Immigrants
Census of India
Census Data
NRC
Sangh Parivar
Census Office
Bangladeshi Migrant Myth

Related Stories

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार

बीरभूम नरसंहार ने तृणमूल की ख़ामियों को किया उजागर 

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

अदालत ने फिर उठाए दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच पर सवाल, लापरवाही के दोषी पुलिसकर्मी के वेतन में कटौती के आदेश

केरलः भाजपा के ध्रुवीकरण-प्रयासों में सहायक है नारकोटिक जिहाद का बवाल

सरकार के खिलाफ शिकायत करने पर 'बाहर' नहीं कर सकते: गुजरात HC ने CAA-NRC प्रदर्शनकारी का बचाव किया

नर्क का दूसरा नाम...

असम डिटेंशन कैंप में रह रहे विदेशी नागरिकों के 22 बच्चे!

राष्ट्रव्यापी NRC पर अभी कोई फैसला नहीं: गृह मंत्रालय ने संसद को बताया


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License