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खेल
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क्या क्रिकेट पर आधारित शर्त लगाने वाले खेल और फेंटसी  लीग गेम केंद्र सरकार के लिए सिर्फ़ राजस्व का ज़रिया हैं?
विराट कोहली, जसप्रीत बुमराह, ऋषभ पंत, अजिंक्या रहाणे और आर अश्विन मौजूदा टेस्ट टीम का हिस्सा हैं, यह खिलाड़ी अलग-अलग बेटिंग कंपनियों और फेंटसी  लीग के प्रतिनिधि भी हैं।
जसविंदर सिद्धू
08 Oct 2021
Sports batting

क्या क्रिकेट और फेंटसी  लीग पर आधारित खेल केंद्र सरकार के लिए केवल राजस्व का एक ज़रिया हैं? पिछले महीने इंग्लैंड-भारत टेस्ट सीरीज़ के प्रसारण के विशेषाधिकार रखने वाली सोनीलिव ने दर्शकों के सामने क्रिकेट से जुड़े इस तरह के शर्तिया खेलों के विज्ञापन की बाढ़ लगा दी। कई बड़े क्रिकेट सितारों का गेमिंग कंपनियों से प्रचार-प्रसार संबंधी और लोगों को ऑनलाइन खेलने के लिए आमंत्रित करने का समझौता है। यह विज्ञापन मौजूदा आईपीएल के दौरान भी लगातार प्रसारित किए जाते रहे। 

भारत सरकार इन फेंटसी  खेलों और गेमिंग कंपनियों से 28 फ़ीसदी जीएसटी लेती है। लाइव क्रिकेट मैच के अलावा, कई मनोरंजन और ख़बरिया चैनल भी इनका विज्ञापन कर रहे हैं। 30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फ़ैसले पर मुहर लगाई जिसमें कहा गया था कि ड्रीम-11 में खेलने के लिए कुशलता की जरूरत होती है, इसलिए यह सट्टा नहीं है। अगर एक ऑनलाइन खेल में "कुशलता" की जरूरत होती है, तो वह वैधानिक होता है, सरकार उसके ऊपर 28 फ़ीसदी जीएसटी लगा सकती है।  

लेकिन कई विशेषज्ञ गेमिंग प्लेटफॉर्म के ज़रिए क्रिकेट पर लगने वाली शर्तों पर सवाल उठा रहे हैं। यह विशेषज्ञ इसे पारंपरिक सट्टे से कम नहीं समझते, जिसे "कौशल" की आड़ में खेला जा रहा है। जाने-माने खेल वकील विधुस्पति सिंघानिया कहते हैं, "यहां कुछ भी स्पष्ट नहीं है। कुछ भी काला-सफेद नहीं है।" वह आगे कहते हैं, "प्रसारक इन कंपनियों के विज्ञापनों को केवल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाते हैं, इस तरह के खेलों के विज्ञापन के ओटीटी पर प्रसारित होने से संबंधी किसी भी तरह के दिशा-निर्देश नहीं हैं।"

ऑनलाइन शर्त लगाने के खेल, क्रिकेट गेमिंग और इनके विज्ञापन प्रसारण को लेकर अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न नियम हैं। जैसे, सिक्किम और मेघालय खेलों पर शर्त लगाने को मान्यता देते हैं (हालांकि अपने नागरिकों को राज्यों में स्थापित कैसिनो में खेलने से प्रतिबंधित करते हैं), लेकिन दूसरे राज्य ऐसा नहीं करते। इस हफ़्ते कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के बाद ऑनलाइन शर्तिया खेलों और जुए पर प्रतिबंध लगाने वाला तीसरा राज्य बन गया। कर्नाटक द्वारा लगाए गए प्रतिबंध में जिक्र है, "कोई भी कृत्य जिसमें अज्ञात नतीज़ों पर पैसे का जोख़िम हो, जिसमें कौशल का खेल भी शामिल है।"

भारत में सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1867 खेल के मैचों पर लगने वाली शर्त के बारे में बात नहीं करता। सिंघानिया कहते हैं, "लेकिन सरकार पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई कर सकती है।" जुआ अधिनियम ऑनलाइन सट्टेबाजी की भी बात नहीं करता। 

मार्च में राज्य सभा के सदस्य और कांग्रेस नेता विवेक तन्खा ने "ऑनलाइन गेमिंग और शर्तों पर लगने वाले जीएसटी पर वित्त मंत्रालय से लिखित प्रतिक्रिया मांगी थी। उन्होंने पूछा था, "क्या हर खेल और हर शर्त पर लगाया जाने वाला 28 फ़ीसदी जीएसटी जुएं पर लगाया जाने वाला कर है। अगर ऐसा है, तो वज़ह बताई जाएं। अगर नहीं है, तो विस्तार से इस संबंध में जानकारी दी जाए?"

वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर, जो बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं, उन्होंने कहा, "कोई भी व्यक्ति जो किसी तरह की कर योग्य गतिविधि में संलिप्त है, उसे तय दर पर जीएसटी देना होगा। ड्रीम 11 जैसी साइट की गतिविधियां जीएसटी के तहत कर योग्य हैं। इसलिए उन्हें जीएसटी देना होता है और उनके ग्राहकों से भी इतना ही पैसा लिया जाता है। शर्त लगाने के मामले में शर्त पर 28 फ़ीसदी जीएसटी दर लगाई जाती है।"

इसका मतलब हुआ कि सरकार शर्त लगाने वाले खेलों को गैरकानूनी नहीं मानती। इसलिए शर्त लगाने पर आधारित खेलों पर कर लगाया जा रहा है। और शर्त लगाने पर मौजूदा दर 28 फ़ीसदी है। दूसरी तरफ़ सट्टेबाजी पूरी तरह गैरकानूनी गतिविधि है, इसलिए उस पर कर नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन शर्त लगाने और सट्टेबाजी के बीच यह अंतर "कौशल" और "ज्ञान" के आधार पर तय किया गया है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो गतिविधि शर्त लगाने के बजाए सट्टेबाजी के ज़्यादा पास होगी। सार्वजनिक जुआं अधिनियम, 1867 के आधार पर कई फ़ैसलों में यह प्रक्रिया तय की गई है।

लेकिन इसमें दर्शकों, खासकर युवा टीवी दर्शकों पर पढ़ने वाले प्रभाव को तस्वीर में नहीं लिया जा रहा है। कुछ लोगों का तर्क है कि ऐसी शर्तें जिसमें नगद भुगतान शामिल होता है, वे अवैधानिक हैं। उन्हें सट्टेबाजी की तरह ही देखा जाना चाहिए, जैसा कर्नाटक का कानून कर रहा है, और उन्हें अवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए। यह स्थिति ई-स्पोर्ट्स और दूसरी तरह की ऑनलाइन गेमिंग गतिविधियों ने और भी ज़्यादा जटिल बना दी है, फिलहाल इन गतिविधियों को जुएं या सट्टेबाजी में एक तरह का अपवाद माना जाता है। 

खेल वकील राहुल मेहरा कहते हैं, "शर्त लगवाने वाली कंपनियों के विज्ञापन का प्रसारण गैरकानूनी है। हमें कानून के हिसाब से चलना होगा और कानून कहता है कि भारत में शर्त लगाना प्रतिबंधित है। लेकिन कानून में कई सारी खामियां हैं। जैसे- आप शराब कंपनियों के छद्म विज्ञापन टीवी और रोड के आसपास लगे होर्डिंग पर देख सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि एक सरकार किसी अवैधानिक चीज पर कर कैसे ले सकती है। इसका मतलब हुआ कि आपने शर्त लगाने वाले खेलों को वैधानिक कर दिया है।"

अपने मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाब में ठाकुर ने कहा, "क्या कोई गतिविधि जुआ है या शर्त लगाने वाली गतिविधि है, यह उसकी समग्र प्रवृत्ति, तथ्यों और संबंधित कानून पर निर्भर करेगा।"

दिलचस्प है कि ऐसी सारे विज्ञापन एक चेतावनी जारी करते हैं, जो कुछ इस तरह होती है, "इस खेल में वित्तीय जोख़िम शामिल है और इसकी लत पड़ सकती है। कृपया जिम्मेदारी के साथ अपने जोख़िम पर खेलें।" यह चेतावनी बहुत छोटे शब्दों में स्क्रीन के किसी कोने में होती है। 

5 जुलाई, 2018 को विधि आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट जमा की, जिसका शीर्षक "लीगल फ्रेमवर्क: गैंबलिंग एंड स्पोर्ट्स बेटिंग इंकूलडिंग इन क्रिकेट इन इंडिया" था। यह रिपोर्ट जस्टिस बलबीर सिंह चौहान की अध्यक्षता में बनाई गई थी। कमेटी ने साफ़ कहा कि राज्य प्रशासन को जुएं, सट्टेबाजी और शर्त लगाने वाले खेलों पर पूरी तरह प्रतिबंध सुनिश्चित करना चाहिए। रिपोर्ट कहती है, "ऐसी गतिविधियों के रुकने या कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। कम से कम इन्हें नियंत्रित तो करना ही चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो कमेटी कहती है कि अगर इनके ऊपर पूर्ण प्रतिबंध संभव नहीं है, तो कम से कम नियंत्रण लगाया जाए। यही इन गैरकानूनी गतिविधियों के निवारण का तरीका होगा। विधि आयोग की यह रिपोर्ट फिलहाल युवा और खेल मामलों के मंत्रालय के पास परीक्षण के लिए मौजूद है, जिसके प्रमुख अनुराग ठाकुर हैं। 

पिछले दिसंबर में सूचना एवम् प्रसारण मंत्रालय ने एक सभी प्रसारकों और निजी चैनलों को एक सुझाव जारी किया, जिसमें किसी तरह की प्रतिबंधित गतिविधि को प्रोत्साहन ना देने की चेतावनी दी गई थी। यह सुझाव कहता है, "सूचना एवम् प्रसारण मंत्रालय के संज्ञान में आया है कि टेलिविजन पर बड़ी संख्या में ऑनलाइन गेमिंग, फेंटसी  खेलों और दूसरी चीजों के विज्ञापन आ रहे हैं। ऐसी चिंताएं जताई गई हैं कि यह विज्ञापन भ्रामक हैं, जो लोगों को वित्तीय और अन्य संलग्न जोख़िमों के बारे में साफ़ नहीं बताते हैं, साथ ही यह विज्ञापन संहिता का ठीक ढंग से अनुपालन भी नहीं करते हैं।"

2020 के आखिरी के 6 महीनों में कम से कम 5 लोगों ने कथित तौर पर क्रिकेट और फेंटसी  लीग ऐप में आईपीएल और दूसरे मैचों में शर्त लगाने के चलते खुदकुशी की है। सभी की उम्र 19 से 25 साल के बीच थी। उनमें से एक छात्र था, एक इंजीनियर और एक दूसरा व्यापारी था। लेख के लेखक द्वारा एक पुरानी जांच में पता चला है कि आईपीएल और क्रिकेट मैचों में पैसा हारने के बाद 2019 में 14 लोगों ने खुदकुशी कर जान दी थी। कई रिपोर्ट्स में अब भी खुदकुशी की वज़ह ऑनलाइन खेलों में भाग लेने के लिए लिया गया कर्ज़ बताया गया है। 

तन्खा ने संसद में एक और सवाल पूछा था। "क्या क्रिकेट खिलाड़ियों द्वारा प्रोत्साहित वेबसाइट, जैसे- ड्रीम 11, मोबाइल प्रीमियर लीग, माइ 11 सर्कल आदि का विश्लेषण किया गया है।" लेकिन पूर्व क्रिकेट प्रशासक ठाकुर ने इसका जवाब नहीं दिया। 

विराट कोहली, एम एस धोनी, जसप्रीत बुमराह, ऋषभ पंत, अजिंक्या रहाणे और आर अश्विन मौजूदा टेस्ट टीम में शामिल हैं, जो अलग-अलग क्रिकेट बेटिंग कंपनियों और फेंटसी  लीग के ब्रॉन्ड एंबेसडर हैं। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर और पूर्व टेस्ट कैप्टन सौरव गांगुली भी टीवी स्क्रीन पर आकर लोगों से इस तरह के खेलों को खेलने की अपील करते हैं। 

लेखक स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Are Betting Games Based on Cricket and Fantasy League Games Nothing but a Source of Revenues for the Central Government?

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