NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बुनियादी अधिकारों और सुरक्षा से वंचित जम्मू और कश्मीर में बच्चे सबसे ज़्यादा पीड़ा झेल रहे हैं
जेकेसीसीएस की रिपोर्ट बताती है कि नागरिकों में डर पैदा करने के लिए राज्य उन बच्चों को कैसे अपना हथियार बना रहा है जो व्यवस्था में असंतोष व्यक्त करना चाहते हैं।
सुरंग्या कौर
04 Apr 2018
Translated by महेश कुमार
Jammu & Kashmir

जम्मू और कश्मीर में राज्य द्वारा हिंसा की अलग-अलग घटनाओं में साल में सिर्फ तीन महीनों के भीतर पाँच अवयस्क अपनी जान गवाँ चुके हैं, जिसमें कथुआ, जम्मू में आठ साल की लड़की का बलात्कार और हत्या का भीषण मामला भी शामिल है। कश्मीर में करीब तीन दशकों के संघर्ष में बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा पर ध्यान आकर्षित करने के लिए, जेकेसीसीएस (जम्मू कश्मीर कोयलेशन फॉर सिविल सोसाइटी) ने विभिन्न तरीकों का एक दस्तावेज़ तैयार किया है जिसमें राज्य में बच्चों के मौलिक अधिकारों का नियमित आधार पर उल्लंघन किया जा रहा है। यह, यह भी दिखाता है कि नागरिकों में डर पैदा करने के लिए राज्य के हाथों में बच्चे  एक उपकरण/हथियार बन गया है, जो इस वयवस्था में असंतोष व्यक्त करना चाहते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के भारी सैन्यकरण की वजह से, जम्मू-कश्मीर के बच्चों के मामले में सभी छह गंभीर उल्लंघनों को सामने लाया गया है, जिन्हें 1989 के संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकारों में सम्मिलित किया गया है: बच्चों की हत्या और अपंगता, भर्ती और बच्चों का प्रयोग, यौन हिंसा, अपहरण, स्कूलों और अस्पतालों पर हमले, और मानवीय सहायता को उन तक न पहुँचने देना।

रिपोर्ट मुख्य रूप से पिछले पन्द्रह वर्षों के घटनाक्रम/मामलों पर केंद्रित है। इस अवधि के दौरान बच्चों की तीन सौ अठारह हत्याएं दर्ज की गई हैं। राज्य में इस अवधि में ये सभी नागरिक हत्याओं का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा है।

हत्याओं के कारण

जम्मू-कश्मीर में नागरिकों पर हिंसा की जो वजहें हैं बच्चों के लिए भी कम या ज्यादा वहीँ वजहे हैं। मुठभेड़ों, हिरासत में हत्या, जबरन गायब करवाना, आतंकवादी हमलों, विस्फोटों और राज्य सेना और आतंकवादियों के बीच क्रॉस फायरिंग के दौरान बच्चों की मृत्यु दर्ज की गई है।

बच्चे सशस्त्र बलों के हाथों यातनाओं से बच नहीं पाए हैं। पिछले पन्द्रह वर्षों में, सात बच्चों ने शारीरिक यातना के लिए अपनी जान गंवा दी, सशस्त्र बलों द्वारा हिरासत में लिए गए नाबालिगों सहित अधिकांश नागरिक, हिरासत में गंभीर शारीरिक यातना से गुजर रहे हैं। हालांकि, यातना की कहानियां ध्यान आकर्षित करने में विफल रहती हैं, जब तक कि वे मृत्यु तब्दील न हो जाए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस अवधि में सशस्त्र बलों ने चार बच्चों को पीट-पीट कर मार दिया, यह दिखाते हुए कि बच्चे की मौत को अप्रत्यक्ष या भारी क्षति नहीं कहा जा सके, जब बच्चे हिंसा के प्रत्यक्ष लक्ष्य होते हैं।

लक्षित हमलों के अलावा, कई बच्चों ने ग्रेनेड विस्फोटों, आईईडी, लैंडमाइंस आदि के विस्फोटों में भी अपना जीवन खो दिया है। नौ बच्चों की उस वक्त मृत्यु हो गई है जब वे पड़े गोले के साथ खेल रहे थे। यह राज्य में तैनात सशस्त्र बलों की बेहद गैर जिम्मेदाराना हरकत की सीमा को दर्शाता है।

बाल पीड़ितों की उम्र

पिछले 15 वर्षों के दौरान अपने जीवन को खो चुके बच्चों में से करीब आधा, 12 वर्ष से कम आयु के थे। उनमें से तेरह नवजात शिशु थे - दो साल या उससे छोटे थे। "पिछले पंद्रह वर्षों में जम्मू और कश्मीर में हिंसा का सबसे कम उम्र का शिकार 10 महीने का बच्चा इरफान था, जिसे  2010 में मार डाला गया था, तब जब उसकी मां सरकारी बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच दांगिवा, बारामूला में फंस गई थी।"

यौन हिंसा

जम्मू-कश्मीर में दस्तावेजों में यौन हिंसा का मुद्दा कठिन है। ऐसी घटनाओं से जुड़ी पीड़ितों के लिए बोलना सामाजिक रूप से कलंकित होना मुश्किल बनाता है। यह जटिल हो जाता है, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया अपराधियों का पक्ष लेती हैं, अर्थात कई मामलों में, सशस्त्र बल इसमें शामिल होते हैं।

जो मामले रिपोर्ट हुए है, सशस्त्र बलों की तरफ आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सबसे बड़ा और सबसे घृणित मामला है, कुनान-पोशपोरा में 1991 में सामूहिक बलात्कार का है। सभी उम्र की महिलाएं, जिनमें 8 साल की उम्र की लड़कियां भी सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार का  शिकार बनती हैं। सभी प्रयास सबूतों को दफनाने और जांच में देरी करने के लिए किए जाते हैं। 27 साल बाद भी, कुनान पॉशपोरा के पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई अब भी खत्म नहीं हुई है।

राज्य में यौन हिंसा ने पुरुषों को भी प्रभावित किया है, जिनमें नाबालिग लड़के भी शामिल हैं। रिपोर्ट श्रीनगर में 2009 के एक मामले की ओर इशारा करती है जिसमें 9 से 19 वर्ष की उम्र के 11 लड़के थे, "इन लड़कों ने पुलिस अधिकारियों को यातनाओं देने और एक-दूसरे के साथ यौन क्रिया करवाना का गभीर आरोप लगाया यह घटना  महाराज गुंज पुलिस थाने में पुलिस हिरासत में होने के दौरान हुयी थी।"

शिक्षा पर प्रभाव

राज्य में नियमित गड़बड़ी के चलते, शैक्षणिक वर्ष के एक महत्वपूर्ण भाग के लिए स्कूलों और शिक्षा संस्थानों को बंद कर दिया जाता है। अब भी, कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर झड़पों के चलते, अधिकारियों ने स्कूलों और कॉलेजों को बंद रखने का फैसला किया है। यदि बंद नहीं किया जाता है, तो शिक्षा के स्थानों को अक्सर सैन्य ठिकानों, पूछताछ केंद्रों और सैन्य कार्यों के रूप में उपयोग किया जाता है।

यद्यपि सेना के कब्जे वाले स्कूलों की संख्या अब सार्वजनिक चिल्लाहट के बाद कम हो गई है, लेकिन व्यापक सैन्यकरण शिक्षा के प्रति प्रतिरोधी है। रिपोर्ट में कहा गया है, "सुरक्षा के लिए खतरे के अलावा, जो कि स्कूलों और कॉलेजों के बड़े पैमाने पर सैन्यकरण से बच्चों के लिए खतरा बन गया है, शैक्षणिक संस्थानों के आसपास सशस्त्र बलों के शिविरों की निकटता के कारण बच्चे निगरानी और यौन हिंसा के शिकार होते हैं। हंडवाड़ा में नाबालिग लड़की का 2016 का यौन उत्पीड़न एक डरावना मामला है। पीड़ित को उसके स्कूल के बाहर यौन हमला किया गया। यह मामला सैन्यकरण और यौन हिंसा के बीच के संबंधों के अंतरंग चित्रण को प्रस्तुत करता है। "

कानून जो इसे सक्षम करते हैं, और बच्चों की सुरक्षा के अधिकारों की कमी

जबकि लोक सुरक्षा कानून (पीएसए) और सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) जैसे कठोर कानूनों को अधिकारों का गंभीर उल्लंघन करने और सशस्त्र बलों को दण्ड से मुक्त रखने के लिए इस्तेमाल किया रहा हैं, बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए उचित संरचनाओं की कमी के कारण स्थिति गंभीर होती जा रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक नागरिक अशांति के क्षेत्र में बच्चों के संरक्षण के लिए 2010 में बाल अधिकार संरक्षण (एनसीपीसीआर) द्वारा जारी दिशा निर्देशों के अलावा, कोई मानक परिचालन प्रक्रिया नहीं है। यहां तक कि एनसीपीसीआर के दिशानिर्देश बहुत अंतर पैदा करने में विफल रहते हैं। एनसीपीसीआर के प्रवक्ता ने न्यूजक्लिक को बताया कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति एनसीपीसीआर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आई है, और रिपोर्ट के निष्कर्षों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया  है।

पीएसए राज्य अधिकारियों को किसी भी समय परीक्षण के बिना दो साल तक किसी को भी हिरासत में लेने की अनुमति देता है। बच्चों को अक्सर पीएसए के तहत मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जाता है। हालांकि, कई घटनाओं को रिपोर्ट में बताया गया है जिसमें बच्चों की उम्र 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के रूप में दर्ज है और दर्ज की गई है।

राज्य जेके किशोर न्याय अधिनियम 1997 को लागू करने में असफल रहा है। 2013 में संशोधित अधिनियम ने हर जिले में किशोर न्याय बोर्ड के गठन के लिए नियम रखे हैं। हालांकि, जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पूरी कश्मीर घाटी में केवल एक किशोर घर है।

बच्चों सहित राज्य के नागरिकों के मूल अधिकारों के संरक्षण में निहित केंद्रीय और राज्य सरकारों के साथ, रिपोर्ट में बच्चों के कुछ संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है। रिपोर्ट में स्कूलों को ग़ैरफ़ौजीकरण, बाल न्याय अधिनियम के कार्यान्वयन और यह सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की गई है कि अन्य उपायों के बीच किसी को भी अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाएगा।

JKCCS
Jammu & Kashmir
Public Safety Act
NCPCR

Related Stories

कश्मीरः जेल में बंद पत्रकारों की रिहाई के लिए मीडिया अधिकार समूहों ने एलजी को लिखी चिट्ठी 

पब्लिक सेफ़्टी एक्ट: मनमुताबिक़ हिरासत में ली जाने की कार्रवाईयां जारी, नए कश्मीर में असहमति की कोई जगह नहीं

'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक

फ़ोटो आलेख: ढलान की ओर कश्मीर का अखरोट उद्योग

बाल अधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का परीक्षण किया, अल्पसंख्यक समूह की अगले क़दम की योजना

कोविड ने 9 हज़ार से ज्यादा बच्चों को बेसहारा, अनाथ कर दिया: NCPCR

कांग्रेस की सेहत, कश्मीर का भविष्य और भीमा-कोरेगांव का सच!

जम्मू और कश्मीर : सरकार के निशाने पर प्रेस की आज़ादी

पहले हुए बेघर, अब गया रोटी का सहारा

कश्मीर की जनजातियों को बेघर किया जा रहा है


बाकी खबरें

  • Sameer Wankhede illegally tapped phones: Nawab Malik
    भाषा
    समीर वानखेड़े ने गैरकानूनी तरीके से फोन टैप कराए: नवाब मलिक का आरोप
    26 Oct 2021
    मलिक ने कहा, ‘‘समीर वानखेड़े मुंबई और ठाणे के दो लोगों के जरिए कुछ लोगों के मोबाइल फोन पर गैरकानूनी तरीके से नजर रख रहे हैं।’’ मलिक अपने दामाद की गिरफ्तारी के बाद से लगातार वानखेड़े पर निशाना साध रहे…
  • SC
    भाषा
    लखीमपुर खीरी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को गवाहों के संरक्षण का निर्देश
    26 Oct 2021
    शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को पत्रकार की पीट-पीटकर हत्या करने के मामले से जुड़ी दो शिकायतों के संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा, ‘‘ राज्य को इन मामलों में अलग-अलग जवाब…
  • Defence Unions
    रौनक छाबड़ा
    रक्षा कर्मचारी संघों का केंद्र सरकार पर वादे से मुकरने का आरोप, आंदोलन की चेतावनी 
    26 Oct 2021
    कर्मचारी महासंघों ने ने केंद्र को उनकी सेवा शर्तों के साथ हेराफेरी नहीं करने के अपने वादे से मुकरने का दोषी ठहराया है।जिसे देखते हुए श्रमिक संघों ने अपनी 11 मांगों को सूचीबद्ध करते हुए “आंदोलन का…
  • cricket
    भाषा
    आईसीसी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में कुमारा और दास पर जुर्माना
    26 Oct 2021
    मैदान पर तीखी बहस के बाद दोनों क्रिकेटर एक दूसरे पर प्रहार करने की कोशिश में थे जिससे अंपायरों और बाकी खिलाड़ियों को दखल देना पड़ा ।
  • diwali
    भाषा
    दिल्ली सरकार का 27 अक्टूबर से ‘पटाखे नहीं दीया जलाओ’ अभियान
    26 Oct 2021
    मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 सितंबर को पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘‘जीवन बचाने के लिए आवश्यक’’ है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License