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भारत
राजनीति
ब्रह्मा समिति की रिपोर्ट अवैध अप्रवासी के भूमि अधिग्रहण के ख़तरे पर ज़ोर देती है
यह रिपोर्ट असम में भूमि अधिग्रहण पैटर्न से संबंधित तथ्यों से भरा हुआ है।
विवान एबन
17 May 2018
brama

कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ लैंड राइट्स ऑफ इंडिजेनस पीपल ने 18 जनवरी को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी। हालांकि ऐसा लगता है कि समिति के सदस्यों के बीच मतभेदों के कारण दो रिपोर्ट सौंपी गईं। ये रिपोर्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हरि शंकर ब्रह्मा द्वारा असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल को सौंपी गई। हालांकि पूर्व शिक्षा सचिव रोहिणी बरुआ द्वारा सौंपी गई दूसरी रिपोर्ट की अनदेखी की गई। बरुआ ने अपनी रिपोर्ट पोस्ट द्वारा जमा की। इन दोनों रिपोर्ट की सामग्रियों में ज्यादा भिन्नता नहीं हैं, हालांकि बरुआ द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट अवैध आप्रवासियों द्वारा भूमि अधिग्रहण के ख़तरे को लेकर ज़्यादा तथ्यात्मक है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा लगता है कि इन विचारों में अंतर इस बात से प्रेरित होते हैं कि आप्रवासी मुद्दे पर कितना ज़ोर दिया जाना चाहिए।

दोनों रिपोर्टों में जो सहमति थी वह ये कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित कुछ क़ानून पुराने थे, जबकि अन्य उचित रूप से लागू नहीं किए जा रहे थे। इन सिफारिशों में उजागर किए गए मुद्दे निम्न थे:

1. आप्रवासी

2. अतिक्रमणकारियों की बेदखली

3. कृषि आय

4. भूमि सुधार

आप्रवासी के मुद्दे पर दोनों रिपोर्टों पर सहमति है कि असम में भूमि सुधारों तथा भूमि के किसी सार्थक पुनर्वितरण को केवल नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजेन्स (एनआरसी) के अद्यतन होने के बाद ही लागू किया जा सकता है, बांग्लादेश के साथ प्रत्यावर्तन संधि में भारत के प्रवेश करने - असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं, और विदेशियों का पता लगाने और वापस भेजने के साथ किया जा सकता है। यहां समस्या यह है कि भारत को यह कैच -22 की स्थिति में रखता है। एक तरफ अगर भारत बांग्लादेश के साथ प्रत्यावर्तन संधि के लिए आक्रामक रूप अपनाता तो ये देश अन्य अनुकूल व्यापार भागीदारों में बदल सकता है। हालांकि, अगर भारत इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं करता तो ये नई दिल्ली की ओर असमिया नाराज़गी को जागृत करने में मदद कर सकते हैं।

इन समितियों ने वन भूमि, चाय वाले क्षेत्र में भूमि, चार भूमि, मंदिर भूमि, सत्रा भूमि, और वक्फ भूमि से अतिक्रमण हटाने की सिफारिश की है। उन्होंने इंगित किया था कि अतिक्रमण करने वालों की दो श्रेणियों हैं: अवैध आप्रवासी अतिक्रमणकर्ता और बाढ़ और अपरदन से आंतरिक रूप से विस्थापित। निर्दिष्ट वन भूमि के साथ-साथ चार भूमि से अतिक्रमणकर्ता से को हटाने का कारण पारिस्थितिक कारकों पर है। चार जलोढ़ गाद के जमा होने से बने नदी के द्वीप हैं। चार तीन प्रकार के होते हैं: स्थायी द्वीप, अर्द्ध-स्थायी द्वीप, और अस्थायी द्वीप। इस समिति ने अस्थायी चार से सभी लोगों को बेदखल करने की सिफारिश की। अर्द्ध-स्थायी चार अगर चार साल के बाद नहीं समाप्त होते हैं तो उसे वितरित किया जा सकता है। वितरण के लिए स्थायी चार को भूमि का हिस्सा बनने की सिफारिश की गई थी।

इन रिपोर्टों ने चाय क्षेत्र में अतिक्रमण करने वालों को बेदखल करने की सिफारिश की। दिलचस्प बात यह है कि चाय के क्षेत्र में उनके द्वारा कब्ज़ा किए गए भूमि पर केवल उपयोगिता अधिकार है। ये भूमि वास्तव में सरकारी है। हालांकि, इस क्षेत्र में पूरी तरह से खेती नहीं की जाती है, और वास्तव में बहुत सारी भूमि पर वन लगाई जाती है। इस समिति ने शेष भूमि को वापस सरकार को स्थानांतरित करने के लिए कानून में संशोधन करने की सिफारिश की है अगर इसे चाय के क्षेत्र में लेने के चार साल बाद खेती नहीं की जाती है। धार्मिक ट्रस्ट द्वारा लिए गए भूमि के संबंध में समिति ने सत्र और मंदिरों द्वारा लिए गए भूमि से अतिक्रमण हटाने की सिफारिश की। दूसरी तरफ वक्फ संपत्ति के संबंध में समिति ने वक्फ संपत्ति से निपटारे के लिए स्थानीय मुस्लिमों का एक बोर्ड गठन करने की सिफारिश की। इस बोर्ड को वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की निगरानी करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका इस्तेमाल उनके उद्देश्य के लिए किया जाता है।

कृषि आय के मुद्दे पर इन रिपोर्टों ने पाया कि हालांकि असम के लगभग 80 प्रतिशत लोग किसान थें, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा नगण्य था। इस शिर्ष में कोल्ड स्टोरेज की सुविधाओं में सुधार करने, बीज और उपकरणों तक पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित करने, कृषिगत कार्यों से संबंधित बड़े शैक्षिक कार्यक्रमों और कार्य नैतिकता को सुनिश्चित करने के लिए सिफारिश की गई थी। साथ ही साथ सामूहिक खेती और बहु-फसल को प्रोत्साहित करने को लेकर भी सिफारिश की गई।

भूमि सुधारों के लिए यह सिफारिश की गई थी कि सरकार द्वारा वितरित कृषि भूमि का आधार वर्तमान में कानून द्वारा प्रति व्यक्ति अनिवार्य 8 बिघा (लगभग 3 एकड़) के बजाय 5 बिघा(लगभग 2 एकड़) होना चाहिए। जबकि मौजूदा कानून भूमिहीन को भूमि वितरित करने को लेकर भी है, इस समिति ने सीमांत भूस्वामी को शामिल किया है जिससे कि वे 5 बिघा तक भूमि प्राप्त कर सकें। विरोध यह है कि सभी भूमि को फिर से वितरित किया जाना चाहिए और केवल स्थानीय लोगों को आवंटित किया जाना चाहिए। हालांकि यह विरोध असम भूमि तथा राजस्व विनियमन, 1886 (एएलआरआर) के अध्याय दस में शामिल व्यक्तियों की श्रेणियों पर लागू नहीं होते है। यह प्रावधान कुछ निश्चित वर्ग के लोगों को भूमि प्राप्त करने तथा भूमि रखने की अनुमति देता है। ये भूमि समतल जनजातीय, पहाड़ी जनजातीय, चाय बागान जनजातीय, संताल, नेपाली कृषक-चरवाहा और अनुसूचित जातियों को प्राप्त करने और रखने की अनुमति देता है। हालांकि, इस समिति ने अनुसूचित जाति से पहले 'स्थानीय' डालने के इस प्रावधान में संशोधन की भी सिफारिश की। संक्षेप में, भूमि सुधार से संबंधित ये सिफारिश पूरी तरह से यह सुनिश्चित करने से संबद्ध है कि कृषि भूमि को जनजातीय से गैर-जनजातीय में स्थानांतरित नहीं किया जाए। एएलआरआर के अध्याय दस के तहत संरक्षित वर्ग से किसी गैर-संरक्षित वर्ग को, तथा स्थानीय व्यक्ति से एक गैर-स्थानीय व्यक्ति को।

रिपोर्ट्स को सबसे दिलचस्प बनाता है वह यह कि इसने कानूनी रूप से 'स्थानीय' को परिभाषित करने का प्रयास किया। हैं। शब्दकोश में 'स्थानीय' की परिभाषा के माध्यम से, यूएनओ की परिभाषा के साथ-साथ विभिन्न हितधारकों के विचारों को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने निम्नलिखित विशेषताओं की सिफारिश की:

 

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असम में कृषि भूमि से संबंधित भारत के अन्य राज्यों के नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने के अलावा इस परिभाषा को जो दिलचस्प बनाता है वह ये कि अगर इस परिभाषा को अपनाया जाता है तो यह बराक घाटी में असम के बंगाली भाषी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। दूसरी ओर चूंकि बराक घाटी ऐतिहासिक रूप से सिलहट का एक हिस्सा है,इसलिए सिल्हेटी भाषा में पुनरुत्थान दिखाई दे सकता है। असम में बिष्णूपुरिया मणिपुरियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, जब तक कि यह स्वीकार नहीं किया जाता कि वे जिस क्षेत्र में रहते हैं वह कभी मणिपुर के पुराने साम्राज्य का हिस्सा था।

हालांकि, जब तक कि विधानसभा के समक्ष रिपोर्ट नहीं रखी जाती है तब तक संभवतः अलमारी में रखे इस पर धूल ही जमा होगा। अद्यतन होने की प्रक्रिया में एनआरसी के साथ, और असम अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के साथ, नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहा है, ये तीनों मुद्दें अंतःस्थापित हो गए हैं। वे समुदाय जिनकी पहचान उनकी भूमि है उनकके लिए भूमिहीन होना सामाजिक मौत है।

brahma committee
Assam
NRC

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