NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भाषा के दुष्प्रचार के जरिए कश्मीर की वास्तविकता को छिपाया जा रहा है!
मिर्ज़ा वहीद का उपन्यास 'द कोलैबोरेटर’ कश्मीरियों की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा है।
बशारत शमीम
29 Jul 2019
भाषा के दुष्प्रचार

मिर्ज़ा वहीद का नया उपन्यास 'द कोलैबोरेटर' कश्मीर में संघर्ष को लेकर मीडिया की भूमिका पर चर्चा करता है। यह सरकार की ओर से दुष्प्रचार को बल देने के लिए प्रेस में इस्तेमाल किए गए भाषा की बारीकी से आलोचना करता है।

लुई अलथुसर ने वैचारिक तंत्र पर सरकारी नियंत्रण को लेकर चर्चा किया है। यह एक दमनकारी सरकार को मज़बूत करने का एक तरीका था जो काफी ज़्यादा नियंत्रण चाहता है। इस मुहावरे के सूक्ष्म परीक्षण से द कोलैबोरेटर भरा हुआ है। यह बताता है कि सैन्य दमन को छिपाने के लिए उपाय के रुप में भाषा को असरदार तरीके से पेश करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करता है।

मीडिया क्षेत्र के विद्वान क्रेग लामे ने बताया है कि कैसे सत्ताधारी सख्त सेंसरशिप नियमों को लागू करता है और पत्रकार ऐसे राज्य के प्रवक्ता में बदल जाते हैं। लोगों को गुमराह करने और तथ्यों में हेरफेर करने के लिए नियंत्रण की इस परियोजना को ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है। इसका उद्देश्य संघर्षरत लोगों को उनकी मौलिक यादों से दूर कर देना है।

यह प्रक्रिया नोआम चॉम्स्की द्वारा मीडिया कंट्रोल में रिकॉर्ड किया गया है। सैन्य दमन के दौरान प्रमुख शक्ति इसे इतिहास को ग़लत साबित करने के लिए "आवश्यक" मानती है क्योंकि यह दमनकारी उपायों को सही ठहराने में मदद करता है। मीडिया के माध्यम से सहमति देना और धोखेबाजी करना इतिहास को पूरी तरह से गलत साबित करने का सामान्य मार्ग है।

यह कश्मीरी अनुभव के लिए भी सही है। कश्मीरी प्रतिरोध की कहानी को परिभाषित करने वाली ऐतिहासिक और राजनीतिक परिस्थितियां उन मापदंडों को भी निर्धारित करती हैं जो स्वयं ही प्रतिरोध का विश्लेषण करेगी। एक मिथ्या कहानी कश्मीरियों की यादों को दरकिनार करती है और उनकी खुद के दमन का विरोध करने की शक्ति को कमज़ोर करती है।

वहीद का उपन्यास इस निश्चित संदर्भ के भीतर मौजूद है और यहां यह ऐतिहासिक और राजनीतिक कारकों से घिरा हुआ है। इन कारकों का जटिल पारस्परिक प्रभाव एक संघर्ष में बदल जाता है जो सैन्य घेराबंदी के ख़िलाफ़ है। एक साक्षात्कार में कश्मीर में 1990 के दशक के निराशाजनक स्थिति को याद करते हुए वहीद नब्बे के दशक को "काला, क्रूर दशक" कहते हैं, जिस दौरान भयानक हिंसा को लेकर कुछ भी बाहरी दुनिया में नहीं पहुंच सका। उन दिनों जब पाकिस्तान ने इस संघर्ष को "जिहाद" के रूप में वर्णित किया तो भारत ने इसे "कानून-व्यवस्था" की समस्या कहा। इस उपन्यास में ये दो राष्ट्र कहानीकारों की अवस्था को अपनाते हैं जो कश्मीर के प्रमुख कथा को नियंत्रित करते हैं। कहानीकार इस घटना को इस तरह कहते हैं, "आप जानते हैं, कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है- क्योंकि कश्मीर के लिए हर चीज का हमेशा एक भारतीय और पाकिस्तानी रूप होता है।"

कई पैसेज में द कोलैबोरेटर ने दोनों देशों के दावे और प्रतिवाद का उल्लेख किया है कैसे कश्मीर संघर्ष को आधिकारिक तौर पर दस्तावाजे तैयार करता  है। इस तरह यह इस बिंदु पर ले जाता है कि आधिकारिक दस्तावेज शायद ही कभी उजागर करते हैं कि वास्तव में क्या हो रहा है। कई कहानियों को अप्रकाशित और तस्वीरों को बिना देखे हुए यह उन प्रक्रियाओं को रिकॉर्ड करता है जो संघर्ष के महत्वपूर्ण पहलुओं को छिपाए हुए हैं।

ऐसा करने से प्रतिरोध लेखन (रेसिस्टेंस राइटिंग) के एक विद्वान बारबारा हारलो के शब्दों में वहीद कहते हैं, "एक्सप्रोप्रिएटेड हिस्ट्रीसिटी बैक"। 1990 के दशक के आरंभ की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को अपने उपन्यास में शामिल किया है।

वहीद की कथा स्पष्ट रूप से यह बताती है कि इसे हेजेमोनिक पावर डिस्कोर्स के पन्नों से निकालकर किस तरह से जुल्म सहने वाले कश्मीरियों की ऐतिहासिक यादों को पुनः संजोया जा सकता है। वह स्पष्ट तरीके से बताते हैं कि किस तरह संघर्ष के आधिकारिक दस्तावेजों की अपर्याप्तता ने इन घटनाओं को विकृत कर दिया है या यह सुनिश्चित किया है कि उसे पूरी तरह से प्रस्तुत नहीं किया गया है।

1990 के दशक की दुखद घटनाओं के संदर्भ में कश्मीरी आतंकवादियों और भारतीय राज्य के दमनकारी बलों के बीच द्वेषपूर्ण टकराव शामिल है। पोस्पोरा में (कथित) सामूहिक बलात्कार, गव कडल और सोपोर के नरसंहार, नियंत्रण रेखा पर फर्जी मुठभेड़, जिसके परिणामस्वरूप सीमा के नज़दीक सामूहिक कब्रिस्तान इनमें से कुछ घटनाएं हैं।

21 फरवरी 1991 को चौथी राजपुताना राइफल्स द्वारा एक घेराबंदी और तलाशी अभियान के दौरान उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा के कुनान पोसपोरा गांव में 50 से अधिक महिलाओं के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया गया था। कई डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माताओं और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय टीमों ने इस गांव की जांच की। हालांकि, सरकार ने इस घटना से इनकार किया और आरोपों को बेबुनियाद दुष्प्रचार बताया।

इस उपन्यास में पोस्पोरा की महिलाएं "मिल्क बेगर्स" के रूप में दिखाई देती हैं। तीन महीने से अधिक समय तक कर्फ्यू के बीच रहने के बाद वे भूखे बच्चों के लिए दुग्ध की तलाश में परेशान होकर नौगाम जाती हैं। कथाकार ने यह भी कहा है, "दिल्ली के कश्मीर मामलों के एक नए मंत्री को भी उद्धृत किया गया था कि पोशपुर के नाम से कोई स्थान कभी भी मानचित्र पर मौजूद नहीं था।"

गव कदल की घटना को भी बताया गया है। कथाकार कहते हैं कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) द्वारा लगभग 50 लोगों को दिन दहाड़े मार दिया गया था। समाचार पत्रों के हेडलाइन "द रिवर ऑफ ब्लड," और "यांग एंड ओल्ड, मेन एंड चिल्ड्रेन, डेड, ऑल डेड, डेड ऑन ब्रिज" से भरे हुए थें। सरकार इस घटना को "कानून-व्यवस्था के नष्ट होने" के रूप में परिभाषित करती है जिसके कारण पुलिस गोली चलाने के लिए "मजबूर" हुई जिसमें 35 लोग मारे गए। ये उपन्यास इस बात को लेकर उपहास करता है कि कैसे बड़े पैमाने पर हुए मानव त्रासदी को गैर-मामूली तरीके से महत्वहीन बनाया जाता है।

वहीद ने दुष्प्रचार की भाषा पर व्यंग्यपूर्वक उपहास किया है कि मीडिया को तैनात किया जाता है जब वह संघर्ष की खबरें करता है। कथाकार के पिता नेशनल ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन की ख़बरों को ख़ारिज करते हैं क्योंकि 'सभी झूठ, सरसर बकवास और पूरा बकवास'' है। जब कभी सेना और उग्रवादियों के बीच कोई सशस्त्र टकराव हो जाता है तो ऐसे में कई लोगों को मौत हो जाती है लेकिन कथाकार कहते हैं कि ऐसी घटनाओं को दबा दिया जाता है और इसे झड़प बताया जाता है।

इसमें फर्जी मुठभेड़ों का भी वर्णन है। एक मीडिया टीम संघर्ष को लेकर खासकर सीमा के संघर्ष पर रिपोर्ट करने के लिए दिल्ली से पहुंचती है। यह एक आर्मी कैप्टन के लिए एक अवसर बन जाता है कि वह कथाकार को ऑपरेशन के प्रबंधन में अपने कौशल को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करे। कैप्टन द्वारा प्रशिक्षित आतंकवादियों और आकांक्षी आतंकवादियों के शवों की पहचान करने के लिए कथाकार को मजबूर किए जाने के बाद वह कश्मीर के भीतरी इलाकों में सेना की कार्यप्रणाली से परिचित हो जाते हैं।

वे महसूस करते हैं कि पर्दे के पीछे की सेना और मीडिया के माध्यम से दिखाए गए वास्तविकता में साफ तौर पर भिन्नता है। इस उपन्यास के संदर्भ में यह मीडिया को उजागर करता है जिसकी जटिलता और उपेक्षा सैन्य दमन को छिपाती है। कई अन्य उदाहरणों में मीडिया की भाषा और कार्यप्रणाली को वास्तविकता को कमजोर करते हुए दिखाया गया है।

कश्मीर पर उनके 1990 के अध्ययन को लेकर तपन बोस, दिनेश मोहन, गौतम नवलखा और सुमंत बनर्जी ने एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक अख़बार के 15 फरवरी के अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट का उल्लेख किया। रिपोर्ट में फर्स्ट हैंड अकाउंट होने का दावा किया गया है हालांकि पता चलता है कि इसके लेखक कश्मीर नहीं गए थें। इस अध्ययन में कहा गया है कि इस पत्रिका ने श्रीनगर के निवासियों से मुलाकात की जगमोहन (राज्यपाल) की एक तस्वीर प्रकाशित की। इसके पिछले हिस्से में चिनार का पेड़ है। यह पेड़ केवल गर्मियों में रंग बदलता है; और यह पता चलता है कि ये तस्वीर कुछ साल पहले अप्रैल 1986 में अनंतनाग में ली गई थी। ये अध्ययन तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री पी. उपेंद्र का भी हवाला देता है। वह "विशेष परिस्थितियों और वहां की नाजुक स्थिति" के मद्देनजर कश्मीर में प्रेस सेंसरशिप को उचित ठहराते हैं।

ऐसी परिस्थितियों के चलते इस वास्तविकता को स्पष्ट करने के लिए उपन्यासकार पर छोड़ दिया जाता है कि दुष्प्रचार की भाषा छिपी हुई है।

बशारत शमीम जम्मू-कश्मीर के कुलगाम के लेखक और ब्लॉगर हैं।

Mirza Waheed
The Collaborator
Kashmir Novelist
propaganda
Media

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

आर्यन खान मामले में मीडिया ट्रायल का ज़िम्मेदार कौन?

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 

‘दिशा-निर्देश 2022’: पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का नया हथियार!

क्या आपको पता है कि ₹23 हजार करोड़ जैसे बैंक फ्रॉड भी महंगाई के लिए जिम्मेदार है? 

23000 करोड़ का घोटाला! भाजपा सरकार और मीडिया चुप?

‘केंद्रीय मीडिया प्रत्यायन दिशा-निर्देश-2022’ : स्वतंत्र मीडिया पर लगाम की एक और कोशिश?


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License