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भौंरा गोलीकांड : निजी कोलियरी के दौर की दबंगई की वापसी
पूर्वी झरिया कोयला क्षेत्र में गोलीकांड उस समय हुआ है जब धनबाद समेत पूरे देश में लोकतन्त्र का महापर्व चल रहा है। इस लिहाज से इस जघन्य गोलीकांड को चुनाव का मुद्दा बनना ही चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अनिल अंशुमन
06 May 2019
भौंरा गोलीकांड
Image Courtesy: jagran.com

अंग्रेज़ी हुकूमत जाने के बाद भी जब तक कोयला खनन क्षेत्र में निजी कोयला खनन कंपनियों का बोलबाला था तो उसके दबंग मालिकों और उनके कारिंदों की ही मनमानी चलती थी। बाद में कोयला के राष्ट्रीयकरण होने के पश्चात इन स्थितियों पर लगाम लगी थी। लेकिन जब से उदारीकरण–वैश्वीकरण के नाम पर इस देश की सरकारों ने निजीकरण की खतरनाक नीतियां लागू करना शुरू किया है, दबंगई और मनमानी का पुराना दौर लौटने लगा है। ‘आउटसोर्सिंग’ विशेषकर कोयला क्षेत्र में निजीकरण का सबसे हिट फार्मूला है, जिसमें ठेका अमूमन उन्हीं निजी कंपनियों को मिलता है जिनके मालिक ऐसे दबंग और राजनीतिक रसूखवाले होते हैं जिनकी सत्ताधारी दल के मंत्री–नेताओं और बीसीसीएल इत्यादि उपक्रमों के उच्च अधिकारियों से सेटिंग–गेटिंग रहती है। इसीलिए ठेका मिलते ही फौरन शुरू हो जाता है निजी कंपनी (दबंग मालिक) की मनमानी और संगठित लूट के ‘नए राष्ट्रीय व आधुनिक औद्योगिक विकास’ का सिलसिला।

29 अप्रैल को कोयलानगरी धनबाद जिला स्थित बीसीसीएल के पूर्वी झरिया कोयला क्षेत्र (भौंरा) में हुआ ‘गोली कांड’ नए आधुनिक औद्योगिक विकास का असली जमीनी सच है। जहां कोयला खनन की आउटसोर्सिंग कंपनी देवप्रभा के खनन कार्यों से हो रहे प्रदूषण को रोकने और खनन-विस्फोटों से वहाँ फ़ैल रहे धूल–गर्द के भयावह गुबार को काबू करने के लिए पानी छिड़काव की मांग को लेकर सैकड़ों स्थानीय लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। बताया जाता है कि तभी फिल्मी स्टाइल में कंपनी के दबंग मालिक ने कई गाड़ियों में अपने बाहुबली कारिंदों के साथ पहुँचकर पुलिस की मौजूदगी में “डस्ट खाओ नहीं तो गोली” कहकर निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाते हुए हमला बोल दिया। जिससे कई लोग बुरी तरह घायल हो गए। मौके पर उपस्थित पुलिस ने हमेशा की भांति कांड करनेवाले दबंग कंपनी मालिक व कारिंदों पर कारवाई करने की बजाय प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों के ही घरों में घुस घुसकर दमन का तांडव मचा दिया। जिसकी प्रतिक्रिया में उत्तेजित लोगों ने भी वहाँ खड़ी कंपनी की कई गाड़ियों को आग के हवाले कर पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये के खिलाफ घटना स्थल पर पहुंचे पुलिस डीएसपी के वाहन पर भी पत्थरबाजी कर दी।

bhaura kand2.PNG

बढ़ते जन विक्षोभ से स्थिति बेकाबू होता देख प्रशासन के आला अधिकारियों को हरकत में आकर निषेधाज्ञा लागू करनी पड़ी। गोली से बुरी तरह घायल व्यक्ति का पुलिस को दिये बयान के आधार पर दबंग कंपनी मालिक को गिरफ्तार करना पड़ा। बाद में दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया । लोगों आरोप है कि पिछले दो महीनों से बीसीसीएल और प्रशासन की मिलीभगत से कंपनी द्वारा सारे नियम–कायदों को ताक पर रखकर किए जा रहे खननकार्य से काले धुएं का जानलेवा प्रदूषण फ़ैल रहा है। स्थानीय मीडिया ने तो इस गोलीकांड को निजी कोलियारियों का ज़माना याद करानेवाली घटना बताया। फिलहाल , प्रशासनिक लहजे में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है और देवप्रभा कंपनी के मालिक व एक कारिंदे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। 

गौरतलब है कि ‘भौंरा गोलीकांड’ उस समय हुआ है जब धनबाद समेत पूरे देश में लोकतन्त्र का महापर्व चल रहा है। कहने को तो इसमें जनता की आकांक्षा को ही सर्वोपरि महत्व देने की बात कही जाती है। इस लिहाज से इस जघन्य गोली कांड को चुनाव का मुद्दा बनना ही चाहिए था, जो नहीं हुआ। क्योंकि एक तो, ऐसा पहली बार हुआ है जब “एक बार फिर .... सरकार !” बनाने को राष्ट्रहित का पर्याय बना देने के शोर में इस गोलीकांड और इसके वास्तविक कारणों समेत आम लोगों के सभी बुनियादी सवालों को बड़े ही सुनियोजित ढंग से हटा दिया जा रहा है। लोगों की खुली आँखों के सामने उनकी ही ज़िंदगी के ज़रूरी सवालों को धता बताकर ‘माननीय चौकीदार जी’ व उनकी चौकड़ी नेताओं के उल्टे सीधे बोलवचन को मतदाताओं के दिल दिमाग में ठूँसने की हरचंद कवायद ज़ोरों पर है। यहाँ तक कि चुनाव आयोग तक को इनकी हर करतूत वैध बताने की ड्यूटी में लगा दिया गया है। दूसरे, विशेषकर इस कोयलांचल में विपक्ष के भी स्थापित राजनीतिक दलों व उनके प्रत्याशी नेताओं का ‘भौंरा गोलीकांड’ जैसे मुद्दों में विशेष दिलचस्पी नहीं होने के पीछे ‘कुछ ऐसा है जिसकी पर्देदारी है!’ क्योंकि इस कांड के मुख्य कारक तत्व है उन नीतियों में बदलाव का कि जिससे कोयला क्षेत्र की निजी कंपनियों की मनमानी नहीं चल सके। जिसे चुनाव में खड़ा शायद ही कोई राजनीतिक दल-नेता या प्रत्याशी करना चाहेगा। क्योंकि कोयले की काली कमाई में सभी शामिल हैं और इसके हमाम में सभी एक जैसे हैं।

ऐसे में अंतिम तौर पर बात जाकर ठहरती है उनलोगों पर जो इस क्षेत्र के मतदाता हैं और जिनके सामने ये मौका आया है कि वे अपने वोट से ऐसे दल व नेता का चुनाव करें जो “भौंरा गोलीकांड” कराने वाली निजीकरण और कंपनीपरस्ती की नीतियों में बदलाव ला सके। साथ ही कोयला उद्योग जैसे देश के सार्वजनिक उपक्रमों को निजी कंपनियों के हवाले करने की सत्ता-साज़िशों को बेनकाब कर उसे रोक सके। सनद रहे कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जानेवाले इस देश के स्थापित सार्वजनिक संस्थानों व उपक्रमों के विखंडन व नष्ट किए जाने के सुनियोजित कारनामे सबसे अधिक वर्तमान सत्ता–शासन में ही हुए हैं। जिसे लेकर लोकतंत्र के महापर्व के पूर्व ही देश के कई जाने माने जन राजनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञों, लेखक-बुद्धिजीवियों व फ़िल्मी हस्तियों से लेकर सेना और प्रशासन के कई पूर्व उच्च अधिकारियों ने लिखित तौर पर इस बात की पूरी आशंका जताई है कि ‘फिर एकबार .... सरकार’ की सफलता, देश व समाज के लोकतान्त्रिक विकास के मामले में ऐसी विनाशकारी होगी कि उसकी भरपाई लंबे समय तक संभव नहीं होगी!  

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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