NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
भारत में निर्बाध क्यों नहीं रही धर्मनिरपेक्षता की धारा?
भारत की बहुलता और विविधता जो वर्तमान में भले ही कमजोर है फिर भी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कट्टरपंथी और आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति से नष्ट होने की अनुमति नहीं देगी।
राम पुनियानी
07 Jun 2019
Constitution

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां संविधान के सामाजिक मानदंडों और मूल्यों का बार-बार उल्लंघन हो रहा है। दलितों पर बढ़ते अत्याचार और गोमांस के नाम पर अल्पसंख्यकों की भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं ने पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक संतुलन को बड़े पैमाने पर बिगाड़ दिया है। यह एक तरह से सांप्रदायिकता की राजनीति के उस दौर का हिस्सा है जो संकीर्ण, संप्रदायवादी धार्मिक पहचान को अपना निर्णायक बिंदु मानता है। यह 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के मिले विशाल जनादेश से और भयावह हो सकता है। चुनावों के बाद सत्ता में अपनी वापसी के बाद मोदी ने अपने विजयी भाषण में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक तरफ तो बहुत ज़्यादा परेशान करती हैं और वहीं दूसरी तरफ नई चीजों को आकार देने का विचार देती हैं।

मोदी ने कहा कि इस चुनाव प्रचार ने धर्मनिरपेक्षता वादियों के भ्रमकारी दावों को उजागर कर दिया, कि अब वे इस देश को गुमराह नहीं कर सकते हैं। उनके अनुसार 2019 के चुनावों में मुखौटे के रूप में धर्मनिरपेक्षता को समाप्त कर दिया गया और यह स्थान अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के लिए एक आवरण था। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले दलों द्वारा अल्पसंख्यकों को ठगा गया और धोखा दिया गया था।

यह बयान सिर्फ चुनावी जीत के उत्साह में नहीं दिया गया था। सांप्रदायिकता का सबसे बड़ा एजेंडा धर्मनिरपेक्षता की कार्य प्रणाली से दूर रखना है। यह सच है कि शाहबानों के फैसले को पलटने या शिलान्यास के लिए बाबरी मस्जिद के द्वार खोलने जैसे मामलों के दोष की तरह धर्मनिरपेक्षता की इस अवधारणा के चलन में अड़चनें और खामियां थीं। अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का दावा बिल्कुल झूठा है। गोपाल सिंह आयोग, रंगनाथ मिश्रा आयोग और सच्चर कमेटी की रिपोर्टें हमें मुस्लिमों की बदतर स्थिति के बारे में बताती हैं। मुस्लिम समुदाय के भीतर कुछ कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया गया है लेकिन समग्र रूप से समुदाय आर्थिक रूप से हाशिए पर है और सामाजिक असुरक्षा का सामना कर रहा। प्रत्यक्ष से परे जाकर किसी को यह समझने की आवश्यकता है कि धर्मनिरपेक्षता के चलन में कमी ने हमारे राष्ट्र को क्यों क्रूर बना दिया है?

धर्मनिरपेक्षता को विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया गया है और उसका अर्थ बताया गया है। भारतीय संदर्भ में सर्व धर्म समभाव का महत्वपूर्ण अर्थ रहा है। साथ ही यह कि राज्य धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा और धर्म (पादरी वर्ग) राज्य की नीति को निर्धारित नहीं करेगा। यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का महत्वपूर्ण ज्ञान रहा है जो लोकतंत्र की अवधारणा का मूल और अभिन्न अंग है। इसके कुछ उदाहरण व्यवहार में हैं। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की मांग के क्रम में गांधी ने कहा कि हिंदू समुदाय अपना मंदिर बनाने में सक्षम है। हालांकि उनके शिष्य नेहरू ने आने वाले समय में गांधी के मार्ग का अनुसरण किया। उसी नेहरू ने बाद में बांधों, उद्योगों और विश्वविद्यालयों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा था।

गांधी ने अपने तरीके से विद्वता का परिचय देते हुए कहा, ''धर्म और राज्य अलग-अलग होंगे। मैं अपने धर्म की कसम खाता हूं कि मैं इसके लिए मर जाऊंगा। लेकिन यह मेरा निजी मामला है। राज्य का इससे कोई लेना-देना नहीं है। राज्य आपके धर्मनिरपेक्ष कल्याण का ख्याल करेगा…।”

सामाजिक वैज्ञानिक राजीव भार्गव धर्मनिरपेक्षता के बारे में बताते हैं, “… बहिष्कार, उत्पीड़न और अपमान जैसे भेदभाव तथा अंतर-धार्मिक वर्चस्व के अन्य बदतर रूपों से यह न सिर्फ मुकाबला करती है, बल्कि यह अंतः धार्मिक वर्चस्व का समान रूप से विरोध करती है अर्थात हर धार्मिक समुदाय के भीतर के वर्चस्व जैसे महिलाओं, दलितों, वंचित के ऊपर के वर्चस्व का विरोध करता है।"

https://www.thehindu.com/opinion/lead/how-to-rescue-genuine-secularism/article27267143.ece

भारत में धर्मनिरपेक्षता का निर्बाध प्रवाह नहीं था। यह औपनिवेशिक काल के दौरान उभरते वर्गों के साथ जन्म लिया था। इस वर्ग का जन्म औद्योगिकीकरण, संचार और आधुनिक शिक्षा जैसे बदलावों के साथ हुआ था। उन्होंने इसे भारत को एक राष्ट्र बनाने में व्यापक बदलाव की प्रक्रिया बताया। भगत सिंह, अंबेडकर और गांधी द्वारा प्रतिनिधित्व की गई धाराओं ने इसे अपनी राजनीतिक विचारधारा और बेहतर समाज के लिए संघर्ष की नींव बनाया। वे भारतीय राष्ट्रवाद के के लिए खड़े थे। हालांकि, सामाजिक ताने-बाने में बदलाव की वजह से जमींदारों और राजाओं का आधिपत्य कम हुआ और वे सांप्रदायिक राजनीति के साथ आ गए। इस सांप्रदायिक राजनीति ने सांप्रदायकिता का विभाजन मुस्लिम सांप्रदायिकता और हिंदू सांप्रदायिकता के रूप में कर दिया। उन्होंने मुस्लिम राष्ट्र और हिंदू राष्ट्र का सपना देखा। जैसा कि प्रोफेसर बिपन चंद्र बताते हैं सांप्रदायिकता एक राष्ट्र के रूप में एक धर्म के समुदाय को मानती है।

भारत में सांप्रदायिकता विभिन्न चरणों से गुज़री जैसे नरम, मध्यम और चरम। इसका ज्ञान यह है कि एक धर्म के लोगों के समान हित हैं जो दूसरे धर्म से संबंधित लोगों से अलग हैं और इसलिए धार्मिक समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है। ये राजनीति अन्य समुदाय को अपने स्वयं के लिए खतरा मानती है। ठीक इसी समय अंतः सामाजिक पदानुक्रम को नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि इन समूहों का बड़ा एजेंडा जाति और लिंग के उन पदानुक्रमों को बनाए रखना है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के अमल की कमजोरियों में से एक सांप्रदायिकता से जबरदस्त विरोध रहा है जो बढ़ रहा है। हालांकि पाकिस्तान में मुस्लिम सांप्रदायिकता शुरू से ही सशक्त थी लेकिन भारत में यह पिछले चार दशकों में तेज हुई है। इसकी उग्रता ध्रुवीकरण पर स्थापित की गई है जो सांप्रदायिक हिंसा का परिणाम है। इसके मुद्दे राम मंदिर, लव जिहाद, घर वापसी और गोमांस जैसे पहचान वाले हैं। ये वही सांप्रदायिकता है जो देश की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को काउंटर करने के लिए तत्पर है; ये वही सांप्रदायिकता है जो धर्मनिरपेक्षता को ठीक से लागू करने में बड़ी बाधा है। ऐसे कई कारक हैं जो विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल हैं और मदद कर रहे हैं और उनमें से एक धर्मनिरपेक्षता प्रक्रिया का पूरा न होना है, ये प्रक्रिया लोकतंत्र की दिशा में बढ़ते हुए समाज जमींदार-पादरी के जोड़ी की सत्ता को समाप्त कर देती है।

वर्तमान में भारत की बहुलता और विविधता पर खतरा है लेकिन ये निश्चित रूप से सांप्रदायिक राजनीति द्वारा धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को नष्ट करने की अनुमति नहीं देगा जो वर्तमान में इसका शिकार है।

(राम पुनियानी लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

BJP
BJP-RSS
Dalit atrocities
Constitution of India
bhartiya janata party
Congress

Related Stories

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

अब राज ठाकरे के जरिये ‘लाउडस्पीकर’ की राजनीति

जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..


बाकी खबरें

  • Dalit Movement
    महेश कुमार
    पड़ताल: पश्चिमी यूपी में दलितों के बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करने की है संभावना
    17 Jan 2022
    साल भर चले किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण बदल दिए हैं।
  • stray animals
    सोनिया यादव
    यूपी: छुट्टा पशुओं की समस्या क्या बनेगी इस बार चुनावी मुद्दा?
    17 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मवेशी हैं। प्रदेश के क़रीब-क़रीब हर ज़िले में आवारा मवेशी किसानों, ख़ास तौर पर छोटे किसानों के लिए आफत बन गए हैं और जान-माल दोनों का नुकसान हो रहा है।
  • CPI-ML MLA Mahendra Singh
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: एक विधायक की मां जीते जी नहीं दिला पायीं अपने पति के हत्यारों को सज़ा; शहादत वाले दिन ही चल बसीं महेंद्र सिंह की पत्नी
    17 Jan 2022
    16 जनवरी 2005 को झारखंड स्थित बगोदर के तत्कालीन भाकपा माले विधायक महेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। 16 जनवरी को ही सुबह होने से पहले शांति देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें जीते जी तो…
  • Punjab assembly elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पंजाब विधानसभा चुनाव की नई तारीख़, अब 20 फरवरी को पड़ेंगे वोट
    17 Jan 2022
    पंजाब विधानसभा चुनाव की नई तारीख़ घोषित की गई है। अब 14 फरवरी की जगह सभी 117 विधानसभा सीटों पर 20 फरवरी को मतदान होगा।
  • Several Delhi Villages
    रवि कौशल
    भीषण महामारी की मार झेलते दिल्ली के अनेक गांवों को पिछले 30 वर्षों से अस्पतालों का इंतज़ार
    17 Jan 2022
    दशकों पहले बपरोला और बुढ़ेला गाँवों में अस्पतालों के निर्माण के लिए जिन भूखंडों को दान या जिनका अधिग्रहण किया गया था वे आज तक खाली पड़े हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License