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भारत
राजनीति
भाजपा घोषणापत्र : लोगों से दूर होती एक पार्टी की कहानी...
उपलब्धियों का लंबा दावा, लेकिन सामाजिक न्याय, नौकरियों, काले धन पर कुछ भी नहीं, ये लोगों से तेज़ी से दूर होती एक पार्टी की कहानी है।
सुबोध वर्मा
09 Apr 2019
Translated by महेश कुमार
2019 चुनाव के लिए बीजेपी का संकल्प पत्र जारी करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह।
Image Courtesy : Indian Express

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा सोमवार को जारी किए गए घोषणापत्र में एक अप्रत्याशित समस्या दिखाई दी। जो यह दावा करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच वर्षों के शासन में, वस्तुतः सब कुछ किया जो उसने वादा किया था। लेकिन इसे फिर से वोटों को जीतने के लिए लोगों से कुछ वादा करना होगा। यदि आप पहले ही सब कुछ हासिल कर चुके हैं तो फिर आप क्या वादा करेंगे? या, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आप अपनी विफलता को मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो आप निराश लोगों पर कैसे विजय प्राप्त करेंगे?

भाजपा का घोषणापत्र विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की पूरी सामान्य संख्या से भरा हुआ है, "व्यापार करने में आसानी" रैंकिंग, राजमार्गों का निर्माण आदि पर। इनके बारे में वर्तमान में टेलीविजन और रेडियो पर लोगों के सिर पर ढोल पीटे जा रहे हैं। दर्जनों अध्ययनों और ज़मीनी रिपोर्टों से पता चला है कि ये दावे बढ़ा चढ़ा कर पेश किए जा रहे हैं। किसी भी मामले में, यदि लोगों को लाभ हुआ है, तो उन्हें इतनी मनुहार की आवश्यकता नहीं होती।

लेकिन जो चौंकाने वाला है - और हैरान भी करने वाला है - वह उनकी कुछ प्रमुख मुद्दों पर चुप्पी है जो देश को परेशान कर रही। हैरानी की बात है हर किसी राजनीतिक दल के पास यह समझदारी है कि आप इन मुद्दों पर चुप नहीं रह सकते हैं। लेकिन तब बतोलेबाज़ी के अपने नुकसान हैं। आईए, कुछ बड़ी चूकों पर एक नज़र डालें:

चूक 1: दलित व सामाजिक न्याय

अविश्वसनीय रूप से, यह कहने के अलावा कि "हम अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए मौजूद संवैधानिक प्रावधानों के तहत लाभ सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं" भाजपा और मोदी सरकार के पास दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचार, निजीकरण की वजह से घटते रोजगार के अवसरों, और उनके अपने कार्यकलापों की वजह से न्यायिक या कार्यकारी कृत्यों में चूक जिसकी वजह से इन सबसे उत्पीड़ित समुदायों के मूल अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया, के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है। वास्तव में, पूरे घोषणापत्र में एक बार भी सामाजिक न्याय का उल्लेख नहीं किया गया है।

एक जगह पर अनुसूचित जाति का उल्लेख सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के साथ किया जाता है, लगभग जैसे कि वे जाति उत्पीड़न के ज्वलंत मुद्दे को संबोधित करने में शर्म महसूस कर रहे हों।

पिछले पांच वर्षों के संदर्भ में आएं तो पाएंगे कि जब मवेशियों को लाने-ले जाने के लिए या उनके मृत शवों को संभालने के लिए कई दलित नौजवानों पर ज़ुल्म किया गया था, जब उच्चतम न्यायालय ने दलितों अत्याचारों के खिलाफ सुरक्षा के लिए बने एकमात्र कानून को बेअसर कर दिया था और उसके खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जब रोहित वेमुला की आत्महत्या से उच्च शिक्षा केंद्रों में सामाजिक अन्याय का गला घोंटने का मामला सामने आया और जब दलित युवा बेरोजगारी की वजह से गुस्से में थे  - यह चूक केवल असफलता को मानने का मुद्दा भर नहीं है। यह भाजपा की उस स्वीकारोक्ति के समान है कि वह वास्तव में दलितों के बारे में चिंतित नहीं है, या वह जाति उत्पीड़न की समर्थक है।

चूक 2: बेरोज़गारी

सर्वेक्षण लगातार दिखाते रहे हैं कि बेरोज़गारी (या उचित रोज़गार) देश भर के मतदाताओं की एकमात्र सबसे बड़ी चिंता है। यह चौंकाने वाली बात है –कि बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर है और शिक्षित युवाओं में यह सर्वकालिक उच्च स्तर पर है। 2014 के चुनाव प्रचार में वोट मांगते हुए मोदी ने हर साल एक करोड़ नौकरियों का वादा किया था।

फिर भी, बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र में इस आगलगाऊ संकट की झलक दिखाई देती है। जबकि अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो नौकरियों का कोई जिक्र नहीं मिलता है। युवाओं के बारे में बात करते हुए, घोषणापत्र कहता है कि भाजपा "भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य संचालक के रूप में पहचाने जाने वाले 22 'प्रमुख क्षेत्रों' को अधिक समर्थन प्रदान करके "रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी"; महिलाओं के बारे में बात करते हुए, यह कहता है कि भाजपा "महिलाओं के लिए बेहतर रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए उद्योगों और कॉर्पोरेटों को प्रोत्साहित करेगी"; और वगैहरा-वगैरहा।

यह भी सिर्फ आश्वस्त करने के लिए कि उद्यमियों को अधिक मुद्रा ऋण दिए जाएंगे, या वे सभी प्रयास किए जाएंगे ताकि "हमारे आकांक्षात्मक मध्यम वर्ग" को बेहतर रोजगार के अवसर मिलें, इस संबंध में भाजपा के घोषणापत्र में कुछ भी नहीं है। मोदी के एक करोड़ नौकरियों के वादे के बाद वे कोई भी वादा करने से डर रहे  हैं - या उन्हें लगता है कि मोदी ने नौकरियों के संकट को हल कर दिया है!

चूक 3: काला धन और भ्रष्टाचार

विदेशों से काला धन वापस लाने के 2014 के चुनावी अभियान का वादा याद है? नोटबंदी/विमुद्रीकरण याद है, जिसे सारे काले धन को खत्म करना था? याद करें चौकीदार ’मोदी’ जिसने खजाने की रक्षा का वादा किया था? मोदी और उनके अन्य पार्टी सहयोगियों के ट्विटर हैंडल में उपसर्ग के रूप में लगाने वाले विचित्र उपनाम चौकीदार को छोड़कर अब इसका ज़ायका खत्म हो गया है। 2019 के घोषणापत्र में भ्रष्टाचार मुक्त भारत पर एक छोटा सा खंड है जो विडंबना यह है कि आर्थिक रूप से भगोड़े अधिनियम को लागू करने का दावा करता है - जब विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे प्रमुख बैंक धोखाधड़ीकर्ता, कुछ 40 अन्य लोगों के साथ, खुशी से विदेश में बस गए हैं। इसमें कुछ अन्य उपायों का उल्लेख करता है और इसी के साथ शांत हो जाता है।

घोषणापत्र को पछाड़ते हुए खुद मोदी द्वारा लिखे गए 130 करोड़ भारतीयों को खुले पत्र में भाजपा की असली सोच का खुलासा होता है। भ्रष्टाचार के बारे में बात करते हुए, वह लिखते हैं कि बिचौलिए अब सत्ता के गलियारों में नहीं घूमते हैं और ध्यान दें - आधार और जन धन के द्वारा 8 करोड़ नकली लाभार्थियों को समाप्त कर दिया गया है। भ्रष्टाचार और क्रोनिज्म (अपने पसंदीदा पूँजीपतियों को लाभ पहुंचाना) भाजपा शासन में किस कदर घर कर गया है इसका अंदाज़ा आप रफ़ाल और अडानी के लिए विभिन्न अच्छे सौदों की पेशकश से लगा सकते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के एक उदाहरण के लिए नकली लाभार्थियों की संख्या को गलत तरीके से और झूठे आंकड़े के रुप में उपयोग करना अपने आप में मुद्दे से भटकना है? क्या मोदी को पता है कि देश में 56 लोगों की मौत भुखमरी से हुई है, जिनमें से कम से कम 25 वे थे जिन्हे आधार कार्ड (आधार का मिलान न होने की वजह से ) की वजह से राशन नहीं मिला था? मोदी के लिए, यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अब इस हद तक सिमित हो गई है।

किसान संकट

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर घोषणापत्र में उत्साह/विपुल से लिखा गया हैं लेकिन सब कुछ झूठ या बेबुनियाद  वादों पर आधारित हैं। यह सामान्य दावा करता है कि न्यूनतम फसल की कीमतें अब उत्पादन लागत से 1.5 गुना बढ़ा दी गई हैं, कुछ ऐसा वादा जो भाजपा ने 2014 में किया था। यह एक निर्लज झूठ है। उन्होंने जो किया है उसके मुताबिक उन्होंने उत्पादन की लागत को कम दिखा और ‘किराया और ब्याज लागत’ को छोड़ कर गणना की है। परिणामस्वरूप, आज भी किसान गहरे असंतोष में हैं। वास्तव में, इसीलिए छोटे और सीमांत किसानों की आय के समर्थन के लिए पीएम किसान योजना को आम चुनावों की घोषणा से कुछ हफ्ते पहले ही भाजपा द्वारा शुरू किया गया था!

भाजपा के कृषि एजेंडे को तबाह करने वाला एक और थका हुआ जुमला है –वह है, किसानों की आय को दोगुना करने का वादा। चौतरफा कृषि संकट के सामने, फसल की कीमतें गिरने की वजह से, कृषि-श्रमिकों की मजदूरी में गिरावट और बढ़ती लागत, खेती की आय में स्थिरता से बड़ा संकट पैदा हो गया है। फिर भी, मोदी सरकार आय को दोगुना करने का वादा करना जारी रखे हुए है, जैसे कि फिर से यह वादा किसानों को आश्वस्त करेगा।

इसके अलावा, बीजेपी ने बेबुनियाद वादों की झड़ी लगा दी है जैसा कि उसने 25 लाख करोड़ रुपये को कृषि में लगाने, सभी 12.5 करोड़ लघु और सीमांत किसानों को पेंशन देने, सभी किसानों को प्रधानमंत्री किसान योजना और पांच साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण देने का वादा किया है। पिछले पांच सालों में ये सब कुछ क्यों नहीं किया गया, किसान ये सवाल पूछने के लिए मजबूर हैं?

संघ का एजेंडा

यह किसी भी भाजपा के घोषणापत्र के लिए ज़रूरी है कि वह अपने संरक्षक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को खुश करने के लिए पुराने कई दावों को दोहराता है, और उम्मीद करता है कि इससे भाजपा का कट्टरपंथी आधार अलग नहीं होगा। ये दावे - अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, यूनिफॉर्म सिविल कोड, धारा 370 को निरस्त करना और अनुच्छेद 35 ए को रद्द करना - ये सभी इस बार भी शामिल हैं।

इसके अलावा, घोषणापत्र में कहा गया है कि नागरिकता संशोधन विधेयक को वापस लाया जाएगा और कहा कि सबरीमाला मुद्दे को उच्चतम न्यायालय में उचित रूप से लड़ा जाएगा और यह कि वे "विश्वास और आस्था  से संबंधित मुद्दों को संवैधानिक संरक्षण" प्रदान करेंगे।

क्या लकवाग्रस्त सोच और प्रतिगामी विचारधारा का यह गोलमाल भाजपा को आने वाले चुनावों में जीत दिला सकता है?

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