NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बंगाल चुनाव : बीजेपी की हार वक़्त का इशारा साबित हुई है
हालांकि बीजेपी को भारी वोट मिला है, लेकिन वह धार्मिक, भाषाई, जाति या इंसानी जातीयता के आधार पर ख़ास ध्रुवीकरण करने में पूरी तरह से विफल रही है।
सूहीत के सेन 
04 May 2021
Translated by महेश कुमार
बंगाल चुनाव : बीजेपी की हार वक़्त का इशारा साबित हुई है
प्रतिनिधि छवि। सौजन्य: मिंट 

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के लिए हुई 'महा-प्रतियोगिता', में हिंदुत्व कट्टरपंथियों और गोदी मीडिया जिसे वैसे तो मुख्यधारा का मीडिया कहा जाता है, ने बहुत ज़ोर लगाया। बावजूद इस सब के सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने दो-तिहाई बहुमत के साथ 215 सीटें जीत ली है, जो 2016 में जीती गई 211 सीटों अधिक हैं। 

टीएमसी के अवास्तविक स्ट्राइक रेट के उलट जो बात हुई वह यह कि कार्यवाहक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी के बागी - सुवेंदु अधिकारी यानि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार से नंदीग्राम में हार गई हैं। ममता ने सुवेंदु की जीत को "संदिग्ध" स्थिति में जीती गई सीट कहा है।

इसके कई कारण मौजूद हैं जिनकी वजह से महा-चुनाव वांछित ऊंचाइयों को नहीं छु पाया, जिनमें से सबसे प्रमुख और पहला कारण यह रहा कि भाजपा ने जो कहानी गढ़ी थी उसके जीतने की कोई संभावना नहीं थी, और जो तस्वीर बहुतायत में ओपिनियल पोल या एग्जिट पोल ने पेश की उसे गंभीरता से लेने की जरूरत ही क्या थी। हम अधिकांश कारणों पर ध्यान देंगे, लेकिन सबसे पहली और सबसे दिलचस्प बात यह है कि टीएमसी को सभी ‘समुदायों’ का व्यापक समर्थन मिला है, शायद इसे बेहतर ‘निर्दिष्ट श्रेणियां' कहा जाना चाहिए जिसमें उसे 50 करीब प्रतिशत मत मिले हैं। 

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो न केवल भाजपा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में विफल  रही, बल्कि वह भाषाई, जाति या इंसानी जातीयता के आधार पर भी ऐसा करने में विफल रही है। उदाहरण के लिए, टीएमसी ने बंकुरा, झाड़ग्राम, पशिम मेदिनीपुर और पुरुलिया जिलों में जीत हासिल की जहां भाजपा ने जंगलमहल सहित इन इलाकों में अपना आधार तैयार किया था।  हालांकि अंतिम संख्या अभी तक उपलब्ध नहीं है, भाजपा ने 2019 में इस क्षेत्र में जीत दर्ज़ की थी लेकिन टीएमसी ने इन 40 सीटों में से आधी पर जीत दर्ज़ कर ली है। 

इसी तरह, हिंदी भाषी मतदाता, कोलकाता, उत्तर 24 परगना, हावड़ा और हुगली के कुछ हिस्सों में केंद्रित हैं, उदाहरण के लिए उन्होने भी बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी के लिए भारी मतदान किया है, यही वजह है कि टीएमसी के 2019 में इस क्षेत्र में कई लोकसभा सीटें हारने के बावजूद भाजपा का सफाया कर दिया है।

फिर से कहा जाए तो, भाजपा द्वारा हर तरह के ध्रुवीकरण की कोशिश के बावजूद खासकर धार्मिक आधार पर कामयाब नहीं हो पाई – ऐसी रणनीति जो काफी हद तक सफल नहीं हो सकी। प्रारंभिक आंकड़े बताते हैं कि जब टीएमसी के इर्द-गिर्द मुस्लिम वोटों का अप्रत्याशित  जमावड़ा हो हुआ तो हिंदूओं का वोट भी समान रूप से विभाजित हो गया। वोटिंग का यह पैटर्न टीएमसी के वोट और बीजेपी के वोट में लगभग 10 प्रतिशत के अंतर को दर्शाता है जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 2 प्रतिशत वोट अधिक मिला है। 

बेशक, सवाल यह है कि क्या यह बीजेपी का आधा भरा है या आधा खाली है। एक तरफ, 2016 में उसने केवल 10 प्रतिशत वोट पर मात्र तीन सीटें जीतीं थी, जबकि इस बार उसने 38 प्रतिशत वोट के साथ 75 सीटें जीती हैं। जिस भी तरीके से आप इसे देखते हैं, यह उनके समर्थन में बड़ा उछाल है। अधिकांश स्थितियों में अधिकांश पार्टियां इससे कुछ संतुष्टि हासिल करेंगी।

दूसरी ओर, यह वास्तविक तुलना नहीं है, जिसकी वजह से राज्य में 2019 के लोकसभा परिणामों की जरूरत है। याद रखें कि बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीतने के बाद, भाजपा ने 121 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी, जिसमें उनका वोट शेयर केवल 40 प्रतिशत से अधिक था। इस प्रकार, इसने लगभग 2.5 प्रतिशत वोट और 45 सीटों के वोट शेयर खो दिया है, ऐसा इसलिए है क्योंकि भाजपा के जहरीले ध्रुवीकरण के प्रयासों ने टीएमसी के पीछे सभी प्रकार के मतदाताओं को एकजुट कर दिया। बड़ी संख्या में ऐसे लोगों ने जिन्होंने कभी टीएमसी को वोट नहीं दिया था, उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि ये प्रगतिविरोधी, बहुमतवादी और सत्तावादी ताकतों को सत्ता से दूर रखने का सबसे अच्छा तरीका था। कुछ हद तक, यह वोट सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में शालीनता बरतने का वोट था। यह कई टिप्पणीकारों की गलत धारणाओं का बंगाल की तरफ से उसकी असाधारणता का जवाब भी था।

ग्लास को आधा खाली देखने की एक और वजह बंगाल को जीतने की बीजेपी की हताशा है, जिसके कारण उसने टीएमसी पर गंदगी उछाली थी। निस्संदेह, भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई) और और सभी तरह की कानून-प्रवर्तन एजेंसियां इस गंदगी से ओत-प्रोत थी, जो भाजपा की एक अतिरिक्त-कानूनी शाखा की तरह काम कर रही थी। 

लेकिन, इसमें भी एक कहानी अटक गई। हालांकि, टीएमसी ने कथित रूप से चुनाव आयोग पर  नंदीग्राम के परिणाम को "ठगने" का आरोप लगाया है, जिसके ज़रीए आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दरबार में श्रद्धा अर्पित करने की कोशिश की, जबकि उनकी नंदीग्राम की धांधली वास्तव में टीएमसी की मददगार साबित हुई।  

ममता बनर्जी का नंदीग्राम में नुकसान, भले ही उन प्रक्रियाओं के माध्यम से भी तय हो जाए जिन्हे अभी तक अपनाया नहीं गया है, दो कारणों से उसे बहुत नुकसान नहीं होगा। सबसे पहला, व्यापक सार्वजनिक धारणा यही है कि ममता के साथ बेईमानी की गई है। दूसरा, बनर्जी को दो निर्वाचन क्षेत्रों में से एक में निर्वाचित होने की जरूरत है, जिनमें दो उम्मीदवारों की मृत्यु के कारण चुनावों स्थगित हो गया था। 

दूसरी तरफ, चुनाव आयोग के पक्षपात ने इस धारणा को मजबूत कर दिया कि भाजपा एक ऐसी पार्टी हैं जिसे बंगाल जैसे राज्य को जरूरत नहीं है और उनके पास बेतहाशा वित्तीय संसाधन हैं और सरकारी एजेंसियों पर गैरकानूनी नियंत्रण है, जिन्हे वैसे तो स्वायत्त माना जाता है, लेकिन वे काम भाजपा के इशारे पर करती हैं, और नतीजतन इनका इस्तेमाल कर बंगाल जीतने की कोशिश की गई है। सबसे बड़ा - और सबसे मूर्खतापूर्ण - निर्णय पांच सप्ताह में आठ चरणों में बंगाल चुनाव कराने का था।

स्पष्ट रूप से ऐसा इसलिए किया गया ताकि मोदी, अमित शाह और उनके लग्गे-भग्गों जैसे कि  भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और भयंकर रूप से जहरीले अजय मोहन बिष्ट, यानि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री उर्फ योगी आदित्यनाथ, को बड़ी सभाओं और रैलियों के माध्यम से बंगाल में कारपेट बोंबिंग करने का मौका और समय मिल जाए। 

इसने टीएमसी के आरोपों को पंख लगा दिए कि बीजेपी बाहरी लोगों की पार्टी है, जिनका बंगाली लोकाचार या बंगाल से कोई संबंध नहीं है। बार-बार की जाने वाली चूक ने इस धारणा को अधिक मजबूत किया, और साथ ही इसने राज्य में भाजपा की शान में आई कमी को भी उजागर किया है।

जब पूरे देश में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर फैलने लगी और चुनाव आयोग ने आठ चरणों के “पागलपन’ से भरे चुनाव के निर्णय से चिपका रहा, तो यह आयोग की भारी गलती थी। इसने इस धारणा को मजबूत कर दिया कि ईसीआई बस यही चाहती है कि किसी तरह इसकी कठपुतली पार्टी चुनाव जीत जाए बाकी उसे मानव जीवन के नुकसान या इंसानी पीड़ा की कोई क़द्र नहीं है।  

उत्तर प्रदेश में भी राज्य के चुनाव आयोग ने व्यावहारिक रूप कुछ ऐसा ही काम किया है, जिसमें उसने पंद्रह दिनों में चार चरणों 15-29 अप्रैल तक पंचायत चुनाव कराने का निर्णय लिया है जबकि महामारी अधिक विनाशकारी उछाल पर है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि बीजेपी वहां भी कीमत चुकाएगी।

अंत में, यह कहना ठीक होगा कि ऐसा कर भाजपा खुद को ही कोडा मार रही है। दिल्ली और बंगाल के बीच दो लोगों का लगातार आना जाना, और महामारी नियंत्रण के आधिकारिक कामकाज का इकट्ठा होना, उसी बकवास अंदाज़ में सुनने की थकान जो अक्सर परिचित नहीं है और ऐसे जैसे बिना किसी अच्छे कारण के हत्या कर देने की भाषा ने हिंदुत्व के गद्दारों से खेल छिन लिया। 

हालाँकि, इस चुनाव को बीजेपी विरोधी वोट के रूप में मानना आसान होगा। जीत का पैमाना इतना बड़ा है कि एक रचनात्मक लोकलुभावनवाद की आड़ लेकर और एक तरह की कल्याणकारी नीति को बढ़ावे देने से आम नागरिक को ममता बनर्जी के साथ जोर-शोर से खड़े होने में मदद मिली है। लेकिन उसे इस प्रवृत्ति को संस्थागत या वास्तविक बनाना होगा, बजाय इसे चुनावी गणित के विकल्प के रूप में उपयोग करने के ज़मीन पर लाना होगा। 

अंत में, हमें नए ध्रुवीकरण पर ध्यान देना चाहिए। जिसमें वाम मोर्चा और कांग्रेस का पूर्ण सफाया हो गया है और भाजपा ने उनकी जगह ले ली है जोकि अपने आप में बहुत बुरी खबर है। यह बात दोनों पर आमद होती है कि दोनों इसे चेतावनी को समझें। चाहे कुछ भी हो, उन्हें नई शुरुआत के लिए तैयार रहना चाहिए।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bengal Elections: BJP’s Half-Empty Glass a Sign of the Times

Bengal Elections
Bengal results
mamata banerjee
BJP
communal polarisation
BJP Vote Share
Nandigram

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License