NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
भारत-रूस संबंधों पर छाया कश्मीर का साया
रूस समझेगा कि राष्ट्रवाद की तमाम ड्रामेबाज़ी के बावजूद, भारत का सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग इस कठिन समय में अमेरिका के सामने अपनी कश्मीर नीतियों को नेविगेट करने की अपील करते हुए झुक सकता है।
एम. के. भद्रकुमार
06 Sep 2019
Translated by महेश कुमार
भारत-रूस
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (बाएँ) और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी (दाएँ) वार्षिक रूसी-भारतीय जुबली 20 वें शिखर सम्मेलन, व्लादिवोस्तोक, 4 सितंबर, 2019 को मिले।

3-5 सितंबर को व्लादिवोस्तोक में पीएम मोदी की यात्रा बे-नतीजा रही। इन हालात में इस यात्रा का एक ही मुख्य परिणाम हो सकता है कि यक़ीनन मोदी अब व्लादिवोस्तोक को उन विदेशी स्थलों की सूची में शामिल कर सकते हैं, जहां वह अब तक का दौरा करके आए हैं, जैसे कि उलनबटोर। इस बात का बहुत प्रचार किया गया था कि मोदी की साइबेरिया यात्रा, रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्रों में भारतीय आर्थिक साझेदारी की एक नई शुरुआत की गवाह बनेगी। लेकिन ऐसी किसी सफ़लता का कोई भी सबूत नहीं है।

वास्तव में बड़ा आश्चर्य यह है कि मोदी के दौरे के दौरान जिस लॉजिस्टिक्स समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की उम्मीद लंबे समय से थी, उसे स्थगित कर दिया गया है।

इस यात्रा के लिए तैयार किया गया संयुक्त वक्तव्य जिसे दो विदेश नीति के संस्थानों के नौकरशाहों ने लगता है बड़ी मशक्कत से तैयार किया है। कभी काफ़ी क़रीब रहे इन दोस्तों ने एक-दूसरे के 'मूल हितों' को साधने के लिए कोई भी प्रतिबद्धता देने से परहेज़ किया है। इस सावधानी को रूसी-चीनी दस्तावेज़ों में भी निरंतर बरता गया है और कश्मीर संकट के वर्तमान संदर्भ में, इसका मूल्य अथाह होगा।

लेकिन वास्तव में, भारत कश्मीर के ऊपर अमेरिका के रुख को प्राथमिकता दे रहा है और ऐसे वह विभिन्न तरीक़ों से इसे उदार बनाने का प्रयास कर रहा है  - साथ ही साथ इसे नीचे रख कर प्रोत्साहन भी दे रहा है - और इस स्थिति में भारत को रूस का स्पष्ट समर्थन काफ़ी जवाबी साबित हो सकता है, ख़ासकर विश्व राजनीति के इस नए शीत युद्ध की स्थिति में।

ज़ाहिर है, नौकरशाहों ने मोदी को यही सलाह दी होगी कि रूसियों के साथ-साथ विशेष रूप से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बहुत ज़्यादा नज़दीकी - इस स्थिति में केवल अमेरिकियों को हमसे दूर करेगा और यह भारतीय हितों के लिए हानिकारक होगा। इसे 28 अगस्त को मोदी की यात्रा के पहले मॉस्को में विदेश मंत्री एस जयशंकर के अजीब से व्यवहार से समझा जा सकता है।

यदि रूसियों को कोई धोखा नज़र आता है, तो वे इसे दिखाने नहीं जा रहे हैं। लेकिन फिर, इसके लिए तो वे भी दोषी हैं। इस मामले का तथ्य यह है कि रूसी-पाकिस्तानी 'नज़दीकी' असामयिक है और भले ही मॉस्को और इस्लामाबाद के बीच ज़्यादा कुछ नहीं हो रहा है, लेकिन धारणाएं मायने रखती हैं। और अमेरिकी के लॉबिस्टों ने आश्चर्यजनक रूप से जो धारणा बनाई है और जिसे प्रोत्साहित किया है वह कि रूस, भारत और पाकिस्तान के बीच में आ गया है।

नि:संदेह, व्लादिवोस्तोक का संयुक्त बयान अमेरिका-रूस-भारत त्रिकोणय ‘गतिज’ बन गया है। वॉशिंगटन के लिए यह एक फ़ील्ड डे बन गया है। भारतीय अभिजात वर्ग में अमेरिका के पैरोकार बीना किसी औचित्य के बहस नहीं करेंगे, ख़ासकर कश्मीर में संकट की प्रकृति को देखते हुए, भारत पश्चिमी दुनिया को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता है।

US-India_0.jpg

विदेश मंत्री एस. जयशंकर (दाएँ) और अमेरिकी राजदूत केन जस्टर (बाएँ) ने ‘अमरीकी-भारतीय दोस्ती महीना’ का शुभारंभ,  दिल्ली, 3 सितंबर 2019 को किया

अमेरिका और ब्रिटेन के पास इस तरह की जटिल परिस्थितियों का फ़ायदा उठाने का एक समृद्ध इतिहास है। ब्रिटेन के विदेश सचिव डोमिनिक रब का सोमवार को हाउस ऑफ़ कॉमन्स में कठोर टिप्पणी करना केवल एक संयोग नहीं हो सकता है:

“यह महत्वपूर्ण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानव अधिकारों का पूरी तरह से सम्मान किया जाता है। कश्मीर के संबंध में भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद उनके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और सिमला समझौते के तहत मान्यता प्राप्त प्रावधानों से हल करने के लिए है।"

“लेकिन मानवाधिकारों का मुद्दा केवल भारत या पाकिस्तान के लिए एक द्विपक्षीय मुद्दा या घरेलू मुद्दा नहीं है, बल्कि एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है। हम अपने सभी सहयोगी भागीदारों से उम्मीद करते हैं कि वे मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानकों का सम्मान और अनुपालन करेंगे।"

“मानवाधिकारों के उल्लंघन या ऐसे किसी भी तरह के आरोप गहरी चिंता क विषय है। इनकी पूरी जांच बड़ी ही मुस्तैदी और पारदर्शीता से होनी चाहिए। उठाए गए मुद्दे और चिंताएँ बहुत गंभीर हैं।”

"और साथ ही हम भारत के भीतर और कश्मीर के संबंध में संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान करना चाहते हैं [अनुच्छेद 370 का हनन], वह भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष रूप से निहितार्थ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों की रोशनी में"।

इसका कारण यह भी है कि वाशिंगटन और लंदन आपस में मिलकर चल रहे हैं। कश्मीर मुद्दा खुद में अमेरिका के हाथ में ऐसा हैंडल देता है जो भारत को एंग्लो-अमेरिकन वैश्विक रणनीतियों के अनुरूप ढलने की ओर धकेलता है। यहां दो प्रमुख बातें प्रभावित करेंगी; एक, रूस के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध और दूसरी, भारत की अमेरिका की भारत-प्रशांत रणनीति के साथ-साथ भारत की महत्वाकांक्षा का होना।

यह पृष्ठभूमि बताएगी कि एक सामान्य अपेक्षा के विपरीत, रूस और भारत ने रसद समझौते पर हस्ताक्षर करने को क्यों टाल दिया है। तथ्य यह है कि यह इस वक़्त यह भारतीय हितों में है कि रूसी क्षेत्रीय और वैश्विक नीतियों के साथ बहुत निकटता से बचा जाए, जो कि अमेरिका के साथ टकराव में तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

इसका अंदाज़ा लगाना कि रूस के साथ रसद समझौते को लंबित रखने के लिए अमेरिकियों ने दिल्ली में प्रमुख नीति निर्माताओं पर किस हद तक क़ाबू किया होगा, हम नहीं जानते, कि व्लादिवोस्तोक में जो कुछ हुआ या नहीं हुआ है।

समान रूप से, रूसियों ने संयुक्त बयान में यूएस-इंडियन ‘इंडो-पैसिफ़िक’ को किसी भी रूप मे ’अभी नहीं’ कहा है। एशिया-प्रशांत सुरक्षा पर वाक्यांश बताता है कि रूसी पक्ष ने चीनी संवेदनशीलता पर आंच न आए का ध्यान रखा है।

फिर, विशेष रूप से, भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में रूस के साथ सहयोग करने का फ़ैसला किया, हालांकि इससे काफ़ी उम्मीदें थीं कि व्लादिवोस्तोक में कुछ प्रमुख घोषणाओं की जाएंगी। शायद, भारत इस बिंदु पर अमेरिका के साथ ऊर्जा साझेदारी को प्राथमिकता देता है, जो राष्ट्रपति ट्रम्प के व्यक्तिगत समर्थन और हस्तक्षेप का आनंद लेने के लिए भी हो सकता है। भारत ह्यूस्टन, टेक्सास में एक प्रमुख ऊर्जा सम्मेलन आयोजित कर रहा है, इस महीने के अंत में अमेरिकी ऊर्जा उद्योग में भारतीय निवेश को लेकर वह बड़ी योजनाओं की रूपरेखा पेश करेगा।

कुल मिलाकर, देखा जाए तो व्लादिवोस्तोक यात्रा का परिणाम पिछले कुछ वर्षों के दौरान मोदी द्वारा भारत-रूस संबंधों में सुधार लाने की प्रवृत्ति में थोड़ा सा उलटफेर हुआ है। दिल्ली की ज़रूरत के हिसाब से सरकार की गणना में यह हो सकता है कि यूएस-भारतीय रणनीतिक साझेदारी वर्तमान समय में एक गंभीर आवश्यकता बन गया है ख़ासकर जब कश्मीर संकट महत्वपूर्ण हो गया है। भारत और मोदी पर व्यक्तिगत रूप से दबाव डालने के लिए - कश्मीर मुद्दे में मध्यस्थता की धमकी देकर, वाशिंगटन ने दिल्ली के रुख को 'नरम' कर दिया है। जब तक मोदी कश्मीर के अल्बाट्रॉस को अपने कांधे पर ढोते हैं, वे एंग्लो-अमेरिकन ब्लैकमेल की चपेट में आते रहेंगे।

रूस समझेगा कि राष्ट्रवाद के तमाम ड्रामेबाज़ी के बावजूद, भारत का सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग इस कठिन समय में अमेरिका को अपनी कश्मीर नीतियों को नेविगेट करने की अपील करने के झुक सकता है। विडंबना यह है कि यह इतिहास का एक दुखद पुनरावृत्ति भी होगी।

1940 के अंत में, एंग्लो-अमेरिकन दबाव में, जवाहरलाल नेहरू कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले आए थे। उस समय भी, दिल्ली ने सोवियत संघ से मदद मांगकर पश्चिम को अपमानित न करने का एक सचेत निर्णय लिया था। (शीत युद्ध तब तक भड़क चुका था।) सोवियत संघ के तत्कालीन राजदूत डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (बाद में भारत के राष्ट्रपति) ने व्यक्तिगत पहल कर, कुछ हद तक प्रभावहीन (और नेहरू की पूर्व स्वीकृति के बिना) थे। जोसफ़ स्टालिन के तहत विदेश मंत्री (1949-1953) एंड्री विंस्की के साथ मॉस्को में एक बैठक के दौरान सोवियत सहायता की मांग की थी।

सोवियत ने अपनी वीटो शक्ति का उपयोग करते हुए तभी से समय समय पर भारत को कश्मीर मुद्दे पर एंग्लो-अमेरिकन दबाव या उसकी पकड़ से मुक्त किया। तब तक, निश्चित रूप से, बड़ी क्षति पहले ही हो चुकी थी - संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने पर विवादास्पद प्रस्तावों (अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा प्रायोजित) को पहले ही अपना लिया था, जो आज तक भारत को परेशान करता है। काश, नेहरू भी भारतीय विदेश-नीति के कुलीन वर्ग के बीच मौजूद पश्चिमी देशों की समर्थक टोली से बहुत प्रभावित होते जिसने उन्हें उस समय घेर लिया था।

India
Russia
India-Russia
India-US relations
Kashmir
UN Security Council
Shimla Agreement

Related Stories

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License