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भारत
राजनीति
भोजन एवं काम के अधिकार के साथ कश्मीर के अधिकार बहाल करने की भी मांग
छत्तीसगढ़ में भोजन एवं काम के अधिकार पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन। 110 संस्थाओं और संगठनों के सदस्यों ने लिया हिस्सा। कश्मीर से लेकर देश में बढ़ रहे नफ़रत के माहौल तक पर बात।
तामेश्वर सिन्हा
24 Sep 2019
kashmir issue

रायपुर (छत्तीसगढ़): भोजन एवं काम के अधिकार पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन पास्टोरल सेंटर, रायपुर, में हुआ। इस अधिवेशन में 15 राज्यों से 1000 से ज्यादा सदस्यों ने हिस्सा लिया। अधिवेशन में भोजन एवं काम के अधिकार के अलावा कश्मीर का अधिकार बहाल करने और देश में बढ़ रहे नफ़रत के माहौल पर भी बात की गई।

22 सितम्बर तक चले इस अधिवेशन में  देश भर में काम करने वाली 110 संस्थाओं और संगठनों जैसे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, जन स्वास्थ्य अभियान, नेशनल अलायन्स फॉर पीपल्स मूवमेंट, मजदूर किसान शक्ति संगठन, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, सतर्क नागरिक संगठन, देश भर के दलित आदिवासी संगठन, विकलांग मुद्दों पर काम करने वाले और ट्रांसजेंडर नेटवर्क आदि ने भाग लिया।

अधिवेशन की शुरुआत एक रैली से हुई जो बूढा तालाब से ‘जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पे तूफान रहेगा’ और ‘गोदामों में सड़े अनाज, फिर भी बच्चे भूखे आज’ जैसे नारों के साथ बायरन बाजार पहुंची। आदिवासी नृत्य के साथ सम्मलेन की शुरुआत हुई, जिसके बाद छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़े शहीद स्कूल, बिरगांव के बच्चों ने किसानों के मुद्दों को ऐतिहासिक सन्दर्भ के साथ प्रस्तुत किया जिसमें हाइब्रिड बीज, कीटनाशक का इस्तेमाल, ब्याज, जमीन के अधिकार एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर चर्चा की।
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कार्यक्रम में अभियान के सदस्यों के साथ सोपान जोशी, राम पुनियानी, भंवर मेघवंशी, ज्यां द्रेज़ जैसे वरिष्ठ विचारकों ने सभा को सम्बोधित किया। तीन दिनों में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई जिसमें वक्ताओं और प्रतिभागियों ने देश में बढ़ते नफ़रत के माहौल, ब्राह्मणवाद, हिंदुत्व की राजनीति और दमन के माहौल पर चिंता व्यक्त की और इसकी खिलाफ संघर्ष करने की मांग की।

कार्यकर्ताओं ने संकुचित होती लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रकाश डाला जिसमें कानूनों, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है जिसके सबसे ज़्यादा शिकार अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी जैसे हाशिये में रहने वाले समुदाय है। बस्तर में झूठे एनकाउंटर, शारीरिक और यौनिक हिंसा की कड़ी निंदा की गयी।

कश्मीर के मौजूदा हालात जिसमे लोगों के बुनियादी हकों का हनन हो रहा है, पर चिंता व्यक्त की गई। देश के जल, जंगल, जमीन पर काम करने वाले विभिन्न संगठनों ने औद्योगिक प्रोजेक्टों एवं कोयला खनन के कारण हो रहे विस्थापन का मुद्दा उठाया गया, साथ ही पुनर्वास नीति पर सवाल उठाया। देश में वनाधिकार कानून के खराब क्रियान्वयन का मुद्दा उठाया गया।

वक्ताओं ने चिंता जताई की यह सरकार अपने कल्याणकारी दायित्वों से पीछे हट रही है।कल्याणकारी और पोषण की योजनाओं जैसे राशन, मध्यान्ह भोजन, आंगनवाडी, रोज़गार गारंटी, पेंशन के सही क्रियान्वयन और निगरानी की मांग की गयी। प्रतिभागियों ने कल्याणकारी योजनाओं में अनियमितता और घोटालों की बात रखी। प्रतिभागियों ने बताया कि सरकार की योजनाओं की बारे में जानकारी और प्रचार प्रसार की कोई मंशा नहीं लगती न ही शीघ्र शिकायत निवारण के लिए नियम बनाने के लिए वह तत्पर दिखती है।
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न सिर्फ यह, प्रतिभागियों ने कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढाने की मांग रखी जैसे आंगनवाडी जैसे गरम पका भोजन की सुविधा 3 साल से छोटे बच्चों के लिए होनी चाहिए, माताओं के प्रजनन श्रम में सहयोग के लिए क्रेच जैसे योजना हो, पेंशन की रकम बढ़ाई जाए, पोषण योजनायों में अंडा, कांदा आदि जैसे समुदाय की पसंद के अनुसार पोषक आहार दिए जाए आदि।

कार्यक्रम का अंत में प्रस्ताव हुआ जिसमें प्रतिभागियों ने कई मांग रखी। मांग रखी गयी कि कश्मीर में संचार सेवाएं और नागरिक अधिकार वापस दिए जाए एवं कश्मीर के किसी भी फैसले में कश्मीरियों की राय ली जाए।

बस्तर में आदिवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ता पर दमन का सिलसिला समाप्त हो। हाल ही में बेला भाटिया, सोनी सोरी पर हुई एफआईआर को शीघ्र वापस लिया जाय।
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मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के ऊपर लगाये गए फर्जी केस और यूएपीए जैसे कानूनों को वापस लेने की मांग रखी गयी। नर्मदा बांध में डूबान क्षेत्रों में आये गांव को मुआवजा और विस्थापन की मांग हुई और यह मांग की गई कि बांध का जलस्तर बढ़ाने की प्रक्रिया को तत्काल समाप्त किया जाए।

खाद्य सुरक्षा कानूनों, रोजगार गारंटी, पेंशन, पोषण कार्यक्रमों के सही क्रियान्वयन और निगरानी की मांग की गयी। आधार से बढ़ते खतरों से सचेत होने की और कल्याणकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता हटाने की मांग रखी गयी। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़े सांस्कृतिक समूह द्वारा रेला, चन्द्रिका जी और समूह द्वारा पंडवानी, कारवां ए मोहब्बत द्वारा फिल्म्स और रामलाल और पुष्पा जी के द्वारा कठपुतली नाच प्रस्तुत किये गए।

सभी प्रतिभागियों ने लोकतंत्र के संकुचित होते दायरे और दमन के माहौल के संघर्ष करते रहने और रोज़ी रोटी और काम के अधिकार को सभी के लिए सुनिश्चित करने का संकल्प लिया। 

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