NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भाजपा सरकार ने आरटीआई अधिनियम में की सेंध लगाने कि कोशिश
आरटीआई की दिशा में काम करने वाले लोग और संगठन इस संशोधन का कड़ा विरोध कर रहे हैं I
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
25 Jul 2018
RTI

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को लाने में राजस्थान के मजदूर वर्ग और अरूणा रॉय, निखिल डे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का बहुत बड़ा योगदान था। हमारा पैसा, हमारा हिसाब के नारे के साथ राजस्थान से शुरू हुए इस आंदोलन ने पूरे देश को आर.टी.आइ के रूप में बड़ा तोहफा दिया। 

जब संसद में आरटीआई अधिनियम को पारित किया गया तब इसे देश के नागरिक  को मिले  ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रस्तुत किया गया। देश के लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली बार ही हो रहा था की आम नागरिक अपनी पास की नाली के बनने में लगे खर्च से लेकर प्रधानमंत्री कार्यलय से देश के मसलों से जुड़ी तमाम जानकारी माँग सकता। 

अधिनियम को प्रभावी बनाने की पहली और ज़रूरी शर्त यह है कि सूचना आयोग जोकि सूचना देने के लिए अधिकृत है उसे सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा जाए। वहीं तमाम संवैधानिक संस्थाओं में हस्तक्षेप कर उन्हें कमज़ोर करने पर आमादा मौजूदा भाजपा सरकार का अगला निशाना आरटीआई को सरकारी तोता बनाना नज़र आता है। बीते कुछ समय से  अटकलों के बज़ार से यह बात उभर कर आ रही थी कि सरकार संसद के मानसून सत्र में आर.टी.आई अधिनियम में संशोधन करने के लिए विधेयक लाने जा रही है। मगर वो संशोधन क्या होंगे इस बाबत कोई भी जानकारी सरकार द्वारा साझा नहीं की गई थी।

लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2018 को सार्वजनिक कर दिया है। विधेयक के अनुसार केंद्रीय सूचना आयुक्तों और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन और उनके कार्यकाल को केंद्र सरकार द्वारा तय करने का प्रावधान रखा गया है।

अभी तक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के वेतन के बराब था। वहीं राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त का वेतन चुनाव आयुक्त और राज्य सरकार के मुख्य सचिव के वेतन के बराबर था।

यह भी पढ़े - सूचना आयोगों में ख़ाली पड़े पद लोगों के 'सूचना के अधिकार’ का गला घोंट रहे हैं

आरटीआई एक्ट के ‘अनुच्छेद 13 और 15’ में केंद्रीय सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं निर्धारित करने की व्यवस्था दी गई है। केंद्र की मोदी सरकार इसी में संशोधन करने के लिए बिल लेकर आ रही है।

आरटीआई की दिशा में काम करने वाले लोग और संगठन इस संशोधन का कड़ा विरोध कर रहे हैं। एक अखबार की खबर के मुतबिक मौजूदा सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलू ने सभी सूचना आयुक्तों को एक पत्र लिख कर कहा कि ये संशोधन सूचना आयोगों को कमजोर कर देगा. उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त से गुजारिश की कि वे सरकार से आधिकारिक रूप से कहें कि सूचना का अधिकार क़ानून में संशोधन का प्रस्ताव वापस लिया जाए।
 
वहीं वेतन के अतिरिक्त सरकार सूचना आयुक्तों के कार्यकाल में भी बदलाव करने की तैयारी में है। आरटीआई एक्ट के अनुच्छेद 13 और 16 के अनुसार कोई भी सूचना आयुक्त पांच साल के लिए नियुक्त होगा और वो 65 साल की उम्र तक पद पर रहेगा। लेकिन संशोधन बिल में ये प्रावधान है कि अब से केंद्र सरकार ये तय करेगी कि केंद्रीय सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त कितने साल के लिए पद पर रहेंगे।

मालूम हो कि सरकार सूचना आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति न करने को लेकर आलोचनाओं के घेरे में है। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने की वजह से सूचना आयोगों में लंबित अपीलों और शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
 
बता दें कि इस बिल को लेकर प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी यानी कि पूर्व-विधायी परामर्श नीति का भी पालन नहीं किया गया है। नियम के मुताबिक अगर कोई संशोधन या विधेयक सरकार लाती है तो उसे संबंधित मंत्रालय या डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाता है और उस पर आम जनता की राय मांगी जाती है। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं किया गया। 

इस बिल को 5 अप्रैल 2018 को ही तैयार कर लिया गया था. लेकिन इसे इतने दिनों तक सार्वजनिक नहीं किया गया। 12 जुलाई को मानसून सत्र के लिए लोकसभा के कार्यदिवसों की सूची जारी की गई है जिसमें से एक बिल सूचना का अधिकार (संशोधन) बिल, 2018 भी है. इसके बाद अब जाकर पूरे बिल को सार्वजनिक किया गया है।

सरकार का कहना है कि चूंकि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता है। इस तरह मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट के बराबर हो जाते हैं। लेकिन सूचना आयुक्त और चुनाव आयुक्त दोनों का काम बिल्कुल अलग है।

सरकार का तर्क है कि चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 की धारा (1) के तहत एक संवैधानिक संस्था है वहीं केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत स्थापित एक सांविधिक संस्था है. चूंकि दोनों अलग-अलग तरह की संस्थाएं हैं इसलिए इनका कद और सुविधाएं उसी आधार पर तय की जानी चाहिए।

बता दें कि संवैधानिक संस्था उसे कहते हैं जिनके बारे में संविधान में व्यवस्था दी गई हो वहीं सांविधिक संस्था उसे कहते है जिसे कोई कानून बनाकर स्थापित किया गया हो।

वहीं राज्यसभा में इस विधेयक के पेश होने पर भारी हंगामा होने के चलते फिलहाल इस संशोधन को सरकार ने वापस ले लिया है। 
2005 में आर.टी.आई अधिनियम लागू होने के बाद कई ऐसे खुलासे हो चुके जिसने सरकारी भ्रष्टाचार को  उजागर किया है। वहीं नागरिकों को शक्ति देने का काम भी इस अधिनियम के द्वारा हुआ है। ऐसे में क्या अधिनियम को कमज़ोर बनाने के पीछे मौजूदा सरकार का डर है कि उसका कोई कारनमा इस अधिनियम के  माध्यम  से  बाहर न आ जाए?

RTI
BJP
Central Government
Dilution

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • सबरंग इंडिया
    जेके पुलिस ने जारी की 'अनटोल्ड कश्मीर फाइल्स', हर धर्म के लोग कश्मीरी उग्रवाद का शिकार हुए
    09 Apr 2022
    कहावत है कि सच को बहुत देर तक नहीं झुठलाया जा सकता है। जी हां, ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म पर मचे हो-हल्ले और विवाद के बीच जम्मू कश्मीर पुलिस ने अनटोल्ड कश्मीर फाइल्स (Untold Kashmir Files) जारी की है।…
  • ज़ाहिद खान
    प्रलेस : फ़ासिज़्म के ख़िलाफ़ फिर बनाना होगा जनमोर्चा
    09 Apr 2022
    9 अप्रैल, प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस पर विशेष: प्रलेस का किस तरह से गठन हुआ?, संगठन के पीछे क्या उद्देश्य थे? इस संगठन के विस्तार में क्या-क्या परेशानियां पेश आईं?, प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े…
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    बेशर्म नंगई पर उतरा तंत्र, नफ़रती एजेंटों की पौ-बारा
    08 Apr 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने मध्यप्रदेश में पत्रकार व अन्य लोगों को थाने में अर्द्धग्न करने की घटना को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया और पीड़ित पत्रकार कनिष्क तिवारी से बात की। महंगाई में…
  • एजाज़ अशरफ़
    गुजरात दंगे और मोदी के कट्टर आलोचक होने के कारण देवगौड़ा की पत्नी को आयकर का नोटिस?
    08 Apr 2022
    नरेन्द्र मोदी सरकार स्पष्ट रूप से हिंदुत्व के कट्टर आलोचक के साथ राजनीतिक हिसाब चुकता कर रही है, इस उम्मीद के साथ कि ऐसा करके वह उन्हें भाजपा को चुनौती देने से रोक सकेगी। 
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    बीजेपी शासित एमपी और उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर ज़ुल्म क्यों ?
    08 Apr 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा चर्चा कर रहे हैं मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा पत्रकारों के साथ हुई अभद्र घटना पर। स्थानीय यूट्यूब पत्रकार कनिष्क तिवारी ने बताया…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License