NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
'भीमा कोरेगाँव' ने लोगों को दमनकारी सामाजिक तंत्र से लड़ने को प्रेरित किया
महार सैनिक न सिर्फ सैनिकों के रूप में लड़ाई लड़ रहे थे बल्कि "अपनी खोई हुई पहचान को पुनः प्राप्त करने की लड़ाई" भी लड़ रहे थे।
पी.जी. अम्बेडकर
02 Jan 2018
अस्पृश्यता
Image: Trina Shankar, Illustrations: Savi Savarkar

इस वर्ष 'भीमा कोरेगाँव' युद्ध की 200वीं जयंती मनाई गई। इस युद्ध ने पुणे के पेशवा शासन को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। डॉ बी.आर. अम्बेडकर और उनके दर्शन के अनुयायी हज़ारों की संख्या में प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को इकट्ठा होते हैं और उन सैनिकों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने इस युद्ध में अपनी जान गँवाई थी।

1 जनवरी 1818 को बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फैंट्री के ब्रिटिश रेजिमेंट की ओर से महार जाति के प्रभुत्व वाली चंद सौ सैनिकों ने पुणे के पेशवा शासकों के 20,000 शक्तिशाली सैनिकों को हराया था। इतिहासकार रिचर्ड बी युद्ध के बारे में लिखते हैं:

1 जनवरी 1818 को कोरेगाँव की लड़ाई में महारों की सहभागिता काफी प्रसिद्ध है, साथ ही सबसे अच्छे दस्तावेज़, और महार सैनिकों से जुड़ी कार्यवाही भी...500 लोगों की एक छोटी सी शक्ति द्वारा कोरेगाँव की सफल रक्षा...कैप्टन एफएफ स्टॉन्टन की कमान के अधीन जिसने बिना किसी आराम या राहत, भोजन या पानी के लगातार बारह घंटों तक (मराठा नेतृत्व) पेशवा बाजीराव द्वितीय की 20,000 घुड़सवार सेना और 8,000 पैदल सेना के ख़िलाफ़ युद्ध की। बाजीराव किरकी तथा पूना में ब्रिटिश रक्षक सेना को धमकी दे रहे थे। स्टॉन्टन की इकाई में महारों का प्रभुत्व था। पेशवा सैनिकों की आश्चर्यजनक संख्या के बावजूद उस शाम वापस बुला ली गई, जिससे ब्रिटिश को एक महत्वपूर्ण जीत मिल गई। महारों समेत 2/1st रेजिमेंट बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री केसैनिक जो इस युद्ध में लड़े उन्हें बहादुरी के लिए सम्मानित किया गया।

सभी चकित थे कि चंद सैंकड़ों की संख्या में महार सैनिक अपने से 25 गुना बड़े और सुसज्जित पेशवा की सेना को पराजित करने में किस तरह सक्षम थे। महार सैनिक न सिर्फ सैनिकों के रूप में लड़ाई लड़ रहे थे बल्कि "अपनी खोई हुई पहचान को पुनः प्राप्त करने की लड़ाई" भी लड़ रहे थे।

पेशवाओं के साम्राज्य में समाज और सरकार मनुस्मृति में वर्णित व्यवस्था के अनुसार संगठित की गई थी। अछूत जातियों को केवल दोपहर के समय जब सूरज ठीक सिर के ऊपर होता था तब गाँव में प्रवेश या सड़कों पर चलने की अनुमति दी गई थी, ऐसा इसलिए कि अछूतों की छाया उच्च जाति हिंदुओं पर न पड़े। उन्हें काला धागा पहनना पड़ता था ताकि उन्हें पहचाना जा सके। इसके अलावा, उन्हें झाड़ू को अपनी पीठ पर बाँधना पड़ता था ताकि चलने के बाद बने पैर के निशान को मिटते रहें। अछूतों को अपने गले में थूक के लिए एक बर्तन बाँधना पड़ता था जिससे कि वे उसी में अपना थूक फेंके। अछूतों पर इस तरह के प्रतिबंध इलाके की "पवित्रता" बनाए रखने के लिए थे।

उनकी वीरता और बलिदान को याद करते हुए वर्ष 1851 में भीमा कोरेगाँव में एक स्मारक बनाया गया जिसमें इस निर्णायक लड़ाई में भाग लेने वाले सैनिकों के नाम लिखे गए। अधिकतर नाम महार सैनिकों के थे। इसलिए हर साल हज़ारों की संख्या में लोग इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने इलाके से पेशवा शासन को समाप्त कर दिया था। यहाँ तक कि डॉ अम्बेडकर अन्य लोगों के साथ अक्सर वहाँ जाते थे जिससे कि महारों को उनके इतिहास की जानकारी हो और मानवीय दासता से मुक्ति के लिए लड़ने के लिए प्रेरित हो सकें।

लेकिन 20 दिसंबर, 2017 तक ये स्थान उक्त परिवार के सदस्यों के साथ एक कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ था जिसे स्मारक की देखभाल करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। स्मारक का क्षेत्र चार एकड़ ज़मीन में फैला है। स्मारक के रखरखाव के लिए ब्रिटिश प्रशासन द्वारा एक परिवार को 260 एकड़ भूमि अनुदान में दिया गया था।

भीमा कोरेगाँव कमेटी के अध्यक्ष दादाबाहू अभंग ने स्मारक के चारों ओर भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। उन्होंने न्यूज़क्लिक से कहा कि एक परिवार ये कहते हुए स्मारक के चारों ओर की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था कि उसे स्मारक के रखरखाव के लिए काम सौंपा गया है। इसके ख़िलाफ़ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से संपर्क किया और उस क्षेत्र के संबंधित राजस्व अधिकारियों से एक आदेश मिला। स्मारक के "रकवाल धार" (वह व्यक्ति जिन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई) ने राजस्व अधिकारी के आदेश के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया तो 20 दिसंबर को अदालत ने भीमा कोरेगांव कमेटी के सदस्यों के पक्ष में अपना फ़ैसला सुना दिया।

पुणे सिविल कोर्ट में भीमा कोरेगाँव कमेटी की ओर से इस मामले की लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ताओं में से एक नितिन मेश्राम ने कहा कि विरोधी पक्ष अवैध रूप से ज़मीन पर क़़ब्ज़ा किए हुए था। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 49 के मुताबिक़ यह व्यक्ति की नहीं बल्कि सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह स्मारकों का देखभाल करे। उन्होंने आगे कहा कि यह मामला व्यक्तिगत रूप से उनके लिए महत्वपूर्ण था और इस तरह समाज के लिए उनका योगदान था साथ ही महार सैनिकों के बलिदान का सम्मान करने का उनका तरीक़ा था। उन्होंने कहा कि इन सैनिकों ने लोकतांत्रिक देश के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

अस्पृश्यता
भीमा कोरेगाँव
मराठा
दलित
दलित चिंतन

Related Stories

दलित चेतना- अधिकार से जुड़ा शब्द है

महाराष्ट्र के हिंसक मराठा आंदोलन के लिये कौन जिम्मेदार है?

दलितों आदिवासियों के प्रमोशन में आरक्षण का अंतरिम फैसला

राजकोट का क़त्ल भारत में दलितों की दुर्दशा पर रोशनी डालता है

मनुष्यता के खिलाफ़ एक क्रूर साज़िश कर रही है बीजेपी: उर्मिलेश

भीमा कोरेगांव मामले में 'दलित कार्यकर्ताओं और वकीलों' के घर पुणे पुलिस की छापेमारी

भारतीय मीडिया और सिनेमा ‘कास्ट घेटो’ हैं – सोमनाथ वाघमारे

महाराष्ट्र दलित विरोध : बेरोज़गारी और उत्पीड़न का नतीजा

दलित नेता :भीमा कोरेगाँव हमला सुनियोजित था, भाजपा नेतृत्व वाले ‘पेशवाई शासन’ को उखाड़ फेंकने का लिया प्रण

दलित-मुस्लिम एकता की ऐतिहासिक जरुरत


बाकी खबरें

  • सोनिया यादव
    आंगनवाड़ी की महिलाएं बार-बार सड़कों पर उतरने को क्यों हैं मजबूर?
    23 Feb 2022
    प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं का कहना है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद उन्हें अभी तक उनका सही बकाया नहीं मिला है। एक ओर दिल्ली सरकार ने उनका मानदेय घटा दिया है तो…
  • nawab malik
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हम लड़ेंगे और जीतेंगे, हम झुकेंगे नहीं: नवाब मलिक ने ईडी द्वारा गिरफ़्तारी पर कहा
    23 Feb 2022
    लगभग आठ घंटे की पूछताछ के बाद दक्षिण मुंबई स्थित ईडी कार्यालय से बाहर निकले मलिक ने मीडिया से कहा, '' हम लड़ेंगे और जीतेंगे। हम झुकेंगे नहीं।'' इसके बाद ईडी अधिकारी मलिक को एक वाहन में बैठाकर मेडिकल…
  • SKM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बंगाल: बीरभूम के किसानों की ज़मीन हड़पने के ख़िलाफ़ साथ आया SKM, कहा- आजीविका छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए
    23 Feb 2022
    एसकेएम ने पश्चिम बंगाल से आ रही रिपोर्टों को गम्भीरता से नोट किया है कि बीरभूम जिले के देवचा-पंचमी-हरिनसिंह-दीवानगंज क्षेत्र के किसानों को राज्य सरकार द्वारा घोषित "मुआवजे पैकेज" को ही स्वीकार करने…
  • राजस्थान विधानसभा
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान में अगले साल सरकारी विभागों में एक लाख पदों पर भर्तियां और पुरानी पेंशन लागू करने की घोषणा
    23 Feb 2022
    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को वित्तवर्ष 2022-23 का बजट पेश करते हुए 1 जनवरी 2004 और उसके बाद नियुक्त हुए समस्त कर्मचारियों के लिए आगामी वर्ष से पूर्व पेंशन योजना लागू करने की घोषणा की है। इसी…
  • चित्र साभार: द ट्रिब्यून इंडिया
    भाषा
    रामदेव विरोधी लिंक हटाने के आदेश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया की याचिका पर सुनवाई से न्यायाधीश ने खुद को अलग किया
    23 Feb 2022
    फेसबुक, ट्विटर और गूगल ने एकल न्यायाधीश वाली पीठ के 23 अक्टूबर 2019 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें और गूगल की अनुषंगी कंपनी यूट्यूब को रामदेव के खिलाफ मानहानिकारक आरोपों वाले वीडियो के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License