NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारत में श्रमिकों की हालत हुई और ख़स्ता: सरकारी रिपोर्ट
श्रमिकों की मासिक आय न्यूनतम वेतन के मानदंडों से कम है, ज़्यादातर श्रमिक प्रति दिन 8 घंटे से ज़्यादा काम करते हैं और उनमें से लगभग तीन चौथाई को कभी भी नौकरियों से निकाल बाहर किया जा सकता है क्योंकि उनके पास नौकरी का कोई लिखित अनुबंध नहीं है।
सुबोध वर्मा
13 Jun 2019
Translated by महेश कुमार
भारत में श्रमिकों की हालत हुई और ख़स्ता: सरकारी रिपोर्ट

[यह भारत में काम करने की स्थिति के बारे में श्रंखला का पहला भाग है जिसे आधिकारिक स्रोत (सरकारी रपट में दर्शाए तथ्य) के आधार पर लिखा गया है।]

हाल ही में जारी की गई एक सरकारी रपट में भारत में श्रमिकों की स्थिति के बारे में एक कठोर तस्वीर उभर कर आई है, जिसमें उनके न्यूनतम वेतन के लिए स्वीकृत मानदंडों से आधे से भी कम आय दर्ज की गई है, 71 प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई भी लिखित नौकरी अनुबंध नहीं है, 54 प्रतिशत को छुट्टियों के पैसे का भुगतान नहीं मिलता है और ग्रामीण क्षेत्रों में 57 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में लगभग 80 प्रतिशत श्रमिक आठ-घंटे के कार्य दिवस (48-घंटे-सप्ताह) से बहुत अधिक काम करते हैं।

रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि 52 प्रतिशत से अधिक श्रमिक वास्तव में स्व-रोज़गार से जुड़े हैं, जिसका अर्थ है कि वे बड़े पैमाने पर खेती या छोटी दुकानें चला रहे हैं या फिर ऐसे उपक्रम जो उनके ख़ुद के श्रम पर आधारित हैं, या विभिन्न प्रकार के सेवा प्रदाताओं के रूप में काम कर रहे हैं। लगभग एक चौथाई कामकाजी लोग आकस्मिक (केज़ुअल) श्रमिक हैं, जो दैनिक आधार पर काम पाते हैं और रोज़ाना मज़दूरी कमाते हैं, जबकि लगभग एक चौथाई (23 प्रतिशत) नियमित वेतन या वेतन-कमाने वाले कर्मचारी हैं।

Status of Work.jpg

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) नामक रिपोर्ट, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा किए गए लगभग एक लाख घरों (4.33 लाख व्यक्तियों) के सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसे अब राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के रूप में बदल दिया गया है। (एनएसओ), सांख्यिकी मंत्रालय के तहत आता है। ऐसा जुलाई 2017 और जून 2018 के बीच किया गया था।

कमाई 

केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन और भत्ते को तय करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित सातवें वेतन आयोग के अनुसार, 2016 में चार सदस्य वाले घर के लिए आवश्यक न्यूनतम वेतन लगभग 18,000 रुपये होना चाहिए। यह भोजन की न्यूनतम आवश्यक मात्रा और अन्य सभी आवश्यक चीज़ों जैसे कपड़े, ईंधन, आवास, और बच्चों की शिक्षा आदि को ध्यान में रखने के बाद तय किया गया था। इसमें इस तरह के निर्धारण के संबंध में 1992 के सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश भी शामिल किए गए थे।

ग्रामीण क्षेत्रों में, स्व-रोज़गार के तहत काम कर रहे और आकस्मिक श्रमिक दोनों इस न्यूनतम वेतन के मानक से आधे से भी कम कमा पाते हैं जबकि नियमित कर्मचारी इसका दो तिहाई कमाते हैं। यह देश में छोटे और सीमांत किसानों के बड़े हिस्से और उनके सामने आने वाले गहन संकट का संकेत है।

Average Monthly Income.jpg

शहरी क्षेत्रों में, स्व-रोज़गार और नियमित कर्मचारी दोनों को और कुलीन वर्ग की कमाई को इसमें शामिल किया गया है जो कि औसत में बड़ी कमाई को दिखाते हैं। इस खंड को शामिल करने के बावजूद, कमाई का स्तर अभी भी इस तथ्य को धोखा देना है जो कि न्यूनतम मानक से नीचे है और बड़ी संख्या में शहरी कर्मचारी या स्व-रोज़गार वाले बहुत कम कमा रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में कैज़ुअल मज़दूर न्यूनतम मानक का लगभग आधा कमाते हैं।

काम के घंटे 

ऊपर चर्चा की गई आय ज़रूरी नहीं कि वह आठ घंटे के कार्य दिवस में कमाई गयी हो। यह पीएलएफ़एस रिपोर्ट के एक अन्य हिस्से द्वारा विभिन्न प्रकार के श्रमिकों द्वारा काम किए गए घंटों की संख्या का विवरण देने से पता चलता है। इसे नीचे दिए गए चार्ट में संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है:

workers working.jpg

ग्रामीण क्षेत्रों में 57 प्रतिशत श्रमिक प्रति दिन निर्धारित आठ घंटे (या 48-घंटे काम करने वाले सप्ताह) से अधिक समय तक काम करते हैं। शहरी क्षेत्रों में चौंकाने वाली स्थिति है जिसके तहत 79 प्रतिशत श्रमिक, 48 घंटे काम करने के सप्ताह से ज़्यादा काम करते हैं।

ये वे माध्यम हैं जिनके द्वारा पहले उल्लिखित की गई कमाई के स्तर को श्रमिकों द्वारा हासिल किया जाता है - वे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अधिक समय तक काम करते हैं। अनुभव से पता चलता है कि श्रमिकों को अधिक काम करने एक एवज़ में कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं करना आम बात है, या कुछ मामलों में क़ानून में निर्धारित दोगुनी दर के बजाय समान दर ओवरटाइम मिलता है।

न कोई अधिकार और न ही रोज़गार की सुरक्षा 

श्रमिकों के जीवन के एक और आयाम के बारे में सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है जिसमें पाया गया कि 71 प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई लिखित अनुबंध या नियुक्ति पत्र नहीं है। इसका मतलब यह है कि उन्हें किसी भी समय सेवा से हटाया जा सकता है, इसके लिए कोई उपाय उपलब्ध नहीं है। उनके पास कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने कभी उस उद्यम में काम भी किया है या नहीं। यह तथ्य तथाकथित नियमित वेतन/वेतन कमाने वालों के बारे में था।

Rights.jpg

54 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों को छुट्टी का भुगतान नहीं मिला। यदि बीमारी या परिवार में शादी के कारण उन्हें छुट्टी लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो उन्हें वेतन नहीं मिलता है। नियमित कर्मचारियों में से लगभग आधे को कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिला है, जैसे भविष्य निधि (पीएफ़), स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, मातृत्व बीमा आदि।

यह भी स्पष्ट है कि 'नियमित' वेतन पाने वाले या वेतन कमाने वाले कर्मचारी दूसरों से बेहतर नहीं थे सिवाय इसके कि वे नियमित रूप से कमा रहे थे। इनमें से अधिकांश अनुबंध कर्मचारी होंगे, जिनकी संख्या पिछले वर्षों में विस्फ़ोटक रूप से बढ़ी है, क्योंकि मालिक कम से कम संभव लाभ देना पसंद करते हैं ताकि उनका अंधा लाभ बढ़ सके।

Periodic Labour Force Survey
Workers’ Rights
Workers’ issues
organised sector
Unorganised Sector
Job Security
Self-employed workers

Related Stories

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

अंतर्राष्ट्रीय वित्त और 2022-23 के केंद्रीय बजट का संकुचनकारी समष्टि अर्थशास्त्र

तेलुगु राज्यों में श्रमिकों और किसानों का संयुक्त विरोध प्रदर्शनों से पहले व्यापक अभियान

सर्वेक्षण: अनलॉक में भी असंगठित क्षेत्र के मज़दूर को बहुत राहत नहीं, मज़दूरी घटी, क़र्ज़ बढ़ा

अमीरों को दी गई छूट और 'अनलॉक' के बावजूद रोज़गार में नहीं हो रहा है सुधार

कोरोना, लॉकडाउन और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर

कोरोना संकट: भोजन, नौकरी और सुरक्षा के लिए हुआ देशव्यापी विरोध

दिल्ली चुनाव : कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के हितों की चिंता किस पार्टी को है?

राजस्थान में मज़दूरों के जीवन को बर्बाद करते श्रम सुधार

मोदी बनाम मज़दूर: मज़दूरों की सुरक्षा वाले श्रम क़ानूनों का सत्यानाश


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License