NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
बस और मेट्रो मुफ़्त : ये क़दम शोषित वर्ग के लिये तोहफ़ा है!
ये क़दम अच्छा-बुरा कुछ भी हो सकता है, लेकिन देखते हैं कि लोगों के ज़ेहन में क्या सवाल हैं और उनका जवाब क्या हो सकता है!
सत्यम् तिवारी
05 Jun 2019
सांकेतिक तस्वीर
फोटो साभार : पंजाब केसरी

जब से इंसानी नस्ल की शुरुआत हुई है, तब से ही हम इंसानों को दो श्रेणी में बांट दिया गया है। ये श्रेणी है ताक़तवर और कमज़ोर की। ये दो वर्ग हैं: एक, जो ज़ुल्म करता है; दूसरा जो ज़ुल्म सहता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है दुनिया के दो प्रमुख लिंग: मर्द और औरत। बदक़िस्मती से, औरतों को हमेशा से प्रताड़ित किया जाता रहा है, और ऐसा करने वाले मर्द रहे हैं। इसके अलावा ये श्रेणी आर्थिक स्तर पर भी बांटी गई है, अमीर-ग़रीब, अनपढ़-शिक्षित, गँवार-शहरी, वगैरह वगैरह...
इस ताक़तवर और कमज़ोर की श्रेणी का नुक़सान ये भी है, कि जब कमज़ोर वर्ग को किसी तरह का फ़ायदा पहुँचाया जाता है, तो ताक़तवर वर्ग को उससे दिक़्क़तें होना शुरू हो जाती हैं।
ऐसा ही कुछ दो दिन पहले भारत की राजधानी दिल्ली में हुआ है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने एक घोषणा की है कि दिल्ली में महिलाओं के लिए बस और मेट्रो में यात्रा जल्द फ्री कर दी जाएगी। केजरीवाल ने ये भी कहा है कि जो महिलाएँ किराया देने में सक्षम हैं, वो किराया दे सकती हैं।
दुर्भाग्य से दिल्ली को "रेप कैपिटल" भी कहा जाता है, और इसके अलावा भी यहाँ छेड़-छाड़, आए दिन लड़कियों पर हमले होते ही रहते हैं। केजरीवाल ने अपने इस क़दम को महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण क़दम बताया है। सुरक्षा के मामले को बेहतर तरीक़े से समझाने के लिए आम आदमी पार्टी की सदस्य आतिशी ने फ़ेसबुक पोस्ट लिख कर अपनी बात रखी है।
दिल्ली मेट्रो और डीटीसी बसों में सफ़र करने वाली ज़्यादातर जनता, ज़ाहिर तौर पर वो है जो आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं है। जब महिलाओं की बात आती है, तो उनके साथ एक और मसला है, वो है सुरक्षा का। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ आये दिन महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं, वहाँ बसों और मेट्रो का किराया मुफ़्त करने का ये फ़ैसला इसलिये ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि मेट्रो, ज़ाहिर तौर पर डीटीसी बसों या प्राइवेट बसों से ज़्यादा सुरक्षित है। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि दिल्ली सरकार डीटीसी बसों में भी सीसीटीवी कैमरा लगाने की योजना पर काम कर रही है, और बताया गया है कि नवंबर के महीने तक डीटीसी बसों में सीसीटीवी कैमरे लग जाएंगे। इससे पहले केजरीवाल सरकार ने बसों में होमगार्ड नियुक्त किए थे, जिसके बाद से बसों की घटनाएं काफ़ी हद तक कम हुई हैं।
इस विषय पर तथ्यों के आधार पर बात करने से ज़्यादा ये ज़रूरी है कि लोगों की मानसिकता पर बात की जाए। ये क़दम अच्छा-बुरा कुछ भी हो सकता है, लेकिन देखते हैं कि लोगों के ज़ेहन में क्या सवाल हैं और उनका जवाब क्या हो सकता है! 

Screenshot_2019-06-05-15-34-49-089_com.facebook.katana.png

"मुफ़्त मेट्रो नहीं, सुरक्षित मेट्रो चाहिये"

मैंने जिस वर्ग भेद की बात शुरू में की थी, अब उसका उदाहरण देने का वक़्त आ गया है। ये भेद है, अमीर और ग़रीब का, अनपढ़ और शिक्षित का। सोशल मीडिया, जो आज सबसे बड़ा मंच है अपनी बात रखने का, वहाँ के लोग, जिसमें ज़्यादातर पढ़ी-लिखी, कॉलेज जाने वाली या नौकरी करने वाली 'अमीर' लड़कियाँ शामिल हैं; कह रही हैं कि किराया कम करने से कुछ नहीं होगा, हमें सुरक्षित मेट्रो चाहिये।
हमारी दिक़्क़त ये है, कि जब हम सरकार की किसी नीति की बात करते हैं तो हम उसका प्रभाव सिर्फ़ अपने ऊपर देखते हैं, उस वर्ग के ऊपर नहीं देखते जो इस समाज में सबसे ज़्यादा संख्या में है, लेकिन वो कुछ बोल नहीं सकता। वो बोल नहीं सकता क्योंकि वो हमारी तरह पढ़ा-लिखा, बुद्धिजीवी नहीं है, वो हमारी तरह किताबें पढ़ कर नहीं बैठा है। ये वो वर्ग है, जिस पर सरकार की किसी भी नीति का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। वो असर अच्छा भी सकता है, बुरा भी।
सुरक्षित मेट्रो की बात करने वाली महिलाएँ वो हैं जो घर से समृद्ध हैं, जिनके लिए मेट्रो का किराया दे पाना कोई बड़ी बात नहीं है। बल्कि उनके लिए ओला-ऊबर का भी किराया दे पाना कोई बड़ी बात नहीं है। ये लोग उन कामकाजी महिलाओं के बारे में भूल गए हैं, जिनके लिए रोज़ का 100 रुपये किराया दे पाना, बहुत बड़ी बात है और बहुत मुश्किल है। इस पर हम सब बुद्धिजीवी ये कहेंगे कि 'तो वो बस में जाया करें न!', और इसी एक जुमले पर हमारी सच्चाई खुल कर सामने आ जाती है।
दरअसल ये 'एलिटिज़म' की बात है, ये मसला है इसका कि हमसे छोटा वर्ग, जो मेट्रो जैसे 'पॉश' वाहन में बैठने के लिये समृद्ध नहीं है, वो अब हमारे साथ मेट्रो में बैठेगा! हम लोग असहज होने लगे हैं, हमें समझ नहीं आ रहा है कि हम कैसे दक्षिणी दिल्ली में रहते हुए, वज़ीरपुर की झुग्गियों में रहने वाले लोगों का सामना कर पाएंगे!
बता दें कि मेट्रो और बसों के अलावा दिल्ली में ग्रामीण सेवा, फ़ीडर बसें वगैरह भी चलती हैं। फ़ीडर बस की सुरक्षा का मामला ये है कि कुछ ही दिन पहले किसी आदमी ने एक लड़के का लिंग भींच लिया था। महिलाओं के साथ ये हमले निश्चित रूप से ज़्यादा होते हैं। तो उन फ़ीडर बसों से ज़्यादा सुरक्षित डीटीसी बसें हैं, और उनसे भी ज़्यादा सुरक्षित मेट्रो है। ख़ुद सोचिये कि वो महिलाएँ जो पैसों की कमी की वजह से रोज़ फ़ीडर बसों में जाती हैं, और कोई उनके स्तन, उनके कूल्हे भींचा करता है, वो अब सुरक्षित महसूस करते हुए मेट्रो में जा सकेंगी। 

IMG_20190605_153540.jpg

"मर्दों के लिये फ़्री क्यों नहीं किया!"

ताक़तवर और कमज़ोर का जो विभाजन था, उसी में एक पहलू ये है कि ताक़तवर वर्ग 'oneup-manship' से ग्रस्त रहता है। ये बात दुनिया के मर्दों के बारे में एकदम सही है, ये वो क़ौम है जिसने दुखों में भी औरतों को नीचा दिखाया है। यही हुआ है इस क़दम के बाद। हर जगह मर्द ये कह रहे हैं कि मर्दों के लिये मुफ़्त क्यों नहीं किया किराया, मर्द भी आर्थिक रूप से कमज़ोर होते हैं, वगैरह वगैरह!
बात इसमें कोई ग़लत नहीं हैं। पुरुष भी आर्थिक रूप से कमज़ोर होते हैं, ये एकदम सच है। लेकिन हम जिस समाज में रह रहे हैं, वहाँ दुर्भाग्यवश, मर्द ज़्यादा सुरक्षित हैं। औरतें कम सुरक्षित हैं, ये बात अब ऐसी हो गई है कि इसके लिये किसी डाटा की भी ज़रूरत नहीं है।
पुरुषों को अगर मेट्रो का किराया देने में मुश्किल आती है, तो उनके पास ऐसे विकल्प हैं जहाँ उनकी सुरक्षा किसी भी तरह से दांव पर नहीं लगेगी, जबकि बदक़िस्मती से महिलाओं को ये क़ुव्वत हासिल नहीं हो सकी है। मर्दों के पास ये विकल्प हैं, कि वो कितनी भी रात को ग्रामीण सेवा, ऑटो, बसों में जा सकते हैं, लेकिन कितनी महिलाएँ दिल्ली में ऐसा कर सकती हैं, ये एक बड़ा सवाल है!

आतिशी ने अपने पोस्ट में लिखा है कि मेट्रो किराया बढ़ने के बाद से महिलाओं पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ा था। हम उन महिलाओं की बात कर रहे हैं, जो उस वर्ग से आती हैं जहाँ उन्हें बहुत सारी चीज़ें करने की आज़ादी हासिल नहीं है। किराया बढ़ने पर महिलाएँ, पैदल तक चलने पर मजबूर हो गई थीं।
देखा जाए तो आप के इस क़दम से महिलाएँ ज़्यादा संख्या में बाहर निकल सकेंगी, काम पर जा सकेंगी, स्कूल-कॉलेज आसानी से जा सकेंगी।
दिल्ली में चुनाव अगले साल होने वाले हैं, विपक्षी पार्टियों ने केजरीवाल पर इल्ज़ाम लगाए हैं कि ये क़दम चुनावों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। हमारी राजनीति की एक विफ़लता ये देखने से पता चल जाएगी, कि किसी ने भी। इस क़दम की तारीफ़ नहीं की है!
हमारे समाज में महिलाओं की जगह हमेशा अंत में रही है। वो अंत में खाना खाती हैं, अंत में सोने जाती हैं, अंत में नहाती हैं, अंत में बोलती हैं, अंत में उनसे बात की जाती है; ऐसे में केजरीवाल सरकार का ये क़दम ज़ाहिर तौर पर महिलाओं के लिये एक सशक्तिकरण का भाव लेकर आया है। साथ ही, केजरीवाल ने ये विकल्प भी छोड़ा हुआ है कि जो मुफ़्त में जाना नहीं चाहता है, वो अपना किराया दे सकता है।
ये क़दम एक राजनीतिक स्टंट भी हो सकता है, लेकिन क्या इससे महिलाओं को कुछ फ़ायदा मिलेगा? इसका जवाब है हाँ!
और अगर कोई सरकार राजनीति के नाम पर ही सही शोषित और कमज़ोर वर्ग को सुविधाएं देने में सक्षम है, तो उसमें बुरा क्या है?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Delhi
Delhi Metro
Free Metro
free bus and metro
Arvind Kejriwal
delhi election
BJP
Congress

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रपति के नाम पर चर्चा से लेकर ख़ाली होते विदेशी मुद्रा भंडार तक

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

ख़बरों के आगे-पीछे: पंजाब पुलिस का दिल्ली में इस्तेमाल करते केजरीवाल

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : …अब साइकिल भी आतंकवादी हो गई...और कूकर...और मोटरसाइकिल!
    21 Feb 2022
    एक चुनाव की ख़ातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साइकिल को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश आमतौर पर पसंद नहीं की जा रही है। मज़दूर-कामगार के लिए तो आज भी साइकिल ही उनकी मोटरसाइकिल और कार है। सोशल…
  • lalu
    भाषा
    चारा घोटाला : डोरंडा कोषागार गबन मामले में दोषी लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद की सज़ा
    21 Feb 2022
    रांची स्थित विशेष सीबीआई अदालत  ने डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये के गबन के मामले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद और 60 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनायी।
  • up
    अजय कुमार
    यूपी से बाहर का मतलब केवल बंबई और दिल्ली नहीं है बल्कि सऊदी, ओमान और कतर भी है!
    21 Feb 2022
    "योगी के समर्थक योगी के पांच काम गिनवा देंगे तो मेरा वोट योगी को चला जाएगा।"
  • hum bharat ke log
    नाज़मा ख़ान
    हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है
    21 Feb 2022
    नफ़रत के माहौल में तराने बदल गए, जिस दौर में सवाल पूछना गुनाह बना दिया गया उस दौर में मुसलमानों से मुग़लों का बदला तो लिया जा रहा है। लेकिन रोटी, रोज़गार, महंगाई के लिए कौन ज़िम्मेदार है ये पूछना तो…
  • European Union
    अब्दुल रहमान
    यूरोपीय संघ दुनियाभर के लोगों के स्वास्थ्य से बढ़कर कॉर्पोरेट मुनाफे को प्राथमिकता देता है 
    21 Feb 2022
    अपनी आबादी के अधिकांश हिस्से का टीकाकरण हो जाने के बावजूद कोविड-19 संबंधित उत्पादों पर पेटेंट छूट को लेकर अनिच्छा दिखाते हुए यूरोपीय संघ के नेतृत्व ने एक बार फिर से बिग फार्मा का पक्ष लिया है और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License