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राजनीति
बुलंदशहर को मुज़फ़्फ़रनगर बनाने की साज़िश थी?
“यह घटना सुनियोजित लगती है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गौ हत्या के नाम पर चुनावों से पहले सांप्रदायिक हालात पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं। 2013 में लोकसभा चुनावों से पहले हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगें सबको याद है।’’
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
06 Dec 2018
riot

बुलंदशहर से बीजेपी सांसद भोला राम ने बुलंदशहर हिंसा के मुख्य आरोपी की सराहना की है। भोला राम ने कहा “हम तभी कुछ कह सकते हैं जब इस घटना से जुड़े सभी तथ्य सामने आयें। गौ हत्या के खिलाफ कड़े क़ानून की वकालत करना कोई गुनाह नहीं है। वह आँखें खोलने वाला और सम्मानजनक काम कर रहा था। उसने हमारा ध्यान इस घटना की ओर आकर्षित किया। बाकी मामले की अभी जांच चल रही है।’’

ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने मॉब लिंचिंग के आरोपियों का फूल-माला पहनाकर स्वागत किया था।

इनके अलावा बाकी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद ने भी इस मामले में जांच की मांग की है और अपने कार्यकर्ता को निर्दोष बताया है। वहीं मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और बीजेपी दोनों ही कत्ल हुए पुलिस अफसर से ज़्यादा गौ हत्या पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। मुख्यमंत्री की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया है “जिन्होंने गौ हत्या की है उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।”

योगी आदित्यनाथ की ओर से जारी इस विज्ञप्ति में कहा गया था कि गैरकानूनी कत्लखानों पर बैन लगाया जाएगा और जो भी गौ हत्या के गुनाहगार हैं उनपर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसमें वहाँ हुई युवक सुमित की मौत का तो जिक्र था लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या का कोई ज़िक्र नहीं था। हालांकि इससे पहले कत्ल हुए पुलिस अफसर के परिवार को मुआवज़ा देने और परिवार में किसी को नौकरी देने की बात भी कही गयी थी, लेकिन मुख्यमंत्री इस शोक संतप्त परिवार से मिलने बुलंदशहर नहीं गए। हां आज गुरुवार को मुख्यमंत्री ने मृतक इंस्पेक्टर के परिवार को लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर बुलाकर बात की।

सोमवार को पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या इलाके में गौकशी की खबर के बाद हुए बवाल के दौरान हुई। दरअसल इलाके में कथित तौर पर कुछ मरी हुई गायें मिल थीं, जिनको लेकर गाँव के लोग आरोप लगाने लगे कि इनकी हत्या हुई है। इसको लेकर बुलंदशहर-गढ़मुक्तेश्वर मार्ग पर जाम लगाया गया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर लोगों को समझाने का प्रयास किया। इससे पहले मामला संभलता, बताया जाता है कि कथित हिन्दुत्ववादी संगठन बजरंग दल इत्यादि के कार्यकर्ता वहां इकट्ठा हो गए और पूरे मामले के गर्मा दिया। इन लोगों ने पुलिस चौकी पर हमला कर दिया और वहां पथराव के बाद आग लगा दी। इसी दौरान इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को गोली मारी गयी और उनकी मौत हो गई। आपको बतादें के इस्पेक्टर सुबोध अखलाक मामले में भी जाँच इनचार्ज रह चुके हैं । उनकी मौत को इससे जोड़कर भी देखा जा रहा है । उनकी बहन के भी इसे लेकर कई सवाल उठाए हैं ।

पूरे उपद्रव में वहाँ मौजूद एक और युवक सुमित की भी मौत हो गयी है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक यह युवक हमलावर भीड़ के साथ ही था, इस तरह का एक वीडियो भी वायरल हुआ है जिसमें सुमित हाथ में ईंटें लिए दिख रहा है। हालांकि उसके घरवालों ने इस आरोप को नकारा है । उनके मुताबिक सुमित उस समय अपने एक दोस्त को छोड़ने गया था और इस पूरी हिंसा से उसका कोई संबंध नहीं।

इस हिंसा का मुख्य आरोपी योगेश राज नाम का शख्स है जो बजरंग दल का नेता है। इसके साथ दो और व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है और वह भी हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े हुए हैं।

वहीं दूसरी तरफ पुलिस ने कथित गौ हत्या के आरोप में 7 लोगों को आरोपी बनाया है। इसमें से दो को गिरफ्तार भी किया गया है जिनकी उम्र सिर्फ 11 और 12 वर्ष है।

लेकिन यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नेता सांप्रदायिक हिंसा के आरोपियों के साथ खड़े हुए हो। यह भी पहली बार नहीं है जब लोकसभा के चुनावों के पहले इस तरह के बवाल हुए हों और उन्हें लेकर बड़ा दंगा भड़काने की कोशिश हुई हो और उसमें हिंदुत्ववादी सगठनों से जुड़े लोग शामिल हों।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पोलित ब्यूरो सदस्य प्रकाश करात ने कहा “यह घटना सुनियोजित लगती है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गौ हत्या के नाम पर चुनावों से पहले सांप्रदायिक हालात पैदा करने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं। 2013 में लोकसभा चुनावों से पहले हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगें सबको याद है।’’

अगस्त से सितंबर 2013 के बीच हुए मुज़फ्फ़रनगर दंगों में 62 लोगों की मौत हुई थी और 50000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए थे। ये दंगें भी एक छेड़छाड़ की घटना को सांप्रदायिक रूप देने और अफवाह के चलते हुए थे। इन दंगों को करवाने में भी बीजेपी और विश्व हिन्दू परिषद के कुछ नेताओं पर आरोप हैं। इनमें बीजेपी के विधायक संगीत सोम, उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश राणा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री संजीव बालियान, बीजेपी विधायक भारतेन्द्र सिंह, बीजेपी विधायक उमेश मलिक और विश्व हिन्दू परिषद की नेता साध्वी प्राची भी शामिल हैं। योगी सरकार हाल में इन सबके खिलाफ केस वापस लेने का प्रयास कर रहे हैं।

इन दंगों के बाद बीजेपी ने न सिर्फ इस इलाके से लोकसभा का चुनाव जीता, बल्कि इससे उन्हें उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक माहौल बनाने में मदद मिली। जिससे वह 2014 के लोक सभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 71 पर विजयी रहे। हालांकि अब हवा बदल चुकी है और इसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए कैराना उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। इससे पहले भी  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने गृह नगर गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्य अपनी सीट फूलपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी को हार से नहीं बचा सके।

 

 

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