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भारत
राजनीति
भारतीय लोकतंत्र में RSS खुले तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है!
पहले यह खुला रहस्य था लेकिन अब यह दिन के उजाले में हो रहा है।
योगेश एस.
31 May 2018
RSS

भारतीय जनता पार्टी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी में लग चुकी है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और इसके प्रमुख संगठनों के शीर्ष अधिकारियों के साथ लगातार बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। इन बैठकों में वे होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर विचार साझा कर रहे हैं।

आरएसएस के संयुक्त महासचिव कृष्णा गोपाल ने सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों पर चर्चा के लिए 28 मई 2018 को नई दिल्ली में एक बैठक की अध्यक्षता की। बीजेपी के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे, महासचिव राम माधव और सचिव राम लाल; केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन राठौर (सूचना एवं प्रसारण मंत्री), जेपी नड्डा (स्वास्थ्य मंत्री), मेनका गांधी (महिला एवं बाल विकास मंत्री), महेश शर्मा (संस्कृति मंत्री), प्रकाश जावड़ेकर (शिक्षा मंत्री) और थावरचंद गहलोत (सामाजिक न्याय मंत्री) ने बैठक में सरकार प्रतिनिधित्व किया और आरएसएस के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की।

आरएसएस में सामाजिक कार्य विभाग, शिक्षा विभाग और एक विभाग है जो विचारधारात्मक मुद्दों के लिए काम करता है। इसके कार्यकर्ता इन सभी विभागों में काम करते हैं। इन विभागों के प्रतिनिधियों ने सरकारी नीतियों के कार्यान्वयन को लेकर बैठक में मौजूद मंत्रियों के साथ चर्चा की। धन नियंत्रण पर बोलते हुए आरएसएस ऑल इंडिया प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा, "आरएसएस की विभिन्न संगठनें एक ही क्षेत्र में काम कर रही है और अपना प्रयोग, अनुभव और अवलोकन साझा करने के लिए कभी-कभी एक साथ आते हैं" और "इस तरह की समूह बैठकें साल2007 से हर साल हो रही हैं।" इस साल यह बैठक 28 मई से 31 मई तक नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है।

यह स्पष्ट रूप से इस संबंध को दर्शाता है कि सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार के पास हिंदू कट्टरपंथी निकाय है और यह आरएसएस के हाथों में कठपुतली है। प्रयोग, अनुभव और अवलोकन जिसके बारे में कुमार बोल रहे थे उसकी कोई जानकारी नहीं है। ये प्रयोग क्या हैं? ये किसके अनुभव हैं? कौन देख रहा है? और सरकार के लिए ऐसा करने के लिए आरएसएस कौन होता है? विचारों को साझा करने के इस बैठक में प्रमुख विभागों के सभी मंत्रियों की मौजूदगी हमें फिर से इन प्रश्नों से पूछने को मजबूर करती है। कई लोग आरएसएस पर बीजेपी की निर्भरता और इस हिंदू कट्टरपंथी निकाय के साथ घनिष्ठ कामकाज की और इशारा करते रहे हैं।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जो कि कांग्रेस से जुड़े थे वे 7 जून, 2018 को आरएसएस के एक समारोह को संबोधित करेंगे। इन सभी घटनाओं के साथ भारतीय लोकतंत्र के कामकाज में एक प्रमुख संगठन के रूप में कट्टरपंथी हिंदू संगठन आरएसएस का उद्भव स्पष्ट है। ये क्रेडिट 'अच्छे दिन' और 'विकास' 'के लिए किए गए वादे और इसके सांप्रदायिक राजनीति को जाता है। बीजेपी द्वारा 2014 के चुनाव को जीतने के लिए ये झूठे वादे किए गए।

अच्छे दीन और विकास के लोकप्रिय नारे के साथ बीजेपी ने 2014 में केंद्र में अपनी सरकार बनाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और सभी मंत्री अच्छे दिन को लेकर नहीं बल्कि विभाजनकारी नफरत वाले भाषणों को लेकर ख़बरों में बने रहे हैं। वादे किए गए अच्छे दिन के इंतज़ार में चार साल गुज़र गए। इस दौरान अपने वादों को पूरा करने में असमर्थता के साथ-साथ बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति भी साफ दिखाई दी।

जैसा कि राम पुनियानी ने कहा, "2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद तथाकथित अनुषंगी समूहों को संकेत मिला कि अब यह उनकी सरकार है और वे आसानी से अपने घृणित भाषणों और कार्यों से बच सकते हैं। यह आरएसएस द्वारा घृणा फैलाने का पूरी तरह असहनीय कृत्य था। पिछली यूपीए सरकार के दौरान भी आरएसएस नेता नफरत फैलाने वाले भाषणों में शामिल थे, अब नफरत फैलाने के मामलों में पूरी तरह आगे बढ़ चुके हैं।' वे लोग जो आश्चर्य करते हैं कि बीजेपी सांप्रदायिकता को क्यों तूल देती है तो उसका जवाब है कि यह पार्टी की विचारधारा है; आरएसएस की हिंदू कट्टरपंथी विचारधारा है। मतदाताओं में भावनात्मक धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित करने और सत्ता में आने के लिए वोट प्राप्त करने का मंत्र है; इस तरह आरएसएस के लिए हिंदू राष्ट्र के सपने को समझना आसान हो गया।

केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार और आरएसएस की उपलब्धियों के बारे में लिखते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, 'भक्तों की भीड़ वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धि है। एक नेता यहां तक कि एक सेलिब्रिटी के पास समर्थक (और अंधे समर्थक भी) हैं, लेकिन सभी ऐसे समर्थक ("भक्त") के लिए इतने भाग्यशाली नहीं हैं कि न केवल अपने "हीरो" के विरोधियों को आक्रामक रूप से सामना करने के लिए तैयार हैं, बल्कि अपने स्वयं के परिवार के सदस्य से भी।' 2014 में अपने वादे को साकार करने में प्रधानमंत्री की विफलता के बावजूद; जीएसटी और नोटबंदी जैसी विनाशकारी आर्थिक नीतियां, 'भक्त' की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आखिर यह कैसे है कि कोई प्रधानमंत्री और सरकार को उनके झूठे वादों से बचाया जाता है? ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि लोग सरकार के कार्रवाई के भय से डरते हैं, यह सब सूचना के रूप में प्रसारित होने की वजह से है।

कोबरापोस्ट के हालिया स्टिंग ऑपरेशन ने स्पष्ट किया कि आरएसएस और बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार सूचना के संचलन को नियंत्रित करती है। ऐसे कई आभासी माध्यम हैं जिनका इस्तेमाल सरकार के खराब प्रदर्शन को छिपाने और आम जनता का ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है। यह सच नहीं है कि लोग अच्छे दिन आने की खुशियां मना रहे हैं क्योंकि व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर कुछ जानकारी प्रसारित किए जा रहे हैं। वे निर्णय लेते हैं कि सरकार और प्रधानमंत्री के बारे में क्या कहा जाना चाहिए। क्या वोट हासिल करने के लिए वोटरों का ध्यान हटाने के लिए पीएम और बीजेपी की यह रणनीति है जो 'प्रयोगों', 'अनुभव' और 'अवलोकन' से प्रेरित है? मेरा मानना है कि विचार साझा करने के आरएसएस की इस बैठक में सूचना एवं प्रसारण मंत्री की मौजूदगी ऐसे सवाल का जवाब देती है।

इस प्रकार आरएसएस के साथ बीजेपी की ये बैठक आरएसएस के कार्यकर्ता को 2019 के आम चुनावों के लिए प्रचार शुरू करने और अभियान के लिए रणनीति बनाने को लेकर है। हमें इस चुनाव की रैलियों में प्रधानमंत्री द्वारा किए जाने वाले वादों का इंतजार करने और देखने की ज़रुरत है। उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं है और अब हम सभी जानते हैं कि इन (झूठे) वादों को कहाँ तैयारकिया जाता है, शायद वह आरएसएस है।

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