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भारत
भाजपा संस्कृति में स्मार्ट शहर का झुनझुना
वीरेन्द्र जैन
09 May 2015
अपनी पद स्थापना के लगभग एक वर्ष बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौ स्मार्ट शहरों के निर्माण स्थलों की सूची तैयार कर ली है। आमतौर पर ये वे नगर हैं जो स्वायत्तशासी निकायों में नगर निगम की श्रेणी में आते हैं। घोषणा के इस एक साल बाद भी न तो अधिकारी और न ही राजनेता स्मार्ट शहर की परिकल्पना को पूरी तरह समझ पाये हैं इसलिए कोई भी इस पर अपनी अधिकृत टिप्पणी दे सकने की स्थिति में नहीं है। सच तो यह है कि यह स्वर्ग की तरह का एक ऐसा सपना है जिसे सब अपनी अपनी तरह से देख कर मन बहला सकते हैं और अपना लोभ लाभ सोच मन के मोदक खा सकते हैं।
 
इसकी जो प्राथमिक परिकल्पना मन में उभरती है उसके अनुसार विद्युत, जल, हवा. धूप, गन्दगी निस्तारण, पर्यावरण, पार्किंग, सामुदायिक भवन, झूलाघर, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र, दैनिन्दिन वस्तु बाजार, आदि से सम्बन्धित सभी तरह की समस्याओं से मुक्त बहुमंजली आवास और प्रदूषणमुक्त कई लाइनों की सुचारु आवागमन प्रणाली से परिपूर्ण मार्गों वाले नगरों का निर्माण करना होगा। इसके साथ ही इस नगर में रहने वालों के लिए क्षेत्र विशेष के अनुसार रोजगार के केन्द्र भी समानुपात में बनाने होंगे तब ही उक्त स्मार्ट नगर में रहने वाले उस स्तर का जीवन यापन करने लायक धन अर्जित कर सकेंगे और आदर्श आवास स्थल में रहने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। यदि यह काम आज की तारीख से ही प्रारम्भ कर दिया जाये तो भी बसे हुये नगरों के समानांतर विकास का ऐसा कार्य पूरा करने में बारह से पन्द्रह वर्ष लग जायेंगे बशर्ते सामान की आपूर्ति बनी रहे और कोई नागरिक या न्यायिक बाधा पैदा न हो। उल्लेखनीय है कि खाली जगह में नया नगर बनाना बसे हुये नगर को नया बनाने की तुलना में आसान होता है। अगर नया नगर बनाना हो तो निकट में ही उपयुक्त भूमि का समुचित अधिग्रहण करना होगा।
                                                                                                                              
 
भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर पाँच वर्ष में चुनाव होते हैं इसलिए किसी भी लम्बी अवधि की योजना के लिए व्यापक सहमति जरूरी होती है और ऐसी सहमति प्राप्त करने के लिए योजना को अपनी अच्छाइयों, बुराइयों सहित स्पष्ट होना जरूरी होता है। अभी तक इस योजना के बारे में विपक्ष तो दूर की बात है सत्ता पक्ष के लोगों तक को ठीक तरह नहीं मालूम है तो इसके कार्य निष्पादन में लगने वाले समय की कल्पना ही की जा सकती है।
 
जिन दिनों संसद चलती है उन दिनों देखा गया है कि संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेवारी सम्हाल रहे वैंक्य्या नायडू हर तर्क के उत्तर में दिन में कम से कम दस बार सदस्यों को यह याद दिलाते रहते हैं कि उनकी पार्टी को जनादेश मिला हुआ है इसलिए उनकी सरकार जो कुछ भी कर रही है वह ठीक है और उसके खिलाफ किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं है। यदि ऐसा ही है तो न तो सदन की कार्यवाही की कोई जरूरत रह जाती है और ना ही न्यायालयों की कोई भूमिका शेष बचती है। जबकि सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी को कुल 31 प्रतिशत मत ही मिले हैं और राज्यसभा में उन्हें बहुमत प्राप्त नहीं है। देश के पूर्वी और दक्षिणी भाग से उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम है। जनादेश भी उन्हें कुशल प्रबन्धन के कारण मिला हुआ है जो स्वाभाविक रूप से मिले जनसमर्थन जैसा नहीं है, जैसा कि 1971 के आम चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गाँधी को मिला था, या दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों में अरविन्द केजरीवाल को मिला है। उनके बहुत सारे सदस्य केवल रणनीतिक रूप से चुप हैं और संकेत मिलते हैं कि वहाँ शांति नहीं अपितु सन्नाटा है, जिसे कभी कभी शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोग तोड़ते रहते हैं।
 
भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में भले ही विकास और कुशल प्रशासन को अपनी घोषणाओं में शामिल किया हो किंतु उसकी मूल पहचान एक दक्षिणपंथी कट्टर हिन्दुत्ववादी दल की ही है जिसने सत्ता में आने के लिए न केवल साम्प्रदायिकता को बार बार भड़काया है अपितु अपने पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के माध्यम से उसमें सक्रिय भागीदारी भी की है। विकास और कुशल प्रशासन के जिस नारे पर लोकसभा में उनके मतों में जो वृद्धि हुयी थी वह पिछले दस महीनों के शासन में घट चुकी है जिसके संकेत दिल्ली विधानसभा समेत बंगाल के नगर निकाय चुनावों में दिखायी दे गये हैं। दूसरी ओर उनका परम्परागत समर्थन म.प्र., छत्तीसगढ, गुजरात, राजस्थान आदि में बना हुआ है। इसका अर्थ यही है उनकी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथी दल के रूप में तो बनी रही किंतु विकासवादी कुशल प्रशासक के रूप में नहीं बन सकी है। क्या इस पहचान और मान्यताओं वाले लोगों के साथ स्मार्ट शहरों की सम्भावित दुनिया की ओर देश को ले जाया जा सकता है? क्या स्मार्ट शहर के लोगों से चार हिन्दू बच्चे पैदा करने का आवाहन किया जा सकता है? क्या स्मार्ट शहर के लोगों के बीच रामजादों और हरामजादों का विभाजन किया जा सकता है? क्या स्मार्ट नगरों के अस्पतालों का उद्घाटन करते समय मनुष्य की देह में हाथी के सिर का प्रत्यारोपण करने की पौराणिक कथा के माध्यम से हमारे प्राचीन ज्ञान का महिमामंडन किया जा सकता है। क्या स्मार्ट शहर के लोगों को यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि गीता पढने से न आँखों पर चश्मा लगेगा और न ही डायबिटीज होगी। क्या स्मार्ट शहर के बच्चों को बतरा जैसे शैक्षिक सलाहकारों द्वारा अनुशंसित पुस्तकें पढवायी जा सकती हैं। क्या स्मार्ट शहर के लोग कैसे वस्त्र पहिनें यह कट्टरपंथी संगठनों से पूछने जा सकेंगे? क्या स्मार्ट शहर के लोग रंगभेद के शिकार होंगे? क्या स्मार्ट शहर के लोग अपने खाद्य पदार्थों के चुनाव के लिए कट्टरपंथी संगठनों पर निर्भरता रख सकेंगे। स्मार्ट शहर क्या इंडिया के होंगे या स्वयंभू जगतगुरु भारत के? क्या भाजपा संस्कृति और अनुमानित स्मार्ट शहर एक साथ चल सकते हैं।
 
वैक्य्या नायडू की मोदी सरकार जो स्मार्ट शहर योजना ले कर आयी है वह सरकार केवल मनोहर पारीकर और किरण रिजजू से ही बनी हुयी नहीं है अपितु इसमें केबिनेट मंत्री के रूप में सुशोभित सुश्री उमा भारती निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह भी हैं तथा बहुमत जुटाने में भगवा वेषधारी स्वामी सच्चिदानन्द साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, सुमेधानन्द सरस्वती, चाँदनाथ आदि दर्ज़न भर लोग तो साफ दिखायी देते हैं। यह भी नहीं भूला जा सकता कि पूरी भाजपा के जो लोग एक स्वर से अडवाणीजी का भजन करते थे वे ही लोग संघ द्वारा नजर फेरते ही मोदी मोदी करने लगे थे। अभी तक किसी को भी यह पता नहीं है कि संघ परिवार का स्मार्ट शहरों के बारे में क्या रुख है और इसमें बजरंगदल, व विहिप का स्थान कहाँ होगा और शाखाएं लगाने व शोभा यात्राएं निकालने का मार्ग क्या होगा?
 
जो लोग बात बात में लोकतंत्र और जनादेश की दुहाई देते हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि स्मार्ट शहर की माँग किस जनता ने कब की थी? क्या जनता इसे स्वीकार करने के लिए अपने पुराने संस्कार छोड़ने को तैयार हो चुकी है? मैं जब एक बैंक में अधिकारी था जिसका मुख्य कार्यालय और प्रशिक्षण केन्द्र कानपुर में था तब प्रशिक्षण कार्यक्रमों में चेन्नई से एक आफीसर आता था और वह कानपुर जो देश का पाँचवा बड़ा शहर माना जाता था, अपनी नाक सिकोड़ते हुए कहता था- बिगेस्ट विलेज आफ इंडिया। सच था कि इंडिया का मैनचेस्टर कहलाने वाला महानगर कानपुर कभी अपना देशी चरित्र नहीं छोड़ पाया। आज भी भोपाल समेत बहुत सारी प्रादेशिक राजधानियों में असंख्य निजी और सार्वजनिक वाहन चलते हैं पर उत्तर भारत की राजधानियों के लोगों को अभी तक ट्रैफिक सेंस नहीं आया और जहाँ पर कोई ट्रैफिक चैकिंग नहीं होती वहाँ वाहन जंगली जानवरों की तरह मनमाने ढंग से चलते हैं। क्या स्मार्ट शहर के योजनाकारों के पास आम जनता को स्मार्ट करने की कोई योजना है जिससे स्मार्ट शहर में जगह जगह पान की पीक नहीं मिले और लोग पब्लिक टायलेट का प्रयोग करें। 
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
भाजपा संस्कृति
समाज
स्मार्ट शहर

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